
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
जांजगीर-चांपा जिले में राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की कमी अब प्रशासनिक व्यवस्था में दिखाई देने लगी है। इसका ताजा उदाहरण पामगढ़ अनुभाग में देखने को मिला है, जहां कलेक्टर जन्मेजय महोबे ने जिले के अतिरिक्त कलेक्टर आर.के. तंबोली को पामगढ़ अनुभाग के अनुविभागीय अधिकारी राजस्व (एसडीएम) की जिम्मेदारी सौंप दी है। सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था में एसडीएम का दायित्व प्रायः डिप्टी कलेक्टर अथवा संयुक्त कलेक्टर स्तर के अधिकारियों को सौंपा जाता है, जबकि कई जिलों में प्रशिक्षु आईएएस अधिकारियों को भी अनुभागीय जिम्मेदारी देकर उन्हें मैदानी प्रशासन का अनुभव दिया जाता है। ऐसे में अतिरिक्त कलेक्टर स्तर के अधिकारी को ही एसडीएम की जिम्मेदारी दिए जाने से जिले में अधिकारियों की उपलब्धता और प्रशासनिक ढांचे को लेकर सवाल उठने लगे हैं।पामगढ़ अनुभाग प्रशासनिक और राजस्व दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां एसडीएम के पास राजस्व मामलों के निराकरण के साथ-साथ कानून-व्यवस्था, निर्वाचन, आपदा प्रबंधन, शासकीय योजनाओं की निगरानी और तहसील स्तर के प्रशासनिक अमले के साथ समन्वय जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां रहती हैं। ऐसे में इस पद पर नियमित रूप से डिप्टी कलेक्टर या संयुक्त कलेक्टर स्तर के अधिकारी की पदस्थापना प्रशासनिक दृष्टि से अधिक स्वाभाविक मानी जाती है। लेकिन जिले में अधिकारियों की कमी की स्थिति ऐसी बन गई है कि अतिरिक्त कलेक्टर आर.के. तंबोली को ही पामगढ़ एसडीएम का दायित्व भी संभालना पड़ रहा है।यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। जब अतिरिक्त कलेक्टर पहले से ही जिला स्तर की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं, तब उन्हें अनुभागीय प्रशासन की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपे जाने से कार्यों का दबाव स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। एक अधिकारी के पास दो महत्वपूर्ण स्तर की जिम्मेदारियां होने से क्या दोनों दायित्वों का प्रभावी ढंग से निर्वहन हो पाएगा, यह भी देखने वाली बात होगी। प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकारियों के कार्यक्षेत्र का संतुलित विभाजन इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है ताकि प्रत्येक अधिकारी को अपने दायित्वों के लिए पर्याप्त समय और अवसर मिल सके।जिले में डिप्टी कलेक्टर और संयुक्त कलेक्टर स्तर के अधिकारियों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होने पर अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था प्रशासनिक मजबूरी हो सकती है, लेकिन यदि यह व्यवस्था लंबे समय तक बनी रहती है तो इससे प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। खासकर राजस्व मामलों में आम नागरिकों को समय पर राहत और निर्णय दिलाना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। ऐसे में अनुभाग स्तर पर पूर्णकालिक और सक्षम अधिकारी की उपलब्धता जरूरी हो जाती है।वहीं प्रशिक्षु आईएएस अधिकारियों को अनुभागीय जिम्मेदारी देने की व्यवस्था भी प्रशासनिक प्रशिक्षण का अहम हिस्सा रही है। प्रशिक्षु अधिकारियों को मैदानी स्तर पर काम करने का अवसर मिलता है और शासन की योजनाओं, राजस्व प्रशासन तथा कानून-व्यवस्था की वास्तविक परिस्थितियों को समझने का अनुभव प्राप्त होता है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि पामगढ़ में प्रशिक्षु आईएएस या डिप्टी कलेक्टर स्तर के अधिकारी की उपलब्धता नहीं होने की स्थिति क्यों बनी और इसके पीछे शासन स्तर पर अधिकारियों की कमी की क्या वजह है।अतिरिक्त कलेक्टर को एसडीएम का प्रभार दिया जाना अपने आप में नियम विरुद्ध होने का प्रमाण नहीं है और प्रशासनिक आवश्यकता के अनुसार वरिष्ठ अधिकारी को ऐसी जिम्मेदारी दी जा सकती है। लेकिन यह व्यवस्था जिले में उपलब्ध प्रशासनिक अधिकारियों की संख्या और उनके कार्यभार की समीक्षा की आवश्यकता जरूर सामने लाती है। यदि जिले के अलग-अलग अनुभागों और जिला स्तरीय शाखाओं में अधिकारियों की कमी बनी हुई है तो शासन को नियमित पदस्थापना के माध्यम से इस कमी को दूर करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए।जांजगीर-चांपा जैसे महत्वपूर्ण जिले में राजस्व प्रशासन सीधे आम जनता से जुड़ा हुआ है। जमीन संबंधी विवाद, सीमांकन, नामांतरण, बंटवारा, कानून-व्यवस्था, निर्वाचन और शासन की विभिन्न योजनाओं से जुड़े मामलों में एसडीएम की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में अनुभागीय अधिकारी के पास पर्याप्त समय और प्रशासनिक उपलब्धता होना जरूरी है। यदि एक ही अधिकारी को जिला स्तर और अनुभाग स्तर की कई जिम्मेदारियां एक साथ संभालनी पड़ें तो स्वाभाविक रूप से प्रशासनिक प्राथमिकताओं का दबाव बढ़ सकता है।अब देखना यह होगा कि पामगढ़ में अतिरिक्त कलेक्टर आर.के. तंबोली को दी गई एसडीएम की जिम्मेदारी कितने समय तक जारी रहती है और क्या शासन जिले में डिप्टी कलेक्टर तथा संयुक्त कलेक्टर स्तर के अधिकारियों की कमी को दूर करने के लिए कोई ठोस कदम उठाता है। फिलहाल अतिरिक्त कलेक्टर को एसडीएम की जिम्मेदारी सौंपे जाने का फैसला जांजगीर-चांपा के प्रशासनिक ढांचे में अधिकारियों की कमी और बढ़ते कार्यभार की ओर जरूर संकेत कर रहा है। सवाल केवल एक अधिकारी को अतिरिक्त जिम्मेदारी दिए जाने का नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या जिले के प्रशासनिक ढांचे में पर्याप्त अधिकारी उपलब्ध हैं और यदि नहीं, तो आम जनता से जुड़े महत्वपूर्ण राजस्व प्रशासन को आखिर कब तक अतिरिक्त प्रभार के भरोसे चलाया जाएगा?




