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शिक्षा विभाग में तबादलों का ‘व्हाट्सएप राज’, मुख्यमंत्री सचिवालय की चुप्पी पर सवाल…शिक्षक समूहों में कथित लेन-देन की चर्चा सार्वजनिक, मंत्री गजेन्द्र यादव के विभाग पर उठे सवाल; मुख्यमंत्री के समन्वय से हुए स्थानांतरण पर अब सचिवालय से भी जवाब की मांग।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में व्याख्याता, सहायक शिक्षक, प्राचार्य और प्रधान पाठकों के स्थानांतरण को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शिक्षकों के विभिन्न व्हाट्सएप समूहों में स्थानांतरण के नाम पर कथित रूप से हुए लेन-देन, कथित रकम और कथित प्रभावशाली माध्यमों की चर्चा सार्वजनिक हो रही है। हालांकि इन व्हाट्सएप संदेशों और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी शेष है, लेकिन सवाल यह है कि यदि शिक्षकों के बीच कथित रूप से पैसे लेने-देने की बातें इतनी खुलकर हो रही हैं, तो सरकार और मुख्यमंत्री सचिवालय इस पर मौन क्यों है?यह मामला अब केवल स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव या विभागीय अधिकारियों तक सीमित नहीं है। स्थानांतरण प्रक्रिया को मुख्यमंत्री के समन्वय से होने वाली प्रक्रिया के रूप में देखा और प्रचारित किया गया है। ऐसे में यदि इस प्रक्रिया को लेकर कथित लेन-देन के आरोप सामने आ रहे हैं तो जवाबदेही मुख्यमंत्री सचिवालय तक पहुंचती है। आखिर मुख्यमंत्री के समन्वय से हुए स्थानांतरण की प्रक्रिया में यदि कोई गड़बड़ी, पक्षपात या कथित आर्थिक लेन-देन हुआ है तो उसकी निगरानी किसने की? मुख्यमंत्री सचिवालय ने क्या पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कोई व्यवस्था बनाई थी? क्या विभाग द्वारा भेजी गई सूचियों और अनुशंसाओं का परीक्षण हुआ था?सबसे बड़ा सवाल—किसने कितने रुपये लिए और किसके नाम पर लिए?शिक्षकों के व्हाट्सएप समूहों में कथित रूप से यह चर्चा हो रही है कि स्थानांतरण के लिए अलग-अलग स्तर पर रकम की मांग या लेन-देन हुआ। व्याख्याता, सहायक शिक्षक, प्राचार्य और प्रधान पाठक जैसे विभिन्न पदों के स्थानांतरण को लेकर कथित राशि की चर्चाएं सामने आ रही हैं। अब सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि इन वायरल दावों में कितनी सच्चाई है और कितनी अफवाह।लेकिन यदि सरकार को भरोसा है कि स्थानांतरण पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया से हुए हैं तो फिर इन व्हाट्सएप संदेशों की जांच कराने में देरी क्यों? क्या सरकार यह पता लगाएगी कि कथित रूप से किसने पैसे देने की बात कही? किसने लेने का दावा किया? किस पद के स्थानांतरण के लिए कितनी राशि की कथित चर्चा हुई? और यदि किसी व्यक्ति ने किसी प्रभावशाली नाम का सहारा लेकर कथित रूप से रुपये लिए, तो उस व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई कब होगी?सवाल यह भी है कि मुख्यमंत्री सचिवालय तक पहुंची सिफारिशों का क्या हुआ?शिक्षा विभाग के स्थानांतरण को लेकर लंबे समय से यह चर्चा रही है कि अलग-अलग स्तरों से अनुशंसाएं और प्रस्ताव पहुंचे। अब सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि मुख्यमंत्री सचिवालय को किन-किन शिक्षकों और अधिकारियों के स्थानांतरण संबंधी आवेदन, अनुशंसा पत्र या प्रस्ताव प्राप्त हुए। इनमें से कितने मामलों को आगे भेजा गया, कितने नामों को स्वीकृति मिली और कितनों को अस्वीकार किया गया? क्या किसी नाम को विशेष प्राथमिकता दी गई?यदि मुख्यमंत्री के समन्वय से पूरी स्थानांतरण प्रक्रिया संचालित हुई है तो मुख्यमंत्री सचिवालय की जिम्मेदारी केवल फाइल आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं हो सकती। सचिवालय को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए था कि विभागीय प्रक्रिया तय नियमों, नीति और पारदर्शी मानकों के अनुसार चले। अब जब शिक्षकों के समूहों में कथित लेन-देन की बातें सार्वजनिक हो रही हैं, तो मुख्यमंत्री सचिवालय की चुप्पी स्वयं संदेह को बढ़ा रही है।क्या मुख्यमंत्री सचिवालय बताएगा कि स्थानांतरण की ‘एंट्री’ का रास्ता क्या था?शिक्षकों के बीच एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर स्थानांतरण सूची में नाम शामिल कराने का अंतिम रास्ता क्या था? क्या केवल विभागीय नियम और पात्रता पर्याप्त थे या फिर सिफारिश, पहुंच और कथित रूप से आर्थिक प्रभाव भी किसी स्तर पर काम कर रहा था? यही सवाल अब मुख्यमंत्री सचिवालय के सामने भी खड़ा है।