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बिलासपुर शिक्षा विभाग में ‘संरक्षण’ का साया? अनुकम्पा नियुक्ति से युक्तियुक्तकरण तक उठ रहे सवाल, कार्रवाई के इंतजार में कथित तौर पर जिम्मेदार अधिकारी।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में स्कूल शिक्षा विभाग से जुड़े कुछ मामलों को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठने लगे हैं। केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू के संसदीय क्षेत्र के मुख्यालय में ही यदि शिक्षा विभाग के अधिकारियों पर भ्रष्टाचार, लापरवाही, अनुकम्पा नियुक्ति, युक्तियुक्तकरण और अन्य प्रशासनिक मामलों में गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं, तो बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन मामलों में जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई करने में इतनी देरी क्यों हो रही है?शिक्षा विभाग से जुड़े सूत्रों का दावा है कि विभाग में कुछ ऐसे अधिकारी-कर्मचारी अब भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं, जिनकी कार्यप्रणाली को लेकर लगातार शिकायतें और सवाल उठते रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना जरूरी है। सिर्फ आरोपों के आधार पर किसी अधिकारी को दोषी नहीं माना जा सकता।अनुकम्पा नियुक्ति और युक्तियुक्तकरण पर क्यों उठ रहे सवाल?बिलासपुर शिक्षा विभाग में अनुकम्पा नियुक्ति से जुड़े मामलों में नियमों के पालन, दस्तावेजों की जांच और पात्रता निर्धारण को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। इसी तरह शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण और पदस्थापना से संबंधित फैसलों को लेकर भी पारदर्शिता पर सवाल सामने आते रहे हैं।बिलासपुर शिक्षा संभाग में शिक्षक पदोन्नति के बाद पदस्थापना आदेशों में बड़े पैमाने पर संशोधन का मामला पहले भी सामने आ चुका है। सितंबर 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, 799 शिक्षकों के पदस्थापना आदेशों में संशोधन को लेकर शासन स्तर पर जांच कराई गई थी और तत्कालीन अधिकारियों को जांच के लिए बुलाया गया था।ऐसे पुराने मामलों की पृष्ठभूमि में अब यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि विभागीय स्तर पर शिकायतों और जांच के बाद वास्तव में कितनी कार्रवाई हुई और कितने मामलों में जिम्मेदारी तय की गई?‘किसका संरक्षण’—सवाल गंभीर, जवाब जरूरीसबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध विभागीय जांच में प्रथम दृष्टया गंभीर अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई क्यों नहीं होती? और यदि आरोप निराधार हैं, तो विभाग संबंधित अधिकारी को क्लीन चिट देकर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करता?यानी दोनों परिस्थितियों में सरकार और विभाग की जवाबदेही बनती है।क्या किसी अधिकारी को राजनीतिक, प्रशासनिक या विभागीय संरक्षण मिल रहा है? यह आरोप अपने आप में गंभीर है, इसलिए इसका उत्तर भी दस्तावेजों और आधिकारिक जांच के आधार पर ही सामने आना चाहिए।‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति जमीन पर कितनी प्रभावी?केंद्र और राज्य सरकारें भ्रष्टाचार तथा प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ कार्रवाई और जवाबदेही की बात लगातार करती रही हैं। ऐसे में बिलासपुर शिक्षा विभाग से जुड़े मामलों में भी यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध आरोप जांच में सिद्ध होते हैं, तो सेवा नियमों के तहत निलंबन से लेकर विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई तक जो भी प्रावधान लागू हों, उनका पालन होना चाहिए।विभागीय सूत्रों का कहना है कि गंभीर भ्रष्टाचार अथवा जानबूझकर की गई प्रशासनिक अनियमितता प्रमाणित होने पर दोषियों के खिलाफ कठोरतम वैधानिक कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों का मनोबल प्रभावित न हो।सवालों के घेरे में व्यवस्था, अब जवाब की बारीबिलासपुर जैसे महत्वपूर्ण संभागीय मुख्यालय में शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों को केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रखने के बजाय सरकार को चाहिए कि शिकायतों, जांच रिपोर्टों, आदेशों और संबंधित दस्तावेजों की स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करे।आखिर जिन अधिकारियों पर आरोप लगे हैं, उनके मामलों में जांच कहां तक पहुंची?किस-किस मामले में दोष तय हुआ?किसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई?किसे क्लीन चिट दी गई और किस आधार पर?और यदि गंभीर अनियमितताएं प्रमाणित हुईं तो निलंबन अथवा अन्य कठोर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि बिलासपुर शिक्षा विभाग में वास्तव में भ्रष्टाचार पर कार्रवाई हो रही है या फाइलों में जवाबदेही की तलाश जारी है।

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