
विकास नंद/सर्वव्यापी


शासन स्तर पर प्रशासनिक कामकाज में पारदर्शिता, जवाबदेही और ई-ऑफिस व्यवस्था को बढ़ावा देने के दावों के बीच महासमुंद जिले के शिक्षा विभाग से जुड़े एक मामले ने आदेशों की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला सरायपाली विकासखंड में देवानंद नायक की बीआरसीसी पद पर पुनः पदस्थापना से जुड़ा है।
प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार 23 जुलाई 2026 को जिला शिक्षा अधिकारी महासमुंद कार्यालय से जारी आदेश में संलग्नीकरण समाप्त करते हुए देवानंद नायक को उनकी मूल संस्था शासकीय उच्च प्राथमिक शाला केंदुढार, सरायपाली के लिए कार्यमुक्त किया गया था। उक्त आदेश डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित है और उसमें राज्य शासन के निर्देशों के पालन का उल्लेख किया गया है।इसके बाद 8 सितंबर 2026 को स्कूल शिक्षा विभाग, मंत्रालय महानदी भवन, नवा रायपुर से एक अन्य आदेश जारी हुआ। इसमें देवानंद नायक, शिक्षक, को विकासखंड स्त्रोत समन्वयक के पद पर विकासखंड स्त्रोत केंद्र सरायपाली में अस्थायी रूप से आगामी आदेश तक पदस्थ किए जाने का उल्लेख है।
ई-ऑफिस के दौर में ऑफलाइन आदेश क्यों?
पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि जब जुलाई में संलग्नीकरण समाप्त करने की प्रक्रिया डिजिटल आदेश के माध्यम से पूरी की गई और आदेश डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित होकर जारी हुआ, तो करीब डेढ़ माह बाद उसी कर्मचारी को बीआरसीसी के पद पर वापस लाने के लिए ऑफलाइन आदेश की प्रक्रिया क्यों अपनाई गई?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि शासन प्रशासनिक कामकाज में ई-ऑफिस के माध्यम से पत्राचार और आदेशों की प्रक्रिया को व्यवस्थित एवं पारदर्शी बनाने पर जोर देता रहा है। ऐसे में एक ही पदस्थापना से जुड़े आदेशों में डिजिटल और ऑफलाइन प्रक्रिया के अंतर ने विभागीय कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा तेज कर दी है।
‘दोबारा एंट्री’ की चर्चा, प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण जरूरी
जुलाई के आदेश में मूलशाला भेजे गए देवानंद नायक की सितंबर में पुनः बीआरसीसी पद पर पदस्थापना के बाद शिक्षा विभाग में ‘दोबारा एंट्री’ की चर्चा भी जोर पकड़ रही है। हालांकि सितंबर के आदेश में पदस्थापना को अस्थायी बताते हुए आगामी आदेश तक प्रभावी किए जाने का उल्लेख है।ऐसे में सवाल किसी व्यक्ति विशेष की पदस्थापना से अधिक प्रशासनिक प्रक्रिया और पारदर्शिता का है। विभाग को स्पष्ट करना होगा कि जुलाई के डिजिटल आदेश के बाद सितंबर में ऐसी कौन-सी प्रशासनिक परिस्थिति बनी, जिसके आधार पर देवानंद नायक को पुनः बीआरसीसी की जिम्मेदारी दी गई और इस प्रक्रिया में ऑफलाइन आदेश का सहारा क्यों लिया गया।
ई-ऑफिस के जरिए आदेशों की ट्रैकिंग, स्वीकृति और जवाबदेही को लेकर जब सरकार पारदर्शी व्यवस्था की बात करती है, तब इस मामले में दोनों आदेशों की प्रक्रिया और उनके बीच के प्रशासनिक आधार को सार्वजनिक किया जाना कई सवालों का जवाब दे सकता है।




