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वैदिक काल से संसद भवन तक: भारतीय नारी की बदलती भूमिका।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

जिस समाज की प्राचीन ऋचाओं में स्त्री की आवाज़ सुनाई देती है, जहाँ वह ज्ञान की खोज में पुरुष के साथ खड़ी दिखाई देती है, वही समाज समय के साथ ऐसी सामाजिक व्यवस्थाओं से भी गुजरता है जहाँ स्त्री की स्वतंत्रता पर अनेक सीमाएँ दिखाई देने लगती हैं। फिर इतिहास करवट लेता है—सामाजिक सुधार आंदोलनों से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक भारतीय नारी एक बार फिर सार्वजनिक जीवन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है और अंततः लोकतंत्र के सर्वोच्च मंचों में कानून निर्माण की सहभागी बनती है। यह लंबी यात्रा केवल समय के बदलने की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय नारी की बदलती भूमिका, संघर्ष, अधिकार और आत्मसम्मान की कहानी है।वैदिक काल की लोपामुद्रा, घोषा, अपाला और वाक् अम्भृणी जैसी ऋषिकाओं से लेकर गार्गी और मैत्रेयी तक हमें ऐसी स्त्रियों के उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने ज्ञान और विचार के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। ऋग्वेद में लोपामुद्रा और अपाला से जुड़े सूक्त तथा वाक् अम्भृणी का वाक् सूक्त स्त्री की बौद्धिक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् में गार्गी का याज्ञवल्क्य से दार्शनिक संवाद और मैत्रेयी की आत्मज्ञान संबंधी जिज्ञासा यह बताती है कि भारतीय परंपरा में ऐसी महिलाएँ भी थीं जो ज्ञान के कठिन प्रश्नों पर पुरुष विद्वानों के सामने प्रश्न रखती थीं। लेकिन इतिहास को संतुलित दृष्टि से देखना आवश्यक है। कुछ विदुषी महिलाओं की उपस्थिति को पूरे समाज की स्त्रियों की समान स्थिति का प्रमाण नहीं माना जा सकता।प्राचीन भारत में नारी की भूमिका ज्ञान तक सीमित नहीं रही। बौद्ध परंपरा में महाप्रजापती गौतमी को भिक्षुणी संघ की स्थापना से जोड़ा जाता है और थेरिगाथा में अनेक भिक्षुणियों की अपनी आवाज़ सुनाई देती है। प्रभावती गुप्ता ने वाकाटक शासन में प्रभावशाली राजनीतिक भूमिका निभाई, वहीं दक्षिण भारतीय साहित्यिक परंपरा में अव्वैयार जैसी कवयित्री ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि परिस्थितियों के अनुसार भारतीय नारी ने धर्म, साहित्य, ज्ञान और शासन में भी अपनी जगह बनाई।समय बदला और सामाजिक संरचनाएँ भी बदलीं। उत्तर वैदिक काल में परिवार, वंश, संपत्ति और धार्मिक कर्मकांडों की बदलती व्यवस्था के साथ स्त्री की भूमिका अधिक परिवार-केंद्रित होती गई। बाद की धर्मशास्त्रीय परंपरा में स्त्री की स्वतंत्रता पर अधिक स्पष्ट सीमाएँ दिखाई देती हैं। मनुस्मृति का प्रसिद्ध कथन—“न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति”—उस सामाजिक सोच को व्यक्त करता है जिसमें स्त्री के जीवन को पिता, पति और पुत्र की संरक्षकता से जोड़ा गया। इसीलिए भारतीय नारी का इतिहास न तो निरंतर स्वतंत्रता की कहानी है और न निरंतर पराधीनता की; यह बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बीच उसकी भूमिका के पुनर्निर्माण की कहानी है।मध्यकाल आया तो भारतीय नारी के सामने नई चुनौतियाँ थीं, लेकिन इस काल में भी ऐसी महिलाएँ सामने आईं जिन्होंने इतिहास पर अमिट छाप छोड़ी। दिल्ली की रज़िया सुल्तान ने पुरुष-प्रधान सत्ता व्यवस्था के बीच दिल्ली के सिंहासन पर बैठकर राजनीतिक नेतृत्व का उदाहरण प्रस्तुत किया। गोंडवाना की रानी दुर्गावती ने अपने राज्य की रक्षा के लिए युद्ध किया, जबकि मुगल दरबार में नूरजहाँ ने औपचारिक रूप से सिंहासन पर बैठे बिना राजनीतिक निर्णयों और प्रशासन पर प्रभाव स्थापित किया। दक्षिण भारत में रुद्रमादेवी और बाद में मालवा की अहिल्याबाई होल्कर ने भी शासन और लोककल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।