
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा, महाराष्ट्र में मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती के अवसर पर ‘प्रेमचंद का साहित्यिक अवदान’ विषय पर विशेष व्याख्यान में बतौर मुख्य वक्ता केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली के निदेशक प्रो. हितेंद्र मिश्र ने कहा कि गांधी ने जो काम राजनीति में किया, प्रेमचंद ने वही काम साहित्य में किया। प्रेमचंद ने केवल साहित्य नहीं लिखा बल्कि भारतीय समाज को देखने की दृष्टि प्रदान की। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने किसान, मजदूर, स्त्री, दलित और वंचित समाज की पीड़ा को साहित्य के केंद्र में स्थापित किया। उन्होंने साहित्य को सत्ता, वैभव और कल्पना की दुनिया से निकालकर खेतों, खलिहानों, चौपालों, झोपड़ियों और सामान्य मनुष्य के जीवन तक पहुँचाया। यही कारण है कि प्रेमचंद आज भी भारतीय समाज की सबसे प्रासंगिक आवाज़ हैं। वे हमारे अतीत ही नहीं बल्कि वर्तमान हैं और हम उनमें अपना भविष्य भी देख सकते हैं। प्रेमचंद सजग लेखक थे। वे विश्व साहित्य में मानक बनकर खड़े नजर आते हैं। प्रो. मिश्र ने कहा कि बाजारवाद के दौर में साहित्य की गंभीरता लगातार कम होती जा रही है जबकि प्रेमचंद का साहित्य धैर्य, गंभीर अध्ययन, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदना का पाठ पढ़ाता है। उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे प्रेमचंद के साहित्य को सामाजिक परिवर्तन के दस्तावेज़ के रूप में पढ़ें। उन्होंने कहा कि जब तक समाज में अन्याय, शोषण और विषमता मौजूद है, तब तक प्रेमचंद हमारे समकालीन बने रहेंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा ने की। उन्होंने विकसित भारत की अवधारणा को प्रेमचंद के साहित्य से जोड़ते हुए कहा कि प्रेमचंद का साहित्य आज भी मानवीय मूल्यों और सामाजिक चेतना का सशक्त आधार है। प्रेमचंद अपने समय से आगे देखने वाले युगद्रष्टा साहित्यकार थे। ‘सोजे वतन’ और ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ जैसी उनकी तमाम रचनाएं हमें बताती हैं कि वे राष्ट्रीय चेतना के सच्चे अर्थों में संवाहक थे। प्रो. शर्मा ने प्रेमचंद द्वारा दी गई साहित्य की प्रसिद्ध परिभाषा ‘साहित्य जीवन की आलोचना है’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कथन आज भी उतना ही सार्थक है, जितना उनके समय में था। वस्तुतः प्रेमचंद का साहित्य आज भी सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय पुनर्जागरण की सबसे विश्वसनीय अभिव्यक्ति है। प्रेमचंद ने जीवन के मर्म को जाना और सहजता से उसे प्रस्तुत किया। यही उन्हें महान रचनाकार बनाता है।महादेवी वर्मा सभागार में आयोजित कार्यक्रम में स्वागत एवं प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए हिंदी साहित्य विभाग के अध्यक्ष प्रो. अवधेश कुमार ने कहा कि प्रेमचंद ने कथाकार, उपन्यासकार, निबंधकार, पत्रकार, संपादक, अनुवादक और विचारक के रूप में साहित्य, भाषा, पत्रकारिता, समाज, राजनीति और संस्कृति से जुड़े प्रश्नों पर गंभीर वैचारिक हस्तक्षेप किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ ने किया तथा डॉ. अशोकनाथ त्रिपाठी ने आभार ज्ञापित किया। कार्यक्रम का आरंभ प्रेमचंद की प्रतिमा पर पुष्पांजलि, दीप प्रज्ज्वलन तथा कुलगीत गायन से हुआ। इस आयोजन में बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी-विद्यार्थी तथा साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।




