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जीरो टॉलरेंस की बात बेमानी? छत्तीसगढ़ में तबादलों पर उठे सवाल, बोली और सिफारिश के आरोपों से घिरी व्यवस्था नीति पारदर्शिता की, लेकिन प्रक्रिया पर सवाल क्यों? तबादला सूची जारी होते ही कर्मचारियों के बीच शुरू हुई चर्चाएं—किसे राहत, किसे सजा और किसके लिए खुला रास्ता?

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में सरकार भले ही भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति का दावा करती हो, लेकिन सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के तबादलों को लेकर लगातार उठ रहे सवाल इस दावे की गंभीर परीक्षा लेते नजर आ रहे हैं। प्रदेश में तबादला सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं रह गया है, बल्कि लंबे समय से यह कर्मचारियों के बीच सबसे संवेदनशील और विवादित मुद्दों में शामिल रहा है। अब एक बार फिर तबादला आदेशों के बाद यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर स्थानांतरण की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और क्या वास्तव में हर कर्मचारी को समान अवसर मिल रहा है?हाल के दिनों में शिक्षा विभाग में सैकड़ों शिक्षकों के तबादले हुए हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार करीब 700 शिक्षकों का स्थानांतरण किया गया, जबकि लगभग 400 प्रस्तावों को विभिन्न कारणों से रोक दिया गया। सरकार की ओर से प्रक्रिया को छंटनी के बाद अंतिम रूप देने और भविष्य में ऑनलाइन व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ने की बात सामने आई है। लेकिन दूसरी ओर, तबादला सूची को लेकर कर्मचारी संगठनों और राजनीतिक स्तर पर पारदर्शिता के सवाल भी उठ रहे हैं। बैकडोर ट्रांसफर बंद करने और खुली स्थानांतरण नीति लागू करने की मांग भी सामने आई है।सवाल यहीं से शुरू होता है—अगर पूरी प्रक्रिया नियम, आवश्यकता और प्रशासनिक हित के आधार पर हो रही है, तो फिर कर्मचारियों के बीच सिफारिश, पहुंच और लेन-देन की चर्चाएं क्यों जन्म लेती हैं? क्या तबादले की प्रक्रिया इतनी पारदर्शी है कि हर कर्मचारी यह समझ सके कि उसका नाम सूची में क्यों आया और किसी दूसरे कर्मचारी का नाम क्यों नहीं आया?तबादला नीति पर पहले भी उठते रहे हैं सवालछत्तीसगढ़ में स्थानांतरण नीति को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। पिछले वर्ष भी नीति के दायरे और विभिन्न विभागों को इससे बाहर रखने को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हुए थे। कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि बड़ी संख्या में कर्मचारियों को स्थानांतरण नीति के दायरे से बाहर रखा गया और तबादलों में मनमानी की आशंका बनी रही। साथ ही, पार्टी नेताओं ने तबादलों में कथित लेन-देन के आरोप भी लगाए थे। हालांकि ये राजनीतिक आरोप हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।यही कारण है कि आज जरूरत केवल तबादला आदेश जारी करने की नहीं, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक जांच के दायरे में लाने की है। यदि सरकार वास्तव में जीरो टॉलरेंस की नीति पर चल रही है तो उसे यह स्पष्ट करना चाहिए कि स्थानांतरण के लिए आवेदन से लेकर अंतिम आदेश तक कौन-कौन से मानदंड अपनाए गए।‘बोली’ की चर्चा क्यों?प्रदेश के अलग-अलग विभागों में कर्मचारियों के बीच अक्सर यह चर्चा सुनाई देती है कि पसंदीदा जगह पर पदस्थापना के लिए केवल पात्रता और वरिष्ठता पर्याप्त नहीं होती, बल्कि प्रभावशाली लोगों की सिफारिश भी जरूरी होती है। इससे भी गंभीर आरोप तब सामने आते हैं जब किसी पद या स्थान को लेकर कथित रूप से रकम तय होने की चर्चाएं शुरू हो जाती हैं।