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बदलते समीकरणों में राजपरिवार की भूमिका पर सवाल, संगठनात्मक उपेक्षा को लेकर समर्थकों में चर्चा।

विकास नंद/सर्वव्यापी

महासमुंद जिले की राजनीति में फुलझर स्टेट के राजपरिवार का प्रभाव किसी परिचय का मोहताज नहीं रहा है। करीब तीन दशक तक सरायपाली, बसना सहित जिले के विभिन्न हिस्सों में कांग्रेस की राजनीति में राजपरिवार की महत्वपूर्ण भूमिका रही। एक समय सरायपाली और बसना विधानसभा क्षेत्रों को कांग्रेस का मजबूत गढ़ और राजपरिवार की पारंपरिक राजनीतिक जमीन के तौर पर देखा जाता था। लेकिन बदलते राजनीतिक दौर में राजपरिवार की संगठनात्मक भूमिका पहले की अपेक्षा सीमित नजर आने को लेकर अब कांग्रेस समर्थकों के बीच चर्चा तेज हो गई है।वर्तमान में सरायपाली विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। आरक्षण के बाद यहां चुनावी राजनीति के समीकरण और नेतृत्व की प्रकृति में भी बदलाव आया है। ऐसे में पुराने राजनीतिक प्रभाव रखने वाले परिवारों की भूमिका किस रूप में बनी रहती है, यह भी स्थानीय राजनीति में चर्चा का विषय रहा है।

2023 की हार के बाद बदले राजनीतिक समीकरण

वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद सरायपाली-बसना क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियों में बड़ा बदलाव देखने को मिला। कांग्रेस संगठन में नए समीकरण बनने लगे और पार्टी की स्थानीय राजनीति में भी नेतृत्व तथा संगठनात्मक सक्रियता को लेकर नए सवाल खड़े हुए।इसी बीच कांग्रेस की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली रहे फुलझर स्टेट के राजपरिवार की वर्तमान भूमिका को लेकर समर्थकों के बीच चर्चा है। समर्थकों का मानना है कि जिस परिवार की क्षेत्र में लंबे समय तक कांग्रेस की राजनीतिक पहचान बनाने में अहम भूमिका रही, बदलते दौर में संगठन के स्तर पर उसकी सक्रियता और उपयोगिता को अपेक्षित महत्व मिलता दिखाई नहीं दे रहा है।

आरक्षित सीट ने बदला नेतृत्व का समीकरण

सरायपाली विधानसभा के अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने के बाद यहां सीधे तौर पर उम्मीदवारों के चयन और विधानसभा प्रतिनिधित्व के समीकरण बदल गए हैं। ऐसे में राजपरिवार की राजनीतिक भूमिका अब सीधे विधानसभा प्रत्याशी के रूप में न होकर संगठन, मार्गदर्शन, जनसंपर्क और कांग्रेस के पारंपरिक समर्थक वर्ग को जोड़ने में कितनी प्रभावी रहती है, यह महत्वपूर्ण सवाल बन गया है।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार आज के दौर में केवल पारंपरिक प्रभाव ही पर्याप्त नहीं माना जाता। बूथ स्तर पर संगठन, सक्रिय जनसंपर्क, युवा नेतृत्व और लगातार राजनीतिक सक्रियता भी किसी दल की मजबूती तय करती है। यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर पुराने प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों की भूमिका को लेकर भी नए सिरे से मंथन की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

समर्थकों की नजर कांग्रेस के अगले कदम पर

फुलझर स्टेट के राजपरिवार से जुड़े समर्थकों के बीच अब यह चर्चा है कि कांग्रेस नेतृत्व आने वाले समय में राजपरिवार के राजनीतिक अनुभव और क्षेत्र में लंबे समय से बने प्रभाव का किस तरह उपयोग करता है। क्या पार्टी संगठन में राजपरिवार को फिर से महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर पुराने जनाधार को सक्रिय करेगी या बदलते राजनीतिक दौर में नए चेहरों और नए नेतृत्व को प्राथमिकता दी जाएगी?

फिलहाल कांग्रेस की स्थानीय राजनीति में यह सवाल चर्चा के केंद्र में है कि कभी सरायपाली-बसना में कांग्रेस की सियासत का मजबूत आधार रहा फुलझर स्टेट का राजपरिवार, क्या बदलते राजनीतिक समीकरणों और आरक्षित विधानसभा सीट के दौर में भी पार्टी के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, या उसकी राजनीतिक अहमियत अब धीरे-धीरे कम आंकी जा रही है?

आने वाले समय में कांग्रेस संगठन की गतिविधियां और जिम्मेदारियों का वितरण इस सवाल का जवाब दे सकता है।

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