अमृत मिशन की हैंडओवर प्रक्रिया से भ्रष्टाचार की जांच कैसे रुक सकती है? मधुसूदन यादव जवाब दें—हेमंत *कांग्रेस के पूर्व महापौर हेमा देशमुख के कार्यकाल में योजना हैंडओवर होने के बाद भी जांच पर रोक का कौन-सा कानून है? 58 करोड़ की पाइपलाइन पर भी उठाए सवाल, ईडी और एसीबी से जांच कराने की मांग.
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

राजनांदगांव शहर कांग्रेस के पूर्व महामंत्री एवं पूर्व पार्षद हेमंत ओस्तवाल ने अमृत मिशन योजना में कथित भ्रष्टाचार और शहर के विभिन्न वार्डों में पेयजल संकट को लेकर महापौर मधुसूदन यादव पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने महापौर एवं नगर निगम आयुक्त को पत्र लिखकर योजना में हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करने की मांग की है। ओस्तवाल ने कहा कि यदि कांग्रेस की पूर्व महापौर हेमा देशमुख के कार्यकाल में अमृत मिशन योजना में भ्रष्टाचार हुआ है, तो वर्तमान में नगर निगम से लेकर राज्य और केंद्र तक भारतीय जनता पार्टी की सरकार होने के बावजूद जांच और कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है? उन्होंने महापौर से सवाल किया कि आखिर कानून की किस किताब में लिखा है कि किसी योजना के हैंडओवर हो जाने के बाद उसमें हुए कथित भ्रष्टाचार की जांच नहीं की जा सकती?ओस्तवाल ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल में वर्ष 2014 में राजनांदगांव शहर की जनता को आगामी 30 वर्षों तक 24 घंटे शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लगभग 210 करोड़ रुपये की अमृत मिशन योजना की नींव रखी गई थी। योजना का उद्देश्य शहरवासियों को बेहतर पेयजल सुविधा उपलब्ध कराना था, लेकिन आज भी शहर के विभिन्न वार्डों में पानी की समस्याएं सामने आ रही हैं। ऐसे में योजना की गुणवत्ता, निर्माण कार्यों और खर्च की गई राशि को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।उन्होंने कहा कि 8 अक्टूबर 2026 को नगर निगम की सामान्य सभा में कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष संतोष पिल्ले और कांग्रेस के निर्वाचित पार्षदों ने अमृत मिशन योजना में कथित भ्रष्टाचार तथा विभिन्न वार्डों में पेयजल की समस्या का मुद्दा उठाया था। ओस्तवाल के अनुसार, इस दौरान महापौर मधुसूदन यादव ने कथित तौर पर अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हुए ऐसी टिप्पणी की, जो एक संवैधानिक पद पर बैठे जनप्रतिनिधि को शोभा नहीं देती। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सदन के भीतर जनहित के मुद्दों पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है और ऐसे सवालों का जवाब तथ्यों एवं दस्तावेजों के आधार पर दिया जाना चाहिए।ओस्तवाल ने कहा कि सामान्य सभा में महापौर द्वारा यह सवाल उठाया गया कि यदि अमृत मिशन योजना में भ्रष्टाचार हुआ था, तो कांग्रेस की पूर्व महापौर हेमा देशमुख के कार्यकाल के अंतिम वर्ष में योजना का हैंडओवर बिना जांच के क्यों लिया गया? साथ ही कांग्रेस पर आरोप लगाए गए कि योजना का काम पैसा लेकर लिया गया था और भ्रष्टाचार कांग्रेस ने किया है। इन आरोपों पर पलटवार करते हुए ओस्तवाल ने कहा कि यदि महापौर के पास भ्रष्टाचार से संबंधित ठोस तथ्य और दस्तावेज हैं, तो उन्हें सार्वजनिक करना चाहिए तथा निष्पक्ष जांच के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए।उन्होंने कहा कि योजना का हैंडओवर होना अपने आप में भ्रष्टाचार की जांच पर रोक लगाने का आधार नहीं हो सकता। यदि निर्माण कार्यों में गड़बड़ी, वित्तीय अनियमितता या शासन के नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो संबंधित दस्तावेजों, तकनीकी परीक्षण और वित्तीय ऑडिट के आधार पर उसकी जांच कराई जा सकती है। ओस्तवाल ने महापौर से सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करने की मांग की कि योजना के हैंडओवर को जांच में बाधा बताने का आधार क्या है और यदि पूर्व महापौर के कार्यकाल में कथित अनियमितताएं हुई थीं, तो पिछले दो वर्षों में भाजपा के नेतृत्व वाले नगर निगम ने इस संबंध में क्या कार्रवाई की है।ओस्तवाल ने पूर्व महापौर हेमा देशमुख के पांच वर्षीय कार्यकाल को ईमानदार और पारदर्शी बताते हुए कहा कि उनके कार्यकाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने से पहले महापौर मधुसूदन यादव को संबंधित मामलों के प्रमाण सार्वजनिक करने चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि यदि योजना में भ्रष्टाचार हुआ था, तो अब तक जांच की स्थिति, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका और कार्रवाई से संबंधित जानकारी जनता के सामने क्यों नहीं रखी गई? उन्होंने कहा कि आरोप-प्रत्यारोप से समस्या का समाधान नहीं होगा। जनता को यह जानने का अधिकार है कि लगभग 210 करोड़ रुपये की योजना पर खर्च के बावजूद पेयजल की समस्या क्यों बनी हुई है और योजना के क्रियान्वयन में कहां-कहां कमियां रह गईं।