मध्यकालीन भारत में नारी की एक दूसरी आवाज़ भक्ति आंदोलन में सुनाई देती है। मीराबाई ने सामाजिक अपेक्षाओं और राजपरिवार की सीमाओं से परे कृष्ण भक्ति को अपने जीवन की पहचान बनाया। इस प्रकार भारतीय इतिहास में नारी कभी रणभूमि में तलवार लेकर दिखाई देती है, कभी सत्ता के केंद्र में, कभी भक्ति की आवाज़ बनकर और कभी जनता के कल्याण की शासिका के रूप में।फिर आधुनिक भारत में एक नया दौर शुरू हुआ। 19वीं शताब्दी में स्त्री-शिक्षा और सामाजिक सुधार के प्रश्न प्रमुखता से उठे। राजा राममोहन राय के प्रयासों से सती प्रथा के विरुद्ध आंदोलन को बल मिला और 1829 में सती प्रथा पर कानूनी रोक लगी। ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों से 1856 में हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम आया। सावित्रीबाई फुले ने 1848 से लड़कियों की शिक्षा के लिए ऐतिहासिक कार्य किया और पंडिता रमाबाई ने महिलाओं की शिक्षा तथा सामाजिक सुधार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। शिक्षा के द्वार खुलने लगे तो नारी ने केवल अक्षरज्ञान नहीं पाया, बल्कि अपने अधिकारों को पहचानने की शक्ति भी प्राप्त की।1857 के विद्रोह ने भारतीय नारी के राजनीतिक और सैन्य साहस का एक नया रूप सामने रखा। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया और उनकी वीरता भारतीय स्वतंत्रता की राष्ट्रीय स्मृति का स्थायी हिस्सा बन गई। अवध में बेगम हजरत महल ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध नेतृत्व किया। आगे चलकर सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, उषा मेहता और अनेक अन्य महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन को अपनी ऊर्जा दी। हजारों सामान्य महिलाओं ने भी सत्याग्रह, विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार, जेल यात्राओं और जन आंदोलनों में भाग लिया। अब भारतीय नारी केवल घर की व्यवस्था संभालने वाली नहीं थी; वह राष्ट्र की स्वतंत्रता की लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी थी।स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान ने इस यात्रा को एक नया आधार दिया। अनुच्छेद 14 ने समानता, अनुच्छेद 15 ने लिंग के आधार पर भेदभाव के विरुद्ध संरक्षण और अनुच्छेद 16 ने सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता का संवैधानिक आधार स्थापित किया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि स्वतंत्र भारत ने महिलाओं को पुरुषों के समान सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार दिया। अब नारी केवल शासन की विषय-वस्तु नहीं थी; वह सरकार चुनने वाली नागरिक भी थी।स्वतंत्र भारत की महिलाओं ने इसके बाद राजनीति और सार्वजनिक जीवन में नए इतिहास रचे। सुचेता कृपलानी किसी भारतीय राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। इंदिरा गांधी ने भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व किया। प्रतिभा पाटिल भारत की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं। सुषमा स्वराज ने विदेश मंत्री के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई और निर्मला सीतारमण ने भारत की पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री के रूप में ऐतिहासिक स्थान बनाया। ममता बनर्जी, मायावती और सोनिया गांधी जैसी महिलाओं ने भी भारतीय राजनीति में लंबे समय तक प्रभावशाली भूमिका निभाई।समकालीन राजनीति में महिलाओं की भागीदारी और अधिक व्यापक हुई है। 2024 में सोनिया गांधी राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित हुईं, जबकि प्रियंका गांधी वाड्रा वायनाड से निर्वाचित होकर 18वीं लोकसभा की सदस्य बनीं। डिंपल यादव भी 18वीं लोकसभा में मैनपुरी का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। संसद में सत्ता और विपक्ष दोनों पक्षों में महिला सांसद कानून निर्माण, बहस और जनहित के मुद्दों को सामने रखने में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। यह स्थिति बताती है कि भारतीय नारी अब केवल राजनीति की दर्शक नहीं, बल्कि राजनीतिक निर्णय-प्रक्रिया की सहभागी बन चुकी है।