
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की राजनीति में प्रधानमंत्री आवास योजना लंबे समय से आरोप-प्रत्यारोप का विषय बनी हुई थी, लेकिन मंगलवार को रायपुर प्रेस क्लब में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उपमुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा के आमने-सामने बैठने के बाद यह राजनीतिक बहस एक नए मुकाम पर पहुंच गई। करीब 80 मिनट चली इस खुली बहस में दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के दावों को चुनौती देते हुए अपने-अपने आंकड़े, पत्र और सरकारी प्रक्रिया से जुड़े तर्क सामने रखे।दरअसल, इस पूरे विवाद की जड़ सिर्फ यह सवाल नहीं है कि कितने प्रधानमंत्री आवास बने, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि स्वीकृत आवास, वित्तीय स्वीकृति, निर्माणाधीन आवास और पूर्ण आवास—इन अलग-अलग आंकड़ों को राजनीतिक मंच पर किस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। यही वजह रही कि प्रेस क्लब की बहस में आंकड़े ही सबसे बड़े हथियार बने और दोनों पक्ष अपने-अपने कार्यकाल को बेहतर साबित करने की कोशिश करते दिखाई दिए।उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने बहस के दौरान पिछली कांग्रेस सरकार पर प्रधानमंत्री आवास योजना के क्रियान्वयन में लापरवाही का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में आवास निर्माण और खर्च की गति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। शर्मा ने यह भी कहा कि पिछली सरकार के दौरान केंद्र से उपलब्ध कराए गए आवासों को लेकर पर्याप्त गंभीरता नहीं दिखाई गई। उनके अनुसार, पूर्ववर्ती सरकार के समय लगभग 3 लाख आवास पूर्ण हुए थे, जबकि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में बड़ी संख्या में आवासों का निर्माण पूरा हुआ है। उन्होंने वित्तीय स्वीकृति और खर्च के आंकड़ों के जरिए भी दोनों सरकारों के बीच अंतर बताने की कोशिश की।वहीं भूपेश बघेल ने अपने पक्ष में प्रधानमंत्री आवास योजना के प्रारंभिक आधार, 2011 की जनगणना, आवास प्लस और विभिन्न वर्षों में मिली स्वीकृतियों का उल्लेख किया। बघेल ने तर्क दिया कि केंद्र सरकार की प्रक्रिया, पोर्टल बंद होने और राशि जारी होने में आई अड़चनों को केवल राज्य सरकार की विफलता के रूप में देखना उचित नहीं है। उन्होंने अपने कार्यकाल में 18 लाख आवासों की स्वीकृति तथा बाद में केंद्र से मिली नई स्वीकृतियों का हवाला देते हुए कुल स्वीकृतियों का बड़ा आंकड़ा सामने रखा।यहीं से बहस का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू सामने आता है। क्या किसी योजना की सफलता का पैमाना केवल स्वीकृत मकानों की संख्या होना चाहिए या फिर वास्तव में गरीब परिवारों के घर तक पहुंचा हुआ पूरा मकान? स्वीकृति और निर्माण के बीच का अंतर ही इस पूरे विवाद का मूल प्रश्न बनकर उभरा। एक तरफ स्वीकृतियों के आंकड़े हैं, दूसरी तरफ पूर्ण हुए मकानों का आंकड़ा है और तीसरी तरफ उन हितग्राहियों का सवाल है जो आज भी अपने पक्के घर की प्रतीक्षा कर रहे हैं।भूपेश बघेल ने केंद्र की ओर से पोर्टल बंद किए जाने और राशि के प्रवाह को लेकर सवाल उठाए, जबकि विजय शर्मा ने आरोप लगाया कि पिछली सरकार के समय केंद्र से मिले अवसरों का अपेक्षित उपयोग नहीं किया गया। दोनों के तर्क अपने-अपने राजनीतिक दृष्टिकोण से मजबूत दिखाई दिए, लेकिन आम जनता के लिए असली सवाल अभी भी वही है—जिस गरीब परिवार के नाम पर स्वीकृति हुई, उसके सिर पर पक्की छत कब आई?