यदि कोई शिक्षक वर्षों से स्थानांतरण के लिए आवेदन करता रहा और उसका नाम नहीं आया, लेकिन किसी अन्य शिक्षक का नाम कथित प्रभाव या सिफारिश के आधार पर सूची में शामिल हो गया, तो यह समानता और पारदर्शिता पर सीधा सवाल है। मुख्यमंत्री सचिवालय को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या स्थानांतरण सूची तैयार करने में कोई केंद्रीकृत परीक्षण प्रणाली थी या अलग-अलग माध्यमों से पहुंचे नामों को अंतिम सूची में शामिल किया गया।मंत्री गजेन्द्र यादव के विभाग की साख दांव परस्कूल शिक्षा विभाग की राजनीतिक जिम्मेदारी मंत्री गजेन्द्र यादव के पास है। इसलिए विभाग में हुए हर बड़े प्रशासनिक निर्णय की राजनीतिक जवाबदेही भी उनसे जुड़ती है। मंत्री को इस मामले में सामने आकर स्पष्ट करना चाहिए कि शिक्षकों के व्हाट्सएप समूहों में चल रहे कथित लेन-देन के संदेशों की जांच कौन करेगा।सिर्फ इतना कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि सरकार ने नियमों के अनुसार स्थानांतरण किए हैं। सरकार को यह भी जांचना होगा कि क्या नियमों की आड़ में कथित रूप से कोई समानांतर व्यवस्था सक्रिय थी? क्या किसी ने मंत्री, मुख्यमंत्री, सचिवालय या किसी वरिष्ठ अधिकारी के नाम का कथित इस्तेमाल कर शिक्षकों से पैसे लिए? यदि ऐसा हुआ है तो फिर ऐसे लोगों को बेनकाब करना भी सरकार की जिम्मेदारी है।मुख्यमंत्री की छवि पर सीधा असरविष्णु देव साय सरकार लगातार सुशासन और पारदर्शी प्रशासन की बात करती रही है। ऐसे में स्कूल शिक्षा विभाग के स्थानांतरण को लेकर सामने आ रही कथित चर्चाएं मुख्यमंत्री की छवि को प्रभावित कर सकती हैं। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इस प्रक्रिया को मुख्यमंत्री के समन्वय से हुई प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।अब मुख्यमंत्री के सामने भी परीक्षा है। क्या वे इस मामले में स्वतः संज्ञान लेंगे? क्या मुख्यमंत्री सचिवालय से स्थानांतरण संबंधी पूरी प्रक्रिया का विवरण मांगा जाएगा? क्या उन कथित व्हाट्सएप संदेशों की साइबर और विभागीय स्तर पर जांच होगी? क्या शिक्षकों के आरोपों और दावों को शपथपत्र के आधार पर दर्ज कराया जाएगा?यदि आरोप निराधार हैं तो सरकार को तथ्यों के साथ उन्हें खारिज करना चाहिए। लेकिन यदि कथित लेन-देन के पीछे सच्चाई है तो फिर कार्रवाई केवल किसी छोटे कर्मचारी, शिक्षक या कथित बिचौलिए तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जांच वहां तक पहुंचनी चाहिए, जहां तक कथित लेन-देन की पूरी श्रृंखला जाती है।‘कौन ले गया और किसके नाम पर ले गया’—अब यही बड़ा सवालस्कूल शिक्षा विभाग में स्थानांतरण के नाम पर कथित पैसों की चर्चा करने वालों के नाम, संदेश और दावों की पड़ताल आवश्यक है। यदि किसी शिक्षक से पैसे लेने का आरोप है तो यह भी पता लगना चाहिए कि पैसा किसने लिया, किसे दिया गया और बदले में किस शिक्षक का स्थानांतरण हुआ।सर्वव्यापी अब इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल कर रहा है। व्हाट्सएप समूहों में सार्वजनिक हो रहे कथित संदेशों, संबंधित शिक्षकों के दावों और स्थानांतरण सूची के पैटर्न की जांच की जा रही है। सर्वव्यापी जल्द ही इस कथित खेल से जुड़े तथ्यों और उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर बड़ा खुलासा करेगा।अब गेंद मुख्यमंत्री सचिवालय के पाले में है। क्या सचिवालय इस पूरे मामले पर मौन रहेगा या स्वयं सामने आकर बताएगा कि स्थानांतरण की प्रक्रिया में उसकी भूमिका क्या रही? क्या मुख्यमंत्री सचिवालय कथित लेन-देन के आरोपों की जांच कराएगा? क्या मंत्री गजेन्द्र यादव विभागीय स्तर पर तथ्य सार्वजनिक करेंगे?छत्तीसगढ़ के हजारों शिक्षक और जनता अब जवाब चाहती है—स्थानांतरण केवल नियमों से हुए या सिफारिश और कथित ‘लेन-देन’ की कोई समानांतर व्यवस्था भी सक्रिय थी?सवाल बड़े हैं, जवाब की जिम्मेदारी भी बड़ी है—क्योंकि मामला अब केवल शिक्षा विभाग का नहीं, बल्कि सरकार, मंत्री और मुख्यमंत्री सचिवालय की पारदर्शिता और विश्वसनीयता का बन चुका है।

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