
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण केंद्र माने जाने वाले बिलासपुर जिले में जिला शिक्षा अधिकारी की कुर्सी बीते लगभग चार महीनों से नियमित नियुक्ति की प्रतीक्षा कर रही है। यह केवल एक प्रशासनिक रिक्ति नहीं, बल्कि अब शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली, नियुक्ति प्रक्रिया और सरकार की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करने वाला गंभीर विषय बन गया है। नियमित डीईओ की नियुक्ति नहीं होने के कारण विभाग प्रभारी व्यवस्था से संचालित हो रहा है और वर्तमान प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी अजय कौशिक भी आगामी 31 अगस्त को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि शिक्षा विभाग इस महत्वपूर्ण पद पर नियमित अधिकारी की नियुक्ति को लेकर आखिर इतनी देरी क्यों कर रहा है?इसी बीच प्रशासनिक और शिक्षा विभाग के गलियारों में एक और गंभीर चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। डीईओ की प्रतिष्ठित कुर्सी पर बैठने के लिए कथित तौर पर 30 लाख रुपये तक की लेन-देन की चर्चा चल रही है। हालांकि इस संबंध में अब तक किसी सक्षम सरकारी एजेंसी द्वारा कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है और न ही किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप सिद्ध हुआ है, लेकिन जब किसी महत्वपूर्ण पद की नियुक्ति को लेकर इतने बड़े स्तर पर चर्चाएं लगातार सार्वजनिक होने लगें, तो सरकार और विभाग की जिम्मेदारी केवल चुप्पी साध लेने से समाप्त नहीं हो जाती। ऐसे मामलों में पारदर्शी स्पष्टीकरण और आवश्यक होने पर निष्पक्ष जांच ही संदेह की स्थिति को समाप्त कर सकती है।बिलासपुर जिला शिक्षा अधिकारी का पद केवल कार्यालयीन महत्व वाला पद नहीं है। जिले के हजारों शिक्षक, प्राचार्य, व्याख्याता और शिक्षा विभाग के अधीन संचालित शैक्षणिक संस्थानों की प्रशासनिक व्यवस्था इस पद से सीधे प्रभावित होती है। शिक्षक नियुक्ति, पदस्थापना, विभागीय अनुशासन, विद्यालय निरीक्षण, शिक्षा की गुणवत्ता और विभिन्न प्रशासनिक निर्णयों में डीईओ की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे पद को लंबे समय तक प्रभारी व्यवस्था के भरोसे छोड़ देना अपने आप में गंभीर प्रशासनिक प्रश्न है।चार महीने तक नियमित डीईओ की नियुक्ति न होना इस बात की ओर संकेत करता है कि या तो सरकार और विभाग के पास योग्य अधिकारियों की कमी है, या फिर नियुक्ति प्रक्रिया किसी ऐसे कारण से अटकी हुई है, जिसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग में वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारियों की कोई कमी नहीं है। फिर बिलासपुर जैसे बड़े जिले के लिए नियमित जिला शिक्षा अधिकारी का चयन करने में इतनी लंबी देरी क्यों हुई? यह सवाल अब केवल शिक्षकों और विभागीय कर्मचारियों का नहीं, बल्कि अभिभावकों और आम नागरिकों का भी बन गया है।स्थिति इसलिए और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि वर्तमान प्रभारी डीईओ अजय कौशिक 31 अगस्त को सेवानिवृत्त हो जाएंगे। इसके बाद विभाग की प्रशासनिक कमान किसके हाथ में होगी, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है। क्या सरकार सेवानिवृत्ति से पहले नियमित डीईओ की नियुक्ति करेगी? क्या एक नए अधिकारी को फिर से प्रभारी बनाकर काम चलाया जाएगा? अथवा महत्वपूर्ण पद को लंबे समय तक अस्थायी व्यवस्था के भरोसे ही छोड़ दिया जाएगा? इन सवालों का स्पष्ट उत्तर शिक्षा विभाग को देना चाहिए।