बहस के दौरान 18 लाख से लेकर 46 लाख तक की स्वीकृतियों के आंकड़ों का भी उल्लेख हुआ। बघेल ने अलग-अलग समय में हुई स्वीकृतियों को जोड़ते हुए बड़े आंकड़े प्रस्तुत किए, जबकि शर्मा ने निर्माण और खर्च की वास्तविक प्रगति पर जोर दिया। इससे साफ हुआ कि दोनों नेता एक ही योजना को अलग-अलग पैमानों से देख रहे हैं।राजनीतिक दृष्टि से देखें तो विजय शर्मा के लिए यह बहस केवल एक योजना का बचाव नहीं थी। पंचायत एवं ग्रामीण विकास से जुड़े दायित्व के कारण प्रधानमंत्री आवास योजना उनके विभागीय कामकाज और सरकार की उपलब्धियों से सीधे जुड़ी है। इसलिए उनके सामने यह साबित करने की चुनौती भी थी कि भाजपा सरकार ने सत्ता में आने के बाद आवास निर्माण की गति को बढ़ाया है। दूसरी ओर भूपेश बघेल के लिए यह बहस अपनी सरकार के कार्यकाल पर लगे आरोपों का जवाब देने और केंद्र-राज्य संबंधों से जुड़े पुराने विवाद को फिर सामने रखने का अवसर थी।इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह है कि अब प्रधानमंत्री आवास योजना केवल सरकारी योजना नहीं रही, बल्कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में शासन की विश्वसनीयता का पैमाना बनती जा रही है। भाजपा इसे पिछली कांग्रेस सरकार की कथित विफलता से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस केंद्र और राज्य के बीच वित्तीय एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश कर रही है।प्रेस क्लब के बाहर भी दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच विवाद और झड़प की स्थिति बनने की खबर सामने आई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि मुद्दा नेताओं की बहस तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि दोनों राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के लिए भी यह प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है।हालांकि, इस बहस का निष्पक्ष मूल्यांकन किसी एक नेता को तत्काल विजेता घोषित करके नहीं किया जा सकता। राजनीतिक बहस में दोनों पक्षों ने अपने पक्ष के आंकड़े मजबूती से रखे, लेकिन अंतिम फैसला उन आंकड़ों की स्वतंत्र सरकारी पुष्टि और जमीनी परिणामों से ही संभव होगा। स्वीकृति कितनी हुई, राशि कितनी मिली, कितने आवास शुरू हुए, कितने पूर्ण हुए और कितने परिवारों को वास्तव में घर मिला—इन सभी आंकड़ों को एक ही आधार वर्ष और समान परिभाषा के साथ सामने रखा जाए तो तस्वीर कहीं अधिक साफ होगी।सबसे अहम बात यह है कि आज की बहस ने वर्षों से चल रहे आरोप-प्रत्यारोप को सार्वजनिक मंच पर ला दिया है। अब सरकार और विपक्ष दोनों के सामने चुनौती है कि वे राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर जिला, ब्लॉक और पंचायत स्तर पर प्रधानमंत्री आवास योजना की वास्तविक स्थिति का पूरा हिसाब जनता के सामने रखें।क्योंकि आखिरकार प्रधानमंत्री आवास योजना का असली लाभ किसी प्रेस क्लब की बहस में नहीं, बल्कि उस गरीब परिवार के घर की चौखट पर दिखाई देना चाहिए, जिसके लिए पक्का मकान केवल सरकारी आंकड़ा नहीं बल्कि वर्षों पुराना सपना है।
अब सवाल यह नहीं कि बहस में कौन जीता—सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ में पीएम आवास के आंकड़ों की इस सियासी जंग के बाद क्या गरीबों को उनके घर का स्पष्ट और पूरा हिसाब मिलेगा?




