
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की विष्णु देव साय सरकार के लगभग ढाई साल के कार्यकाल में सत्ता और प्रशासन के बीच समन्वय को लेकर कई तरह की चर्चाएं सामने आती रही हैं, लेकिन मुख्यमंत्री सचिवालय की कार्यप्रणाली को करीब से देखने वाले प्रशासनिक गलियारों में एक नाम लगातार खास तौर पर चर्चा में रहा है—मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह। सवाल यह नहीं है कि वे मुख्यमंत्री के कितने भरोसेमंद अधिकारी हैं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि मुख्यमंत्री की प्राथमिकताओं को प्रशासनिक निर्णयों में बदलने वाली व्यवस्था में उनकी वास्तविक भूमिका कितनी व्यापक है?मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव का पद वैसे तो शासन व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन हर सरकार में इस पद की कार्यशैली और प्रभाव का अपना अलग स्वरूप होता है। विष्णु देव साय सरकार में सुबोध कुमार सिंह की भूमिका को लेकर यही बात चर्चा का विषय बनी हुई है। मुख्यमंत्री की राजनीतिक प्राथमिकताओं, विभागों की प्रशासनिक मशीनरी और सचिवालय की निर्णय प्रक्रिया के बीच जिस स्तर पर समन्वय की आवश्यकता होती है, वहां प्रमुख सचिव की भूमिका केवल फाइलों के संचालन तक सीमित नहीं रहती। वह सरकार की गति, प्राथमिकता और निर्णयों के प्रशासनिक क्रियान्वयन की महत्वपूर्ण कड़ी बन जाती है।सुबोध कुमार सिंह के मामले में भी प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा सुनाई देती है कि मुख्यमंत्री के महत्वपूर्ण निर्णयों को प्रशासनिक धरातल पर गति देने में उनकी भूमिका अहम है। हालांकि किसी अधिकारी की वास्तविक प्रभावशीलता का आकलन केवल चर्चाओं से नहीं, बल्कि सरकार के निर्णयों के परिणाम और प्रशासनिक व्यवस्था में दिखाई देने वाले बदलावों से किया जाना चाहिए। यही वह बिंदु है जहां सुबोध कुमार सिंह की कार्यशैली का निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी हो जाता है।साय सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस, सुशासन, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही को अपनी प्राथमिकताओं में रखा है। ऐसे में मुख्यमंत्री सचिवालय की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। मुख्यमंत्री की घोषणाएं यदि जिलों तक प्रभावी रूप से पहुंचती हैं, विभागीय निर्णय समय पर होते हैं, शिकायतों पर कार्रवाई होती है और अधिकारियों की जवाबदेही तय होती है तो उसके पीछे काम करने वाले प्रशासनिक तंत्र की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। लेकिन इसके उलट यदि कहीं नियमों से अधिक ‘सिस्टम’ की चर्चा होने लगे, स्थानांतरण और पदस्थापना जैसे मामलों में सवाल उठें अथवा विभागीय स्तर पर निर्णयों को लेकर असंतोष सामने आए, तो मुख्यमंत्री सचिवालय की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।यही कारण है कि सुबोध कुमार सिंह को लेकर चर्चा केवल एक अधिकारी की व्यक्तिगत कार्यशैली तक सीमित नहीं रह गई है। असल सवाल यह है कि मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव के रूप में वे सरकार की प्रशासनिक रीढ़ को किस तरह संचालित कर रहे हैं और मुख्यमंत्री की राजनीतिक इच्छाशक्ति को किस तरह प्रशासनिक निर्णयों में परिवर्तित कर रहे हैं। किसी भी सरकार में मुख्यमंत्री की सफलता का एक बड़ा आधार यह होता है कि मुख्यमंत्री कार्यालय और मैदानी प्रशासन के बीच संवाद कितना प्रभावी है।सुबोध कुमार सिंह के सामने चुनौती भी इसी स्तर की है। मुख्यमंत्री की छवि को सुशासन और संवेदनशील प्रशासन से जोड़ने वाली सरकार में प्रमुख सचिव के स्तर पर केवल निर्णयों का समन्वय पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि प्रत्येक विभाग में निर्णय प्रक्रिया नियम आधारित हो, अधिकारियों की जवाबदेही स्पष्ट हो और मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस नीति केवल भाषणों और सरकारी विज्ञप्तियों तक सीमित न रहे, बल्कि उसके परिणाम जनता को दिखाई दें।