नियुक्ति को लेकर कथित 30 लाख रुपये की चर्चा ने पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। यह आवश्यक है कि इस तरह की चर्चाओं को अंतिम सत्य मानकर किसी व्यक्ति को दोषी घोषित न किया जाए, लेकिन इन्हें पूरी तरह नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा। आखिर प्रशासनिक गलियारों में इस प्रकार की चर्चाएं क्यों हैं? यदि चर्चा निराधार है तो सरकार और शिक्षा विभाग को स्पष्ट, पारदर्शी और तथ्यात्मक तरीके से स्थिति सामने रखनी चाहिए। और यदि किसी स्तर पर नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित करने या लेन-देन का कोई प्रयास हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।यह पहला अवसर नहीं है जब छत्तीसगढ़ में शिक्षा विभाग की नियुक्तियों और स्थानांतरण प्रक्रियाओं को लेकर सवाल उठे हैं। हाल के समय में स्थानांतरण और पदस्थापना को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं सामने आती रही हैं। ऐसे माहौल में बिलासपुर डीईओ की नियुक्ति पर कथित लेन-देन की चर्चा सरकार की छवि और विभागीय विश्वसनीयता दोनों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए इस मामले में चुप्पी से ज्यादा जरूरी है स्पष्टता।प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय लगातार सुशासन और पारदर्शी प्रशासन की बात करते हैं। यही कारण है कि बिलासपुर डीईओ की नियुक्ति जैसे मामले में सरकार की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। मुख्यमंत्री कार्यालय और स्कूल शिक्षा विभाग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह योग्यता, वरिष्ठता, प्रशासनिक क्षमता और नियमों के आधार पर हो। किसी भी प्रकार की सिफारिश, दबाव या कथित आर्थिक प्रभाव की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।शिक्षा विभाग के मंत्री और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की भी जिम्मेदारी है कि वे इस महत्वपूर्ण पद पर हो रही देरी का कारण सार्वजनिक करें। यदि नियुक्ति प्रक्रिया चल रही है तो उसकी स्थिति स्पष्ट की जाए। यदि किसी अधिकारी का नाम विचाराधीन है तो नियमों के अनुसार निर्णय लिया जाए। लेकिन चार महीने तक पद रिक्त रखना और फिर प्रभारी अधिकारी की सेवानिवृत्ति तक कोई स्पष्ट निर्णय सामने न आना, प्रशासनिक निर्णय क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा व्यवस्था किसी कुर्सी की खरीद-फरोख्त की चर्चा के साये में नहीं चल सकती। यदि नियुक्ति को लेकर बाजार में कीमत की चर्चा होती है और सरकार उस पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं देती, तो स्वाभाविक रूप से जनता के मन में संदेह पैदा होगा। इसलिए सरकार को इस मामले में पारदर्शिता का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।अब 31 अगस्त की तारीख नजदीक है। अजय कौशिक की सेवानिवृत्ति के बाद बिलासपुर शिक्षा विभाग की कमान किसके हाथ में होगी, इसका निर्णय सरकार को शीघ्र लेना होगा। इससे भी अधिक जरूरी यह है कि नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर फैल रही कथित लेन-देन की चर्चाओं पर स्थिति स्पष्ट की जाए। यदि ये चर्चाएं निराधार हैं तो उन्हें तथ्य और पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से समाप्त किया जाए। यदि कोई गंभीर तथ्य सामने आता है तो निष्पक्ष जांच कर सख्त कार्रवाई की जाए।बिलासपुर जैसे बड़े जिले की डीईओ कुर्सी आखिर चार महीने से खाली क्यों है? नियमित अधिकारी की नियुक्ति में देरी किस कारण से हो रही है? 31 अगस्त के बाद व्यवस्था क्या होगी? और सबसे अहम—30 लाख रुपये में कुर्सी मिलने की कथित चर्चा के पीछे सच्चाई क्या है?अब इन सवालों का जवाब सरकार और स्कूल शिक्षा विभाग को देना ही होगा, क्योंकि सुशासन की असली परीक्षा घोषणाओं से नहीं, बल्कि नियुक्तियों की पारदर्शिता से होती है।



