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एक तरफ देश के प्रधानमंत्री हजारों करोड़ खर्च करके स्वच्छता के लिए योजना चलाते हैं ताकि लोगों को अच्छी स्वास्थ्य और सुविधा मिल सके तो वहीं दूसरी तरफ प्रशासन उन योजनाओं को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ते ।

गौरेला पेंड्रा मरवाही / श्रीनिवास सुमेर ,ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी

यह मामला पेंड्रारोड रेलवे स्टेशन का है जहां दो महीने पहले ही 35 लाख की लागत से मॉर्डन सुलभ शौचालय बनकर तैयार हुआ था लेकिन ये सुलभ यात्रियों कि सुविधा बनने के बजाय सिरदर्द बन गया सुलभ का इस्तेमाल तो दूर सामने में यात्रियों के बैठने के रखे कुर्सी पर बैठ नहीं सकते गंदगी और बदबू सुलभ शौचालय भवन ही नहीं बल्कि आसपास स्टेशन में भी फैल रही है अगर सुलभ शौचालय के अंदर की बात करें तो सभी तरफ सिर्फ गंदगी ही फैली है नल और दरवाजे के कुछ लॉक टूट चुके हैं और वहीं वाश बेसिन भी बहुत गंदा पड़ा है नलो में पानी नहीं आ रहा,कुल मिलाकर सफाई व्यवस्था की जायजा लेने वाले अधिकारी भी सो रहे हैं जब हमने स्टेशन के जिम्मेदार अधिकारी आर . किशोर बाबू (स्टेशन सुप्रीडेंट) से बात की तो उनका कहना था कि वो रोज व्यस्था देखने जाते सब कुछ ठीक है हमारे आग्रह करने पर तुरंत सुलभ शौचालय जा के अधिकारी के द्वारा देख कर बताए कि नवनिर्मित सुलभ शौचालय का टेंडर हुआ है वेंडर /ठेकेदार की जिम्मेदारी है कि उसे साफ रखे , लेकिन दोपहर 1 बजे तक साफ सफाई नहीं हुई वही रेलवे अधिकारी विधिवत कार्यवाही की बात कही लेकिन सवाल ये है कि जनता की सुविधा के लिए बने सुलभ शौचालय का कोई देखने वाला नहीं अधिकारी टेंडर होने की बात कह कर पल्ला झाड़ते नजर आये वही जब स्थानीय यात्रियों ने शौचालय इस्तेमाल करना चाहा इतनी गंदगी देखते हुए बिना इस्तेमाल किए ही वापस आ गए ,शौचालय के अंदर न बाहर डस्टबिन रहा जिसमें महिलाएं डाइपर, सेनेट्री पैड सहित अन्य गंदगी फैली हुई थी , डाइपर एरिया में इतनी ज्यादा गंदगी रही कि अब शायद ही कोई इस्तेमाल कर पाए ड्रेनेज सही नहीं होने से वहां भी पानी भरा रहता है ।

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