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संपादक की कलम से…सहमति के रिश्ते से बलात्कार के आरोप तक: कानून, नैतिकता और वास्तविक पीड़ितों के दर्द पर सवाल!

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

प्रेम, शारीरिक संबंध, विवाह का वादा और बलात्कार के आरोपों के बीच की महीन रेखा को समझना जरूरी; न निर्दोष को सजा मिले, न दोषी कानून से बच पाए..!समाज में प्रेम, विश्वास और शारीरिक संबंधों को लेकर बदलती सोच के बीच एक ऐसा सवाल लगातार चर्चा में आता है, जिस पर भावनाओं के बजाय विवेक, संवेदनशीलता और कानूनी समझ के साथ विचार करने की आवश्यकता है। आखिर सहमति से बने शारीरिक संबंधों और बलात्कार के बीच की वास्तविक सीमा क्या है? क्या दो वयस्कों के बीच वर्षों तक चले प्रेम संबंध, आपसी सहमति से बने शारीरिक रिश्ते और भविष्य में विवाह की उम्मीद के बाद संबंध टूट जाने पर हर मामले को एक ही नजरिये से देखा जा सकता है? या फिर प्रत्येक मामले की परिस्थितियों, दोनों पक्षों के बयानों, उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर अलग-अलग जांच होनी चाहिए? ये ऐसे प्रश्न हैं, जिनका उत्तर किसी एक पक्ष को दोषी ठहराकर नहीं, बल्कि निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों को ध्यान में रखकर तलाशना होगा।आज जब प्रेम संबंधों में दरार आने, विवाह को लेकर मतभेद पैदा होने अथवा वर्षों पुराने रिश्तों के टूटने के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की खबरें सामने आती हैं, तब समाज के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती खड़ी होती है। एक तरफ ऐसे पुरुष हो सकते हैं, जिनका आरोप है कि उन्होंने किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से संबंध बनाए और रिश्ता टूटने के बाद उनके विरुद्ध बलात्कार का मामला दर्ज करा दिया गया। दूसरी तरफ ऐसी महिलाएं भी हो सकती हैं, जो यह आरोप लगाती हैं कि विवाह का भरोसा देकर उन्हें शारीरिक संबंध बनाने के लिए राजी किया गया, जबकि शुरुआत से ही विवाह का वादा छलपूर्ण था। इन दोनों परिस्थितियों को एक जैसा मान लेना न्याय के उद्देश्य को कमजोर कर सकता है। इसलिए जरूरी है कि न किसी शिकायत को बिना जांच झूठा घोषित किया जाए और न किसी आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति को अदालत के निर्णय से पहले अपराधी मान लिया जाए।सहमति का अर्थ समझना सबसे जरूरी है। दो वयस्कों के बीच आपसी इच्छा से बना शारीरिक संबंध अपने आप में बलात्कार नहीं है। लेकिन सहमति का प्रश्न केवल इस बात से तय नहीं होता कि संबंध एक बार बना था या कई वर्षों तक चलता रहा। यह भी देखना आवश्यक है कि संबंधित व्यक्ति की सहमति स्वतंत्र थी या नहीं, कहीं दबाव, धमकी, धोखे अथवा कानून में मान्य किसी अन्य परिस्थिति का प्रभाव तो नहीं था। किसी संबंध की अवधि अपने आप में न तो सहमति का निर्णायक प्रमाण है और न ही बलात्कार के आरोप को खारिज करने का आधार।यदि दो वयस्क अपनी इच्छा से प्रेम संबंध में रहते हैं, साथ समय बिताते हैं और आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो बाद में रिश्ते में मतभेद पैदा होना या विवाह न हो पाना अपने आप में पहले बने प्रत्येक शारीरिक संबंध को बलात्कार नहीं बना देता। इसी तरह केवल इस आधार पर किसी महिला की शिकायत को खारिज नहीं किया जा सकता कि वह आरोपी के साथ लंबे समय तक संबंध में रही थी। वास्तविक प्रश्न यह है कि संबंध बनाते समय परिस्थितियां क्या थीं, विवाह का वादा किस संदर्भ में किया गया था, क्या वह वादा शुरू से ही छलपूर्ण था, और क्या उपलब्ध साक्ष्य अपराध के कानूनी तत्वों को स्थापित करते हैं।यही वह बिंदु है, जहां भावनात्मक प्रतिक्रिया और कानूनी विवेचना के बीच अंतर करना आवश्यक हो जाता है। किसी रिश्ते का टूटना दुखद हो सकता है। प्रेम में विश्वासघात भी किसी व्यक्ति को मानसिक रूप से तोड़ सकता है। लेकिन हर विश्वासघात का स्वरूप कानूनी रूप से बलात्कार नहीं होता और हर विवाह संबंधी वादा पूरा न होना अपने आप में आपराधिक अपराध नहीं है। दूसरी ओर, यदि विवाह का झूठा वादा शुरुआत से ही छल करने के उद्देश्य से किया गया था और उसी छल के कारण शारीरिक संबंध बनाए गए, तो मामले की परिस्थितियों के अनुसार आपराधिक दायित्व बन सकता है। कानून की कसौटी पर इन तथ्यों की जांच होना आवश्यक है।यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल उठता है—क्या किसी पुरुष के साथ अन्याय होने की आशंका पर बात करना महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ है? बिल्कुल नहीं। न्याय की मांग किसी एक लिंग तक सीमित नहीं हो सकती। जिस प्रकार किसी महिला को यौन हिंसा की शिकायत दर्ज कराने और निष्पक्ष जांच पाने का अधिकार है, उसी प्रकार किसी पुरुष को भी निष्पक्ष जांच, अपना पक्ष रखने और कानून के समक्ष निर्दोष साबित होने का अवसर पाने का अधिकार है। न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है, जब शिकायतकर्ता की बात गंभीरता से सुनी जाए और आरोपी के अधिकारों की भी रक्षा हो।लेकिन इस बहस में एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिए। वास्तविक बलात्कार की पीड़ा केवल शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। जिस महिला या युवती के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरदस्ती हुई हो, जिसे धमकाया गया हो, जिसकी असहमति को कुचला गया हो अथवा जिसे किसी अन्य प्रकार से यौन हिंसा का शिकार बनाया गया हो, उसके लिए यह केवल एक कानूनी मामला नहीं, बल्कि जीवन भर साथ रह जाने वाला गहरा मानसिक आघात भी हो सकता है। ऐसे पीड़ितों के लिए न्याय की लड़ाई कई बार सामाजिक बदनामी, मानसिक तनाव, परिवार के दबाव और बार-बार अपनी पीड़ा बयान करने की विवशता से भरी होती है।इसलिए बलात्कार जैसे गंभीर अपराध पर चर्चा करते समय भाषा और दृष्टिकोण की मर्यादा बनाए रखना बेहद जरूरी है। यह कहना कि किसी महिला ने लंबे समय तक संबंध बनाए, इसलिए उसके साथ बलात्कार हो ही नहीं सकता, गलत निष्कर्ष होगा। इसी तरह यह मान लेना कि विवाह नहीं हुआ, इसलिए हर शारीरिक संबंध बलात्कार था, कानूनी दृष्टि से उचित नहीं है। दोनों ही स्थितियों में तथ्यों और परिस्थितियों की जांच जरूरी है। किसी भी पीड़िता के अनुभव का उपहास करना या किसी आरोपी को बिना सुनवाई दोषी ठहरा देना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।समाज को यह भी समझना होगा कि सहमति कोई स्थायी अनुमति-पत्र नहीं है। किसी व्यक्ति ने पहले शारीरिक संबंध के लिए सहमति दी थी, इसका अर्थ यह नहीं कि वह हर बार सहमति देने के लिए बाध्य है। किसी भी समय असहमति का सम्मान किया जाना चाहिए। दूसरी तरफ, किसी रिश्ते के समाप्त हो जाने से अतीत की हर सहमति स्वतः समाप्त होकर अपराध में नहीं बदल जाती। प्रत्येक घटना की वास्तविक परिस्थितियां महत्वपूर्ण होती हैं। यही वह बारीकी है, जिसे समझे बिना सोशल मीडिया की बहसें अक्सर एक पक्ष के समर्थन और दूसरे के चरित्र हनन में बदल जाती हैं।विवाह के वादे से जुड़े मामलों में भी कानून की भूमिका महत्वपूर्ण है। वादा करते समय वास्तव में क्या मंशा थी, क्या वह वादा केवल संबंध बनाने के लिए छलपूर्वक किया गया था, क्या परिस्थितियां बाद में बदलीं, क्या दोनों के बीच विवाह को लेकर वास्तविक बातचीत और प्रयास हुए थे, और क्या शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि करने वाले साक्ष्य मौजूद हैं—इन सवालों पर विचार किए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है। केवल संबंध टूट जाने या विवाह न हो पाने को अपराध का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। साथ ही, किसी व्यक्ति द्वारा विवाह का झूठा भरोसा देकर दूसरे की सहमति प्राप्त करने के आरोप को केवल प्रेम संबंध का नाम देकर नजरअंदाज भी नहीं किया जाना चाहिए।भारतीय कानून में बलात्कार और सहमति से संबंधित अपराधों के लिए विशिष्ट प्रावधान हैं। एक जुलाई 2024 से लागू भारतीय न्याय संहिता में बलात्कार की परिभाषा और उससे संबंधित प्रावधान धारा 63 तथा आगे की धाराओं में दिए गए हैं। धारा 69 में छलपूर्ण साधनों अथवा विवाह का वादा पूरा करने की मंशा न रखते हुए किए गए वादे के माध्यम से, बलात्कार की श्रेणी में न आने वाले कुछ मामलों में, शारीरिक संबंध बनाने के लिए दंड का प्रावधान है। हालांकि किसी विशेष मामले में कौन-सा प्रावधान लागू होगा, यह आरोपों, तथ्यों और कानून की व्याख्या पर निर्भर करता है। इसलिए हर ऐसे मामले को एक ही कानूनी श्रेणी में रखना सही नहीं होगा।