
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ शासन ने सेवानिवृत्त IRS अधिकारी शीतल शाश्वत वर्मा को विशेष सचिव के पद पर संविदा नियुक्ति देकर एक बार फिर प्रदेश में संविदा नियुक्तियों की नीति और उसके औचित्य को लेकर बहस छेड़ दी है। सामान्य प्रशासन विभाग के 29 सितंबर 2026 के आदेश के अनुसार वर्मा को प्रमुख सचिव (असंवर्गीय) के रिक्त पद के विरुद्ध विशेष सचिव के रूप में पांच वर्ष अथवा पद की पूर्ति होने तक, जो भी पहले हो, संविदा पर नियुक्त किया गया है। उन्हें वित्त विभाग में पदस्थ करते हुए विशेष सचिव, मुख्य सचिव कार्यालय का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार के पास नियमित प्रशासनिक सेवा का पूरा ढांचा और वरिष्ठ अधिकारियों की उपलब्ध व्यवस्था है, तब बार-बार सेवानिवृत्त अधिकारियों को संविदा आधार पर महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?2012 के नियमों में है विशेष प्रावधानछत्तीसगढ़ सिविल सेवा (संविदा नियुक्ति) नियम, 2012 के नियम 4(4) में विशेष अनुभव, विशेषज्ञता और विशेष योग्यता वाले पदों को असाधारण विशेष परिस्थितियों में संविदा नियुक्ति के लिए घोषित करने का प्रावधान है। वहीं नियम 5(3) ऐसे पदों पर विशेष अनुभव और योग्यता रखने वाले सेवानिवृत्त सरकारी सेवक की सीधे संविदा नियुक्ति का रास्ता देता है।यानी संविदा नियुक्ति अपने आप में नियमों के विपरीत नहीं है, लेकिन सवाल इसके इस्तेमाल की आवृत्ति और औचित्य को लेकर उठ सकता है।‘विशेष परिस्थिति’ कितनी विशेष?यही वह बिंदु है जिस पर प्रशासनिक हलकों में चर्चा की गुंजाइश है। नियम 4(4) में विशेष परिस्थितियों में विशेषज्ञता और अनुभव के आधार पर संविदा नियुक्ति की व्यवस्था की गई है। ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि प्रत्येक नियुक्ति में वह असाधारण आवश्यकता किस आधार पर निर्धारित की जाती है और क्या उसका विस्तृत परीक्षण होता है?श्रीमती वर्मा की नियुक्ति के मामले में आदेश में वित्त विभाग की 21 सितंबर 2026 की सहमति का भी उल्लेख है। इसलिए यह मामला केवल सामान्य विभागीय निर्णय नहीं, बल्कि निर्धारित नियमों के तहत स्वीकृत प्रक्रिया के जरिए लिया गया निर्णय दिखाई देता है।पांच साल की नियुक्ति भी चर्चा मेंनियम 11(3) के तहत नियम 4(4) और 4(5) के अंतर्गत आने वाले मामलों में सेवानिवृत्त सरकारी सेवक की संविदा नियुक्ति विशेष मामले के रूप में पांच वर्ष तक की जा सकती है।ऐसे में अब बहस केवल यह नहीं है कि संविदा नियुक्ति क्यों की गई, बल्कि यह भी है कि क्या पांच वर्ष जैसी लंबी अवधि के लिए सेवानिवृत्त अधिकारियों की नियुक्ति करने की नीति से नियमित कैडर व्यवस्था और पदोन्नति की संभावनाओं पर कोई प्रभाव पड़ता है?सरकार से उठ रहे ये सवालक्या संबंधित पद के लिए नियमित सेवा में उपलब्ध अधिकारियों की पर्याप्तता का परीक्षण किया गया?नियुक्ति को ‘असाधारण विशेष परिस्थिति’ मानने के स्पष्ट आधार क्या हैं?क्या ऐसे मामलों की समीक्षा के लिए कोई पारदर्शी मानदंड निर्धारित हैं?सेवानिवृत्त अधिकारियों की संविदा नियुक्तियों की संख्या और अवधि को लेकर सरकार की कोई समग्र नीति है?क्या संविदा नियुक्तियां केवल वास्तविक विशेषज्ञता की आवश्यकता वाले मामलों तक सीमित हैं?रोक नहीं, पारदर्शिता की मांगसंविदा नियुक्ति के नियम मौजूद हैं और न्यायिक निर्णयों में भी यह स्वीकार किया गया है कि राज्य सरकार नियमों के दायरे में विशेष अनुभव और विशेषज्ञता के आधार पर ऐसी नियुक्तियां कर सकती है।इसलिए बहस का केंद्र “संविदा नियुक्ति होनी चाहिए या नहीं” से अधिक “किन परिस्थितियों में होनी चाहिए और उसके लिए कितने स्पष्ट एवं पारदर्शी मानदंड होने चाहिए” होना चाहिए।शीतल शाश्वत वर्मा की ताजा नियुक्ति ने इसी पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है—क्या संविदा नियुक्ति वास्तव में असाधारण परिस्थितियों के लिए रखा गया विशेष प्रावधान है, या धीरे-धीरे यह सरकार के लिए प्रशासनिक जरूरतें पूरी करने का एक नियमित विकल्प बनता जा रहा है?इस सवाल का जवाब सरकार की संविदा नियुक्तियों के आंकड़ों, प्रत्येक नियुक्ति के औचित्य और लागू नियमों के व्यावहारिक इस्तेमाल से ही स्पष्ट होगा।




