
विकास नंद/ सर्वव्यापी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर को छत्तीसगढ़ में ‘सेवा संकल्प अभियान’ के रूप में मनाने की भाजपा की तैयारी के बीच अब राजनीतिक सवाल भी उठने लगे हैं। एक ओर भाजपा संगठन प्रदेशभर में सेवा, जनसरोकार और जनभागीदारी से जुड़े कार्यक्रमों के जरिए प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन को यादगार बनाने की तैयारी कर रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और आम जनता के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब प्रदेश में भाजपा की डबल इंजन सरकार है, तब जमीनी स्तर पर मूलभूत सुविधाओं की स्थिति कितनी बदली है?हाल ही में विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान विपक्ष ने सड़क, बिजली, पानी, किसानों की समस्याओं और कानून-व्यवस्था सहित कई मुद्दों को लेकर सरकार को घेरा था। विधानसभा सत्र के लिए विपक्ष की ओर से इन मुद्दों से जुड़े बड़ी संख्या में सवाल लगाए गए थे।
ऐसे में 17 सितंबर को होने वाला सेवा संकल्प अभियान भाजपा के लिए केवल उत्सव और आयोजन का विषय नहीं, बल्कि सरकार के कामकाज का जमीनी रिपोर्ट कार्ड भी बन सकता है।
दीयों की रोशनी के बीच विकास के सवाल
सेवा संकल्प अभियान के तहत प्रदेश में बड़े पैमाने पर दीप प्रज्ज्वलन और जनभागीदारी के कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, जब सरकारी कार्यक्रमों का संदेश सीधे ‘सेवा’ और ‘सुशासन’ से जुड़ता है तो जनता भी उसी कसौटी पर सरकार के प्रदर्शन को परखती है।सवाल यह है कि जिन गांवों और कस्बों में आज भी खराब सड़कों से आवागमन मुश्किल है, जहां पेयजल की समस्या लोगों को परेशान करती है, जहां बिजली व्यवस्था को लेकर शिकायतें सामने आती हैं, जहां बेहतर इलाज के लिए मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर जाना पड़ता है और जहां शिक्षा व्यवस्था में संसाधनों की कमी को लेकर सवाल उठते हैं—वहां सेवा संकल्प का संदेश किस रूप में पहुंचेगा?
डबल इंजन सरकार से अपेक्षाएं भी दोगुनी
भाजपा सरकार को प्रदेश में सत्ता संभाले पर्याप्त समय हो चुका है। केंद्र और राज्य में एक ही राजनीतिक दल की सरकार होने के कारण भाजपा स्वयं डबल इंजन सरकार के फायदे और तेज विकास का दावा करती रही है।यही कारण है कि अब जनता की अपेक्षाएं भी पहले की तुलना में अधिक हैं। विपक्ष के पास सरकार से यह सवाल पूछने का राजनीतिक आधार है कि यदि केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय है, तो उसका असर गांव की सड़क, घर की बिजली, नल का पानी, अस्पताल की सुविधा, स्कूल की गुणवत्ता और कानून-व्यवस्था में स्पष्ट रूप से क्यों नहीं दिखाई देना चाहिए?‘
गुड गवर्नेंस’ की असली परीक्षा जमीन पर
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल योजनाओं की घोषणा या बड़े आयोजनों तक सीमित नहीं है। असली परीक्षा उस समय होती है जब आम नागरिक को सरकारी दफ्तर में अपना काम कराने, अस्पताल में इलाज पाने, स्कूल में बेहतर शिक्षा हासिल करने, सड़क पर सुरक्षित आवागमन करने और पुलिस-प्रशासन से समय पर न्याय पाने में आसानी हो।यदि सेवा संकल्प का उद्देश्य वास्तव में ‘सेवा और सुशासन’ को जन-जन तक पहुंचाना है तो इसकी सफलता का पैमाना भी यही होना चाहिए कि आम आदमी सरकारी व्यवस्था से कितना संतुष्ट है।
कहीं जश्न पर भारी न पड़ जाए जनता के सवाल
राजनीतिक रूप से देखा जाए तो 17 सितंबर का अभियान भाजपा के लिए अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर इसलिए कि पार्टी अपनी सरकार की उपलब्धियों को जनता के सामने रख सकती है, लेकिन चुनौती इसलिए कि उपलब्धियों के साथ जनता के असंतोष और स्थानीय समस्याओं को नजरअंदाज करना अब आसान नहीं होगा।खासकर सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और कानून-व्यवस्था जैसे सीधे जनजीवन से जुड़े मुद्दे किसी राजनीतिक नारे के मोहताज नहीं होते। इनका असर जनता रोज महसूस करती है।ऐसे में सवाल यही है कि 17 सितंबर को जलने वाले लाखों ‘आशीर्वाद के दीये’ क्या केवल प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन का उत्सव रोशन करेंगे या सरकार के कामकाज पर उठ रहे सवालों को भी उजागर करेंगे?अगर सेवा संकल्प अभियान के दौरान जनता की वास्तविक समस्याओं का समाधान और सरकार की जवाबदेही केंद्र में आती है, तो यह अभियान भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से मजबूत संदेश बन सकता है। लेकिन यदि आयोजन की चमक के बीच जमीनी समस्याएं जस की तस रहीं, तो यही सेवा संकल्प विपक्ष के हाथ में सरकार को घेरने का नया मुद्दा भी बन सकता है।
आखिर सुशासन का सबसे बड़ा प्रमाण मंच पर जलता दीपक नहीं, बल्कि आम आदमी के जीवन में दिखाई देने वाला बदलाव होता है।