लेकिन इस चमकती तस्वीर के साथ एक कठोर तथ्य भी सामने रखना जरूरी है। भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी उनकी आबादी के अनुपात में बहुत कम है। 1952 की पहली लोकसभा में 22 महिलाएँ चुनी गई थीं। 2019 में यह संख्या बढ़कर 78 हुई, लेकिन 2024 में 74 महिलाएँ 18वीं लोकसभा के लिए निर्वाचित हुईं। 2024 में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 13.6 प्रतिशत रहा, जबकि 797महिला उम्मीदवारों ने लोकसभा चुनाव लड़ा। ये आँकड़े बताते हैं कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी जरूर है, लेकिन प्रतिनिधित्व में अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है। राज्यसभा में भी महिलाओं की संख्या कुल सदस्यों की तुलना में सीमित है।इसी ऐतिहासिक कमी को दूर करने की दिशा में 2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम महत्वपूर्ण कदम है। 106वें संविधान संशोधन ने लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान किया। इसका क्रियान्वयन जनगणना और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ा है। यह केवल सीटों का आरक्षण नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संरचना में महिलाओं की भागीदारी को मजबूत करने की कोशिश है।फिर भी प्रश्न केवल संख्या का नहीं है। प्रश्न यह है कि संसद में बैठी महिला कितनी प्रभावी ढंग से कानून निर्माण करती है, कितनी मजबूती से अपने क्षेत्र की आवाज़ उठाती है और समाज के उन प्रश्नों को कितनी शक्ति से सामने लाती है जिन्हें लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया। लोकतंत्र तब अधिक सार्थक होता है जब नारी केवल मतदाता नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाली शक्ति भी बने।यदि इस पूरी यात्रा को एक साथ देखें तो भारतीय नारी अनेक रूपों से गुजरती दिखाई देती है। वह वैदिक काल में ऋषिका है, उपनिषदों में प्रश्न करने वाली गार्गी और आत्मज्ञान की खोज करने वाली मैत्रेयी है; प्राचीन भारत में प्रभावती गुप्ता जैसी राजनीतिक हस्ती है; मध्यकाल में रज़िया, दुर्गावती और नूरजहाँ जैसी सत्ता और संघर्ष की प्रतीक है; मीराबाई जैसी आत्म-अभिव्यक्ति की आवाज़ है; अहिल्याबाई जैसी लोककल्याणकारी शासिका है; आधुनिक युग में सावित्रीबाई जैसी शिक्षिका है; लक्ष्मीबाई जैसी योद्धा है; और स्वतंत्र भारत में इंदिरा गांधी, प्रतिभा पाटिल, सुषमा स्वराज, निर्मला सीतारमण, सोनिया गांधी तथा अनेक अन्य महिलाओं के रूप में सार्वजनिक जीवन की सक्रिय सहभागी है।इसलिए वैदिक काल से संसद भवन तक की यात्रा केवल नारी के स्थान बदलने की कहानी नहीं है; यह उसकी भूमिका के लगातार विस्तार की कहानी है। कभी उसकी आवाज़ मंत्रों में थी, फिर वह समाज सुधार की आवाज़ बनी, स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्र की आवाज़ बनी और आज संसद में लोकतंत्र की आवाज़ बन रही है।कभी नारी से कहा गया कि उसका संसार घर की सीमा तक है। उसने शिक्षा के द्वार खोले। उसने समाज से प्रश्न किए। उसने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। उसने मतदान का अधिकार पाया। उसने पंचायतों में निर्णय लिए। उसने विधानसभाओं और संसद में स्थान बनाया। और अब वह देश के कानून और नीतियों को प्रभावित करने वाली शक्ति के रूप में आगे बढ़ रही है।फिर भी यह यात्रा समाप्त नहीं हुई है। संसद भवन इस यात्रा का अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि एक नया पड़ाव है। क्योंकि नारी की वास्तविक शक्ति केवल संसद की सीटों में नहीं, बल्कि उन सीटों से उठने वाली आवाज़ में है—वह आवाज़ जो समाज के प्रश्नों को कानून में बदल सकती है, सपनों को नीति में बदल सकती है और आने वाली पीढ़ियों के भारत की दिशा तय कर सकती है।यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है—संसद भवन केवल उसका नया पड़ाव है। यह आलेखमो. सोहैल अली ,परास्नातक ,इतिहास महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ,वर्धा (महाराष्ट्र) द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

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