पूर्व पार्षद हेमंत ओस्तवाल ने अमृत मिशन योजना के अंतर्गत मोहारा से खरखरा जलाशय तक बिछाई गई लगभग 58 करोड़ रुपये की पाइपलाइन का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि संबंधित अधिकारियों के संरक्षण में शासन के नियमों के विरुद्ध पाइपलाइन बिछाने का कार्य किया गया, जिससे शासन को वित्तीय नुकसान पहुंचने की आशंका है। ओस्तवाल ने इस मामले में नगर निगम के तत्कालीन नोडल प्रभारी अधिकारी दीपक जोशी, उप अभियंता अतुल चोपड़ा, जय नारायण श्रीवास्तव और तत्कालीन निगम आयुक्त अश्वनी देवांगन सहित संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि पाइपलाइन बिछाने के लिए संबंधित विभाग की आवश्यक अनुमति नहीं ली गई थी, तो यह गंभीर जांच का विषय है।ओस्तवाल के अनुसार, खरखरा जलाशय जल संसाधन विभाग के अंतर्गत आता है और यह दुर्ग जिले से संबंधित क्षेत्र में स्थित है। ऐसे में मोहारा से खरखरा जलाशय तक पाइपलाइन बिछाने के लिए आवश्यक प्रशासनिक एवं विभागीय अनुमतियां ली गई थीं या नहीं, इसकी जांच होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि इस परियोजना में लगभग 58 करोड़ रुपये खर्च किए गए और इस राशि को लेकर महालेखाकार कार्यालय, रायपुर द्वारा भी ऑडिट आपत्ति किए जाने की बात सामने आई है। उन्होंने मांग की कि संबंधित ऑडिट आपत्ति, स्वीकृतियों, तकनीकी रिपोर्ट, कार्यादेश, भुगतान संबंधी अभिलेखों और पाइपलाइन की उपयोगिता की विस्तृत जांच कराई जाए, ताकि वास्तविक स्थिति जनता के सामने आ सके।ओस्तवाल ने कहा कि वर्ष 2014 से 2019 के बीच महापौर मधुसूदन यादव के कार्यकाल में अमृत मिशन योजना के तहत गार्डन आदि के नाम पर लगभग 10 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का विषय भी जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि इस खर्च का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि राशि किन कार्यों पर, किस स्वीकृति के आधार पर तथा किन एजेंसियों के माध्यम से खर्च की गई। उन्होंने कहा कि योजना से संबंधित सभी वित्तीय और तकनीकी पहलुओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि किसी भी व्यक्ति या अधिकारी को केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर दोषी न ठहराया जाए और यदि अनियमितता प्रमाणित होती है तो जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई की जा सके।पूर्व पार्षद ने महापौर मधुसूदन यादव से मांग की कि लगभग 58 करोड़ रुपये की पाइपलाइन से जुड़े मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) जैसी सक्षम एजेंसियों से कराने के लिए नियमानुसार आवश्यक कदम उठाए जाएं। साथ ही, यदि जांच में संज्ञेय अपराध के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो संबंधित दोषियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई जाए। उन्होंने कहा कि मामले में शामिल सभी अधिकारियों, ठेकेदारों और अन्य संबंधित पक्षों की भूमिका की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए तथा किसी को भी राजनीतिक संरक्षण के आधार पर बचाया नहीं जाना चाहिए।ओस्तवाल ने नगर निगम की सामान्य सभा में कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष संतोष पिल्ले और कांग्रेस के निर्वाचित पार्षदों के प्रति कथित अमर्यादित भाषा के इस्तेमाल पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने महापौर से कांग्रेस एवं निर्दलीय पार्षदों के समक्ष सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की। उन्होंने कहा कि महापौर का पद जनता के प्रति जवाबदेही और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का प्रतीक है। इसलिए सदन में जनहित के मुद्दे उठाने वाले जनप्रतिनिधियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाना चाहिए।हेमंत ओस्तवाल ने कहा कि अमृत मिशन योजना राजनांदगांव शहर की जनता की बुनियादी जरूरतों से जुड़ी परियोजना है। इस योजना में खर्च हुई राशि, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, पाइपलाइन की उपयोगिता और शहर में जारी पेयजल समस्याओं का जवाब जनता को मिलना चाहिए। उन्होंने महापौर मधुसूदन यादव से सवाल किया कि यदि कांग्रेस के पूर्व महापौर के कार्यकाल में भ्रष्टाचार हुआ है, तो उसकी जांच कराने में आखिर बाधा क्या है? वहीं, यदि लगभग 58 करोड़ रुपये की पाइपलाइन और अन्य कार्यों में अनियमितताओं के आरोप लगाए जा रहे हैं, तो उनकी भी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराई जाती? ओस्तवाल ने कहा कि जनता को आरोपों की राजनीति नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और ठोस कार्रवाई चाहिए। अब देखना यह है कि नगर निगम प्रशासन इन सवालों पर क्या रुख अपनाता है और अमृत मिशन योजना से जुड़े आरोपों की जांच के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।




