
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
“यह पैसा बोलता है, पैसा बोलता है…”—फिल्म काला बाजार का यह चर्चित गीत, जिसे अभिनेता कादर खान पर फिल्माया गया था, आज छत्तीसगढ़ की मौजूदा राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर व्यंग्य की तरह सटीक बैठता हुआ महसूस किया जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि यह गीत कितना लोकप्रिय था, बल्कि सवाल यह है कि क्या आज छत्तीसगढ़ के सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में भी योग्यता, वरिष्ठता, नियम और पारदर्शिता से अधिक प्रभावशाली कोई दूसरी भाषा बोलने लगी है—और वह भाषा है पैसे की भाषा?राजधानी से लेकर संभाग, जिला, विकासखंड और छोटे-छोटे कार्यालयों तक इन दिनों एक चर्चा लगातार सुनाई दे रही है। अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच होने वाली अनौपचारिक बातचीत में तबादला, पदस्थापना, प्रतिनियुक्ति, मनपसंद पद, मलाईदार जिम्मेदारी और महत्वपूर्ण कुर्सियों को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं सामने आती हैं। यह संपादकीय किसी अप्रमाणित चर्चा को अंतिम सत्य घोषित नहीं करता, लेकिन जब एक जैसी बातें अलग-अलग स्तरों पर लगातार सुनाई देने लगें तो सत्ता के लिए उन्हें नजरअंदाज करना भी उचित नहीं कहा जा सकता। धुआं हर बार आग का प्रमाण नहीं होता, लेकिन लगातार उठता धुआं जांच की आवश्यकता जरूर पैदा करता है।भाजपा सरकार छत्तीसगढ़ में सुशासन, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का दावा करती रही है। चुनावी राजनीति में भी यही संदेश दिया गया कि व्यवस्था बदलेगी, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा और शासन का आधार सिफारिश नहीं बल्कि नियम और योग्यता होंगे। लेकिन जमीनी स्तर पर यदि कर्मचारी यह महसूस करने लगें कि नियमों की किताब एक तरफ रख दी जाती है और काम निकलवाने के लिए किसी प्रभावशाली व्यक्ति या कथित लेन-देन का सहारा लेना पड़ता है, तो सरकार के बड़े-बड़े दावों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।सबसे अधिक चर्चा तबादला और पदस्थापना को लेकर है। आखिर क्यों एक ही स्थान के लिए कई लोग प्रयास करते हैं? क्यों शहरों और सुविधाजनक स्थानों पर पदस्थापना की होड़ रहती है? क्यों दूरस्थ क्षेत्रों में पदस्थापना को दंड की तरह देखा जाता है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की पदस्थापना पूरी तरह नियमों और आवश्यकता के आधार पर होती है, तो फिर हर तबादला सूची के साथ लेन-देन की चर्चाएं क्यों जन्म लेती हैं? सरकार को इन सवालों का राजनीतिक जवाब नहीं, बल्कि प्रशासनिक और संस्थागत उत्तर देना होगा।मंत्रालयों के गलियारों में बैठा कोई बाबू हो, किसी विभाग का अधिकारी हो, किसी मंत्री का कार्यालय हो या जिला स्तर का प्रशासन—हर स्तर पर यह धारणा मजबूत होना शासन के लिए अत्यंत खतरनाक है कि “काम का रास्ता नियमों से नहीं, बल्कि रसूख और पैसे से होकर जाता है।” यह धारणा भले ही हर मामले में सही न हो, लेकिन यदि इसे तोड़ने के लिए सरकार ठोस कदम नहीं उठाती तो धीरे-धीरे यही धारणा जनता की स्थायी राय बन जाती है।