
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में विष्णु सरकार को सत्ता संभाले लंबा समय बीत चुका है, लेकिन भाजपा संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच अब यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि आखिर सरकार और संगठन के बीच तालमेल में कमी क्यों दिखाई दे रही है? कार्यकर्ताओं की बड़ी समस्याएं तो दूर, क्षेत्रीय मंत्रियों द्वारा उनके छोटे-छोटे वैधानिक और जनहित से जुड़े काम भी समय पर नहीं किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। ऐसे में कुछ कार्यकर्ता अपनी समस्याओं के समाधान के लिए ऐसे रास्तों पर जाने को मजबूर हो रहे हैं, जिनका परिणाम अंततः उनके लिए कानूनी और सामाजिक संकट के रूप में सामने आ सकता है।हाल ही में सामने आए एक मामले ने सरकार और संगठन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक वरिष्ठ भाजपा नेता को अपने सहयोगी के साथ कथित फर्जी स्थानांतरण मामले में जेल तक जाना पड़ा। मामला अब केवल दो व्यक्तियों की व्यक्तिगत कानूनी जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर एक सत्तारूढ़ दल का वरिष्ठ कार्यकर्ता अपनी या अपने परिचित की समस्या के समाधान के लिए कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों और गैरकानूनी तरीके का सहारा लेने की स्थिति तक कैसे पहुंच गया?निश्चित रूप से कानून का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति को राजनीतिक पहचान के आधार पर संरक्षण नहीं मिलना चाहिए और यदि किसी प्रकरण में जांच के बाद अपराध सिद्ध होता है तो कानूनी कार्रवाई होना आवश्यक है। लेकिन साथ ही इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की प्रशासनिक और राजनीतिक परिस्थितियों की भी निष्पक्ष समीक्षा जरूरी है। आखिर संबंधित व्यक्ति ने स्थानांतरण जैसे काम के लिए सही और वैधानिक प्रक्रिया पर भरोसा क्यों नहीं किया? क्या क्षेत्रीय स्तर पर उनकी बात सुनने वाला कोई जिम्मेदार राजनीतिक या प्रशासनिक माध्यम उपलब्ध नहीं था? क्या कार्यकर्ताओं और सरकार के बीच संवाद की वह व्यवस्था कमजोर पड़ चुकी है, जिसके कारण लोग अपने ही स्तर पर गलत रास्ते तलाशने लगते हैं?भाजपा ने लंबे संघर्ष के बाद सत्ता प्राप्त की है। विपक्ष में रहते हुए पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सड़क से लेकर गांव तक सरकार की नीतियों के खिलाफ संघर्ष किया, संगठन को मजबूत किया और चुनाव के समय पूरी ताकत के साथ पार्टी की जीत के लिए काम किया। ऐसे कार्यकर्ताओं की अपेक्षा केवल राजनीतिक पद पाने की नहीं होती। अधिकांश कार्यकर्ता चाहते हैं कि उनके वैधानिक कामों को सुना जाए, आम लोगों की समस्याओं का समाधान हो और जरूरत पड़ने पर स्थानीय मंत्री, विधायक अथवा जिम्मेदार पदाधिकारी उनकी बात को गंभीरता से लें।लेकिन सत्ता में आने के बाद यदि कार्यकर्ता अपने क्षेत्र के मंत्री तक पहुंचने के लिए परेशान हो, छोटे प्रशासनिक काम के लिए महीनों चक्कर लगाए और उसकी समस्याओं पर कोई जिम्मेदार व्यक्ति ध्यान न दे, तो स्वाभाविक रूप से उसके भीतर निराशा पैदा होगी। यही निराशा धीरे-धीरे संगठन और सरकार के बीच दूरी का कारण बनती है। वर्तमान में कई क्षेत्रों में भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच इस बात की चर्चा है कि सत्ता तो भाजपा की है, लेकिन कार्यकर्ताओं के लिए काम कराने की व्यवस्था उतनी सहज नहीं दिखाई दे रही है, जितनी विपक्ष में रहने के दौरान कल्पना की गई थी।