ऐसे आरोपों की पुष्टि के लिए ठोस दस्तावेज, लेन-देन के प्रमाण अथवा अधिकृत जांच जरूरी है। लेकिन सरकार के लिए यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि ऐसी चर्चाओं को पूरी तरह नजरअंदाज न किया जाए। क्योंकि प्रशासन में भ्रष्टाचार सिर्फ उस समय नहीं होता जब रिश्वत साबित हो जाए; भ्रष्टाचार की संभावना का वातावरण भी व्यवस्था में भरोसा कमजोर करता है।एक ही विभाग में अलग-अलग नियम क्यों?तबादलों को लेकर दूसरा बड़ा सवाल समानता का है। यदि किसी कर्मचारी के लिए न्यूनतम कार्यकाल, प्रशासनिक आवश्यकता, रिक्त पद और पदस्थापना के नियम लागू हैं, तो वही नियम दूसरे कर्मचारी पर भी लागू होने चाहिए। नियमों में अपवाद हो सकते हैं, लेकिन हर अपवाद का कारण रिकॉर्ड पर होना चाहिए।यदि किसी कर्मचारी का तबादला प्रशासनिक आवश्यकता के नाम पर किया जाता है और दूसरे कर्मचारी को उसी स्थान पर बने रहने दिया जाता है, तो दोनों मामलों के आधार को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यही पारदर्शिता है।‘विकल्प’ की व्यवस्था भी बने जांच का विषयतबादला आदेशों में जब कर्मचारियों को किसी निश्चित पदस्थापना के बजाय जिला शिक्षा अधिकारी अथवा संबंधित अधिकारी के विकल्प पर भेजा जाता है, तब वास्तविक पदस्थापना की प्रक्रिया और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे मामलों में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बाद की पदस्थापना भी स्पष्ट, नियमबद्ध और रिकॉर्डेड हो।वरना सवाल उठना स्वाभाविक है कि आदेश तो पारदर्शी है, लेकिन उसके बाद की प्रक्रिया किसके नियंत्रण में है?सरकार चाहे तो खत्म हो सकता है पूरा विवादतबादलों में कथित बोली और सिफारिश की चर्चाओं को खत्म करने का सबसे आसान रास्ता है—पूरी प्रक्रिया को डिजिटल और सार्वजनिक बनाना।सरकार को चाहिए कि प्रत्येक तबादले के साथ कम से कम ये जानकारी सार्वजनिक करे—कर्मचारी का वर्तमान पदस्थापन, वर्तमान स्थान पर कार्यकाल, तबादले का कारण, नई पदस्थापना का आधार, संबंधित पद की रिक्तता, प्राप्त आवेदनों की संख्या और चयन के निर्धारित मानदंड।यदि किसी मामले में प्रशासनिक आवश्यकता अथवा विशेष परिस्थिति के कारण सामान्य नियम से अलग निर्णय लिया गया है तो उसका कारण भी आदेश में दर्ज होना चाहिए।इससे सिफारिश और कथित लेन-देन की गुंजाइश स्वतः कम होगी।जीरो टॉलरेंस सिर्फ भाषण में नहीं, व्यवस्था में दिखना चाहिएसरकार यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ वास्तव में जीरो टॉलरेंस चाहती है तो उसे तबादला प्रक्रिया को सबसे पहले पारदर्शी बनाना होगा। क्योंकि तबादला किसी कर्मचारी के लिए केवल कार्यालय बदलने का आदेश नहीं होता। इसके साथ उसका परिवार, बच्चों की पढ़ाई, आवास, आर्थिक स्थिति और सामाजिक जीवन जुड़ा होता है।ऐसे में यदि किसी कर्मचारी को नियम के तहत उसका अधिकार नहीं मिलता और किसी प्रभावशाली व्यक्ति को कथित सिफारिश के आधार पर लाभ मिल जाता है, तो यह सिर्फ एक कर्मचारी के साथ अन्याय नहीं बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल है।छत्तीसगढ़ सरकार को अब आरोपों से आगे बढ़कर प्रमाणित पारदर्शिता दिखानी होगी। यदि तबादलों में कोई गड़बड़ी नहीं है तो पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक करने में सरकार को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। और यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी जांच और दोषियों पर कार्रवाई ही जीरो टॉलरेंस की वास्तविक पहचान होगी।क्योंकि सवाल अब सिर्फ तबादले का नहीं है—सवाल यह है कि सरकारी व्यवस्था में पद और पोस्टिंग योग्यता से मिल रही है या पहुंच से?

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