लोकतंत्र में सरकार केवल ईमानदार होने से नहीं चलती, बल्कि ईमानदार दिखाई भी देनी चाहिए। मुख्यमंत्री से लेकर मुख्य सचिव और विभागीय प्रमुखों तक की जिम्मेदारी है कि वे ऐसी व्यवस्था विकसित करें, जिसमें किसी कर्मचारी को यह महसूस ही न हो कि उसका भविष्य किसी बिचौलिए, दलाल, निजी सहायक या सत्ता के किसी प्रभावशाली व्यक्ति की कृपा पर निर्भर है। हर महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय का स्पष्ट आधार हो, उसकी प्रक्रिया सार्वजनिक हो और शिकायत मिलने पर उसकी स्वतंत्र जांच की व्यवस्था हो।आज जरूरत इस बात की है कि तबादला, पदस्थापना और प्रतिनियुक्ति जैसे संवेदनशील मामलों को अधिकतम डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए। किस पद पर कौन अधिकारी या कर्मचारी क्यों भेजा गया, किस नियम के तहत भेजा गया, किस सक्षम प्राधिकारी ने निर्णय लिया और चयन का आधार क्या था—यह व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए। यदि अपवाद किया गया है तो उसका कारण भी रिकॉर्ड में होना चाहिए। अंधेरे में लिए गए फैसले हमेशा संदेह को जन्म देते हैं, जबकि पारदर्शिता सबसे बड़े संदेह को भी समाप्त कर सकती है।वर्तमान सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष के आरोपों का जवाब देना नहीं है। विपक्ष तो अपनी राजनीति करेगा ही। असली चुनौती उन चर्चाओं को समाप्त करना है जो सरकार के अपने प्रशासनिक तंत्र के भीतर चल रही हैं। जब अधिकारी और कर्मचारी ही व्यवस्था पर सवाल उठाने लगें, जब मंत्रालय से लेकर जिला कार्यालयों तक “पैसा बोलता है” जैसी पंक्ति व्यंग्य के रूप में दोहराई जाने लगे, तब इसे सामान्य बातचीत मानकर टालना खतरनाक हो सकता है।सरकार को चाहिए कि वह किसी भी विभाग, मंत्री कार्यालय या प्रशासनिक इकाई पर सीधे आरोप लगाने के बजाय एक व्यापक और निष्पक्ष व्यवस्था तैयार करे। पुराने और विवादास्पद तबादलों तथा पदस्थापनाओं की समीक्षा हो, शिकायतों के लिए गोपनीय लेकिन प्रभावी तंत्र बनाया जाए, शिकायतकर्ता को प्रताड़ना से सुरक्षा मिले और यदि कहीं लेन-देन या बिचौलियों की भूमिका के प्रमाण मिलें तो चाहे व्यक्ति कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो।सवाल भाजपा सरकार की नीयत पर अंतिम फैसला सुनाने का नहीं है। सवाल उसकी परीक्षा का है। जनता और कर्मचारी दोनों यह देख रहे हैं कि सुशासन के दावों और जमीनी चर्चाओं के बीच सरकार किसके साथ खड़ी दिखाई देती है। क्या सरकार इन चर्चाओं को दबाने का प्रयास करेगी, या उनकी जड़ तक पहुंचकर व्यवस्था को साफ करेगी?फिल्मी गीत का एक संवादनुमा संदेश आज सत्ता के गलियारों में व्यंग्य बनकर घूम रहा है—“यह पैसा बोलता है।” लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह संदेश कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता। यहां संविधान बोलना चाहिए, कानून बोलना चाहिए, नियम बोलना चाहिए, योग्यता बोलनी चाहिए और जनता का विश्वास बोलना चाहिए।मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और उनकी सरकार के सामने अब चुनौती साफ है—इन जमीनी चर्चाओं को केवल अफवाह बताकर खारिज करने से बात नहीं बनेगी। सरकार को ऐसी पारदर्शी कार्रवाई करनी होगी कि मंत्रालय से लेकर गांव के अंतिम कार्यालय तक एक ही संदेश जाए—छत्तीसगढ़ में यदि कुछ बोलेगा तो वह पैसा नहीं, बल्कि नियम और न्याय बोलेगा।वरना जनता पूछती रहेगी—क्या “यह पैसा बोलता है” केवल एक फिल्मी गीत है, या फिर यह सुशासन के दावों के बीच छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था का कटु व्यंग्य बनता जा रहा है?