यहां पुलिस और न्यायिक व्यवस्था की जिम्मेदारी भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। शिकायत मिलने पर निष्पक्ष और संवेदनशील तरीके से जांच होनी चाहिए। उपलब्ध साक्ष्यों, संबंधित पक्षों के बयानों, डिजिटल संवाद, परिस्थितिजन्य तथ्यों और अन्य प्रासंगिक सामग्री का कानून के अनुसार परीक्षण किया जाना चाहिए। जांच का उद्देश्य किसी पक्ष को बचाना या किसी को फंसाना नहीं, बल्कि सच्चाई तक पहुंचना होना चाहिए। यदि अपराध हुआ है, तो दोषी को कानून के अनुसार सजा मिले; और यदि आरोप साबित नहीं होते, तो केवल आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति के जीवन, प्रतिष्ठा और भविष्य को स्थायी नुकसान न पहुंचे।मीडिया की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। किसी मामले में एफआईआर दर्ज होना और न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। समाचार माध्यमों को आरोपों को तथ्य की तरह प्रस्तुत करने, शिकायतकर्ता की पहचान उजागर करने अथवा आरोपी को पहले ही अपराधी घोषित करने से बचना चाहिए। बलात्कार के मामलों में पीड़िता की पहचान की कानूनी सुरक्षा का पालन करना अनिवार्य है। किसी की निजी जिंदगी को सनसनीखेज बनाकर पेश करने से न न्याय मिलता है और न समाज में स्वस्थ बहस को बढ़ावा मिलता है।इस पूरे विषय का एक सामाजिक पक्ष भी है। प्रेम संबंधों में प्रवेश करने वाले युवाओं को यह समझना चाहिए कि भावनात्मक निकटता के साथ जिम्मेदारी भी आती है। किसी को विवाह का ऐसा भरोसा देना, जिसे पूरा करने की मंशा ही न हो, नैतिक रूप से गंभीर प्रश्न खड़े करता है और परिस्थितियों के अनुसार कानूनी परिणाम भी हो सकते हैं। इसी तरह किसी संबंध में असहमति, दबाव अथवा जबरदस्ती को सामान्य समझना भी खतरनाक है। रिश्तों में पारदर्शिता, स्पष्ट संवाद, व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान और स्वतंत्र सहमति अत्यंत आवश्यक हैं।वहीं समाज को यह भी सीखना होगा कि किसी महिला और पुरुष के संबंधों का मूल्यांकन केवल उनके अतीत, पहनावे, सामाजिक प्रतिष्ठा अथवा व्यक्तिगत जीवन के आधार पर नहीं किया जा सकता। किसी शिकायतकर्ता को उसके निजी संबंधों के कारण अपमानित करना अनुचित है। उसी प्रकार किसी आरोपी के विरुद्ध आरोप लगते ही उसे सामाजिक रूप से दोषी घोषित कर देना भी न्यायसंगत नहीं है। कानून का काम तथ्यों के आधार पर निर्णय करना है, जबकि समाज का दायित्व है कि वह पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर संवेदनशीलता बनाए रखे।आज जरूरत इस बात की है कि बलात्कार जैसे गंभीर अपराध की वास्तविक पीड़ा को राजनीतिक, सामाजिक अथवा व्यक्तिगत विवादों में इस्तेमाल न किया जाए। वास्तविक पीड़ितों के संघर्ष को समझना और उनके लिए न्याय की आवाज उठाना जरूरी है। साथ ही, उन मामलों में भी निष्पक्ष जांच की मांग करना उतना ही जरूरी है, जिनमें आरोपी का कहना है कि सहमति से बने संबंधों को बाद में आपराधिक आरोप का रूप दे दिया गया। इन दोनों जरूरतों के बीच कोई विरोधाभास नहीं है। निष्पक्षता का अर्थ ही है कि किसी को भी पहले से निर्दोष या दोषी मानकर न चला जाए।अंततः सवाल किसी महिला या पुरुष के पक्ष में खड़े होने का नहीं, बल्कि सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े होने का है। बलात्कार की वास्तविक पीड़ा को समझना, सहमति के महत्व को स्वीकार करना, विवाह के नाम पर छल की जांच करना और झूठे या अप्रमाणित आरोपों से होने वाले नुकसान को गंभीरता से लेना—ये सभी एक न्यायपूर्ण समाज के आवश्यक तत्व हैं। न किसी पीड़िता की आवाज को दबाया जाना चाहिए और न किसी आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई से वंचित किया जाना चाहिए।क्योंकि न्याय का अर्थ केवल शिकायत दर्ज होना नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और कानून के अनुरूप निर्णय होना है। किसी निर्दोष को सजा न मिले और कोई दोषी बच न पाए—यही न्याय व्यवस्था की असली कसौटी है।

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