
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में विकास की तस्वीर दिखाने वाले सरकारी दावों के बीच प्रदेश की सड़कों की बदहाल स्थिति अब एक बड़ा सवाल बनकर सामने आ रही है। कहीं सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं, कहीं डामर उखड़ चुका है तो कहीं नई बनी सड़कें ही कुछ समय बाद अपनी गुणवत्ता की कहानी खुद बयां करने लगती हैं। ऐसे में लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली और विभागीय निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।व्यंग्यात्मक सवाल यह है कि क्या अब छत्तीसगढ़ की सड़कों पर चलने के लिए वाहन नहीं, बल्कि ‘ऑफ-रोडिंग’ का प्रशिक्षण जरूरी हो गया है?प्रदेश में सड़क निर्माण और रखरखाव के लिए करोड़ों-अरबों रुपये का बजट खर्च किया जाता है। इसके बावजूद यदि आम नागरिक को सड़क पर गड्ढे, उखड़ा डामर और बदहाल मार्ग ही नजर आएं तो फिर सवाल केवल सड़क की गुणवत्ता का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही का है।लोक निर्माण मंत्री एवं उप मुख्यमंत्री अरुण साव के सामने भी अब यह चुनौती है कि विभाग में चल रही योजनाओं, निर्माण कार्यों, गुणवत्ता परीक्षण और सड़कों के रखरखाव की वास्तविक स्थिति की समीक्षा कितनी प्रभावी है। विभागीय अधिकारियों की रिपोर्ट में यदि सड़कें दुरुस्त दिखाई देती हैं और जमीन पर जनता को उनका उलटा अनुभव होता है, तो आखिर इन दोनों तस्वीरों के बीच का सच क्या है?सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि सड़क निर्माण के बाद उसकी गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसकी है? ठेकेदार से लेकर विभागीय इंजीनियर और संबंधित अधिकारियों तक निगरानी की पूरी व्यवस्था होने के बावजूद सड़कें समय से पहले खराब हो रही हैं तो जवाबदेही तय क्यों नहीं होती?प्रदेश की जनता को घोषणाओं से ज्यादा जरूरत ऐसी सड़कों की है, जिन पर सुरक्षित और सुगम आवागमन हो सके। सड़कें किसी भी सरकार के विकास का सबसे प्रत्यक्ष चेहरा होती हैं। राजधानी से लेकर दूरस्थ ग्रामीण इलाकों तक यदि मार्ग बदहाल हैं तो विकास के बड़े-बड़े दावों पर भी सवाल उठना लाजिमी है।‘सड़क विकास की पहचान है या गड्ढों की पहचान?’ यह सवाल अब जनता के बीच चर्चा का विषय बनता जा रहा है।उप मुख्यमंत्री अरुण साव के सामने चुनौती केवल नई सड़कें स्वीकृत कराने की नहीं, बल्कि पहले से बनी सड़कों की गुणवत्ता, समय पर मरम्मत और निर्माण में जवाबदेही सुनिश्चित करने की भी है। यदि कहीं घटिया निर्माण या लापरवाही सामने आती है तो जांच के साथ जिम्मेदारों पर कार्रवाई भी दिखाई देनी चाहिए।सरकार यदि ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करती है तो सड़क निर्माण में भी यही सिद्धांत दिखाई देना चाहिए। जनता यह जानना चाहती है कि खराब सड़क के लिए जिम्मेदार कौन है, उसकी मरम्मत कब होगी और सरकारी धन से बने मार्ग बार-बार खराब होने की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी तय होगी?अब गेंद लोक निर्माण विभाग के पाले में है। सवाल सड़क के गड्ढों का नहीं, उन गड्ढों के पीछे छिपी व्यवस्था का है।और जनता शायद यही पूछ रही है—सड़कें कब सुधरेंगी, साहब?