प्रशासनिक व्यवस्था में सबसे बड़ी ताकत अक्सर वही होती है जो दिखाई नहीं देती। मुख्यमंत्री मंच पर सरकार की दिशा बताते हैं, मंत्री राजनीतिक फैसलों का नेतृत्व करते हैं और अधिकारी उन फैसलों को जमीन पर उतारते हैं। इस पूरी व्यवस्था के बीच मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव जैसे पद पर बैठे अधिकारी की भूमिका पर्दे के पीछे रहते हुए भी बेहद प्रभावशाली हो सकती है। इसलिए सुबोध कुमार सिंह को लेकर चल रही चर्चाओं का वास्तविक परीक्षण भी इसी कसौटी पर होना चाहिए कि मुख्यमंत्री सचिवालय से निकलने वाले निर्णयों का असर शासन की अंतिम पंक्ति तक कितना दिखाई देता है।यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है—क्या मुख्यमंत्री कार्यालय सरकार के सभी विभागों की वास्तविक स्थिति से उतनी ही गहराई से जुड़ा हुआ है, जितनी मुख्यमंत्री की अपेक्षा है? यदि किसी विभाग में अनियमितता, विवाद, स्थानांतरण को लेकर असंतोष, प्रशासनिक लापरवाही अथवा जनता की शिकायतें लगातार सामने आती हैं, तो मुख्यमंत्री सचिवालय की मॉनिटरिंग व्यवस्था की भूमिका स्वतः जांच के दायरे में आती है। प्रमुख सचिव के स्तर पर यही वह क्षेत्र है जहां प्रशासनिक दक्षता और राजनीतिक नेतृत्व के बीच वास्तविक तालमेल की परीक्षा होती है।सुबोध कुमार सिंह की प्रशासनिक पहचान को केवल ‘मुख्यमंत्री के भरोसेमंद अधिकारी’ के रूप में देखना शायद अधूरा मूल्यांकन होगा। असली सवाल यह है कि क्या वे मुख्यमंत्री की नीतियों को प्रभावी प्रशासनिक परिणामों में बदलने वाले रणनीतिक समन्वयक की भूमिका निभा रहे हैं? क्या वे विभागों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित कर पा रहे हैं? क्या शिकायतों और विवादों की जानकारी मुख्यमंत्री तक समय पर पहुंच रही है? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस नीति के रास्ते में आने वाली प्रशासनिक बाधाओं की पहचान कर उन्हें दूर किया जा रहा है?इन सवालों के जवाब आने वाले समय में साय सरकार की प्रशासनिक दिशा को भी स्पष्ट करेंगे। क्योंकि किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल मुख्यमंत्री के बयानों से नहीं, बल्कि सचिवालय से लेकर गांव और शहर तक प्रशासन के व्यवहार से होता है। यदि मुख्यमंत्री की प्राथमिकताएं जमीन पर असर पैदा करती हैं तो मुख्यमंत्री सचिवालय की कार्यशैली सफल मानी जाएगी, लेकिन यदि घोषणाओं और जमीनी हकीकत के बीच दूरी बढ़ती है तो उस दूरी की समीक्षा भी उसी प्रशासनिक तंत्र की करनी होगी जो मुख्यमंत्री की प्राथमिकताओं को क्रियान्वित करने के लिए जिम्मेदार है।इस लिहाज से सुबोध कुमार सिंह की भूमिका आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो जाती है। एक ओर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार से सुशासन और पारदर्शिता की अपेक्षाएं हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक तंत्र में यह संदेश स्पष्ट होना जरूरी है कि सत्ता के गलियारों में किसी व्यक्ति की पहुंच नहीं, बल्कि नियम और परिणाम सर्वोच्च होंगे। मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव के रूप में सुबोध कुमार सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी यही है कि सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को प्रशासनिक व्यवस्था में वास्तविक ‘जीरो टॉलरेंस’ के रूप में स्थापित किया जाए।कुल मिलाकर सुबोध कुमार सिंह की भूमिका को लेकर उठ रही चर्चाओं का निष्कर्ष किसी व्यक्ति विशेष के प्रभाव की कहानी से अधिक मुख्यमंत्री सचिवालय की कार्यप्रणाली की समीक्षा में छिपा है। सवाल यह नहीं कि मुख्यमंत्री के सबसे भरोसेमंद अधिकारी कौन हैं; सवाल यह है कि मुख्यमंत्री के भरोसे को प्रशासनिक परिणामों में कौन और किस हद तक बदल पा रहा है। आने वाला समय यह तय करेगा कि सुबोध कुमार सिंह की भूमिका केवल मुख्यमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी की रही, या वे साय सरकार के प्रशासनिक मॉडल को आकार देने वाले प्रमुख सूत्रधार के रूप में अपनी अलग पहचान कायम कर पाए।


