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पोंडी में नया स्कूल भवन बनकर तैयार, फिर भी सामुदायिक भवन में चल रही प्राथमिक शाला.. जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

मुंगेली जिले के पथरिया विकासखंड के ग्राम पंचायत सेंदरी के आश्रित ग्राम पोंडी में शिक्षा व्यवस्था की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करती है। गांव में शासकीय प्राथमिक शाला के लिए नया स्कूल भवन बनकर तैयार हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद स्कूल का संचालन आज भी सामुदायिक भवन में किया जा रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब नया भवन तैयार हो चुका है तो आखिर बच्चों को उसमें पढ़ाई का अवसर क्यों नहीं मिल रहा है?गांव के ग्रामीणों के मुताबिक लंबे समय से प्राथमिक शाला के लिए बेहतर और सुरक्षित भवन की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इसी जरूरत को देखते हुए नया स्कूल भवन तैयार किया गया। भवन बनने के बाद ग्रामीणों और पालकों को उम्मीद थी कि अब बच्चों को व्यवस्थित कक्ष, बेहतर शैक्षणिक वातावरण और स्कूल की मूलभूत सुविधाएं मिल सकेंगी। लेकिन भवन निर्माण पूरा होने के बाद भी स्कूल का संचालन पुराने सामुदायिक भवन से ही जारी है।यह स्थिति केवल भवन के उपयोग का सवाल नहीं है, बल्कि सरकारी राशि से निर्मित शैक्षणिक अधोसंरचना के उद्देश्य पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है। यदि भवन निर्माण पूर्ण हो चुका है और उसके उपयोग में कोई तकनीकी, प्रशासनिक अथवा हस्तांतरण संबंधी अड़चन है, तो उसका निराकरण करना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है। दूसरी ओर यदि भवन उपयोग के लिए पूरी तरह तैयार है, तो उसे अब तक बच्चों के लिए उपलब्ध क्यों नहीं कराया गया, इसका जवाब भी शिक्षा विभाग और संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों को देना चाहिए।ग्रामीणों का कहना है कि प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए विद्यालय का वातावरण बेहद महत्वपूर्ण होता है। छोटे बच्चों को सीमित अथवा अस्थायी व्यवस्था में पढ़ाना उनके शैक्षणिक माहौल को प्रभावित कर सकता है। सामुदायिक भवन किसी सार्वजनिक आवश्यकता के लिए बनाया जाता है, जबकि स्कूल भवन का निर्माण विशेष रूप से बच्चों की शिक्षा के लिए किया गया है। ऐसे में दोनों भवनों के उद्देश्य में स्पष्ट अंतर है।भवन बन गया, व्यवस्था कब बदलेगी?पोंडी का मामला उस सरकारी कार्यप्रणाली की ओर भी इशारा करता है, जिसमें भवन निर्माण को ही उपलब्धि मान लिया जाता है, लेकिन निर्माण के बाद उसका वास्तविक उपयोग शुरू कराने पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। सवाल यह है कि स्कूल भवन के निर्माण पर खर्च हुई सरकारी राशि का उद्देश्य केवल भवन खड़ा करना था या उसमें बच्चों की पढ़ाई भी शुरू कराना?ग्रामीणों की मांग है कि संबंधित अधिकारी मौके का निरीक्षण कर स्कूल भवन की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करें। यदि भवन में बिजली, पानी, फर्नीचर, पहुंच मार्ग, मरम्मत, हस्तांतरण या किसी अन्य औपचारिकता की कमी है तो उसे तत्काल पूरा कराया जाए। यदि ऐसी कोई बाधा नहीं है तो स्कूल को नए भवन में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया बिना अनावश्यक विलंब के पूरी की जानी चाहिए।बच्चों की पढ़ाई व्यवस्था का विषय, भवन का नहींसरकार ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के विस्तार और बेहतर स्कूल अधोसंरचना के लिए लगातार योजनाएं संचालित कर रही है। ऐसे में पोंडी जैसे गांव में नया स्कूल भवन तैयार होने के बावजूद उसका उपयोग नहीं होना व्यवस्था की गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है। आखिर सरकारी भवन बनने के बाद भी बच्चों को उसी पुराने सामुदायिक भवन में क्यों बैठना पड़ रहा है? क्या निर्माण एजेंसी और शिक्षा विभाग के बीच समन्वय की कमी है, या फिर भवन को स्कूल के उपयोग में लेने के लिए जिम्मेदार स्तर पर उदासीनता बरती जा रही है?यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चे अपने अधिकारों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से अनजान होते हैं। उनके लिए स्कूल का मतलब केवल एक भवन नहीं, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक शैक्षणिक वातावरण है। इसलिए जिम्मेदार अधिकारियों को कागजी प्रक्रिया से आगे बढ़कर यह देखना होगा कि पोंडी के बच्चों को वास्तव में स्कूल भवन की सुविधा कब मिलती है।अब निगाहें पथरिया विकासखंड के शिक्षा अधिकारियों पर हैं कि वे इस मामले में स्थल निरीक्षण कर स्थिति स्पष्ट करते हैं या फिर तैयार भवन के बावजूद बच्चों की पढ़ाई सामुदायिक भवन में ही चलती रहेगी। पोंडी के ग्रामीणों का सवाल सीधा है—जब स्कूल भवन तैयार है, तो बच्चों को उसमें पढ़ाने में आखिर देरी किस बात की?

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