सबसे गंभीर सवाल क्षेत्रीय मंत्रियों की भूमिका को लेकर है। मंत्री केवल राजधानी के कार्यालयों तक सीमित नहीं रह सकते। उन्हें अपने क्षेत्र के कार्यकर्ताओं, जनता और संगठन के बीच लगातार संवाद बनाए रखना चाहिए। यदि कोई कार्यकर्ता वैधानिक मांग लेकर आता है तो उसकी बात सुनी जानी चाहिए और उचित प्रक्रिया के तहत उसका समाधान कराया जाना चाहिए। हर मांग पूरी हो, यह संभव नहीं है, लेकिन कम से कम कार्यकर्ता को यह महसूस होना चाहिए कि उसकी सरकार में उसकी बात सुनी जा रही है।स्थानांतरण जैसे मामलों में भी पारदर्शी और स्पष्ट व्यवस्था की आवश्यकता है। जब वैधानिक प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होती, राजनीतिक सिफारिशों को लेकर भ्रम बना रहता है और वास्तविक जरूरतमंद व्यक्ति को यह भरोसा नहीं होता कि उसकी बात उचित मंच तक पहुंचेगी, तब दलालों और फर्जी दस्तावेजों का नेटवर्क सक्रिय होता है। यही नेटवर्क अंततः भोले-भाले लोगों के साथ-साथ राजनीतिक रूप से जुड़े व्यक्तियों को भी अपने जाल में फंसा सकता है।हाल ही में वरिष्ठ भाजपा नेता और उनके सहयोगी के जेल जाने की घटना को केवल एक आपराधिक प्रकरण मानकर छोड़ देना सरकार और संगठन दोनों के लिए उचित नहीं होगा। इस घटना से यह सबक लेना चाहिए कि कार्यकर्ताओं की समस्याओं के समाधान के लिए पारदर्शी और जवाबदेह राजनीतिक व्यवस्था क्यों आवश्यक है। कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार तक पहुंच रखने वाले कुछ लोगों के लिए सब कुछ आसान है, जबकि जमीनी कार्यकर्ता और मध्यम स्तर के नेता अपने छोटे कामों के लिए भी भटक रहे हैं?विष्णु सरकार को इस स्थिति पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। मुख्यमंत्री को अपने मंत्रियों और वरिष्ठ पदाधिकारियों के माध्यम से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर जिले और विधानसभा क्षेत्र में कार्यकर्ताओं की वैधानिक समस्याओं को सुनने की स्पष्ट व्यवस्था बने। मंत्रियों के कार्यालय केवल औपचारिकता न बनें, बल्कि वे जनता और कार्यकर्ताओं की समस्याओं के वास्तविक समाधान का केंद्र बनें। संगठन के भीतर भी ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जहां कोई कार्यकर्ता अपनी समस्या को सीधे और वैधानिक तरीके से रख सके।वरिष्ठ भाजपा नेता के कथित फर्जी स्थानांतरण मामले में जेल तक पहुंचने की घटना ने एक बड़ी चेतावनी दी है। कानून अपना काम करेगा और दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन सरकार को यह भी आत्ममंथन करना होगा कि सत्ता में होने के बावजूद कार्यकर्ताओं की समस्याएं समय पर क्यों नहीं सुनी जा रही हैं। यदि छोटे कामों के लिए भी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को इधर-उधर भटकना पड़ेगा, तो इसका असर केवल संगठन के मनोबल पर ही नहीं, बल्कि सरकार की साख पर भी पड़ेगा।सवाल केवल एक फर्जी स्थानांतरण का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसमें सत्ता पक्ष से जुड़ा एक व्यक्ति भी अपने काम के लिए कथित तौर पर गलत रास्ता चुनने तक पहुंच जाता है। विष्णु सरकार को समय रहते इस संदेश को समझना होगा—वरना सत्ता और संगठन के बीच बढ़ती दूरी आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक संकट बन सकती है।




