तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में विभिन्न स्वजातीय समाजों के बीच वर्चस्व, गुटबाजी और सामाजिक पहचान को लेकर खींचतान कोई नई बात नहीं है। इसी सामाजिक परिदृश्य में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बताने वाले कुर्मी समाज के सामने अब अपने ही दावों की कसौटी पर खरा उतरने की चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। सामाजिक एकता, विकास और समाजहित की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले समाज में जब जमीन पर ठोस पहल की बारी आती है, तो सवाल उठता है कि घोषणाएं आखिर कब हकीकत में बदलेंगी?मामला एक ऐसे कुर्मी समाज से जुड़ा है, जो एक ओर अपनी सामाजिक श्रेष्ठता का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर समाज के लिए आवश्यक बुनियादी संसाधनों और संगठनात्मक पारदर्शिता को लेकर सवालों के घेरे में है। आरोप है कि एक गौंटिया परिवार के शिक्षक रहे सदस्य ने सामाजिक भवन के निर्माण के लिए अपनी जमीन दान करने की घोषणा की थी। इतना ही नहीं, वे समाज के पदाधिकारी भी बने और इस पहल से समाज में उम्मीद जगी कि जल्द ही सामाजिक भवन के लिए भूमि उपलब्ध हो सकेगी। लेकिन समय बीतने के बावजूद कथित रूप से उक्त जमीन की समाज के नाम रजिस्ट्री नहीं हो सकी है।—–//—*घोषणा से रजिस्ट्री तक का सफर आखिर क्यों अधूरा?*सामाजिक भवन किसी भी समाज के लिए केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं होता, बल्कि वह सामाजिक संवाद, सामूहिक निर्णय, विवाह समारोह, सांस्कृतिक गतिविधियों और नई पीढ़ी के विकास का केंद्र होता है। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति द्वारा समाजहित में जमीन दान करने की घोषणा की जाती है, तो स्वाभाविक रूप से समाज के लोगों की अपेक्षाएं उससे जुड़ जाती हैं। लेकिन घोषणा के बाद भूमि का विधिवत हस्तांतरण नहीं होना समाज के सामने कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है।क्या जमीन दान करने की घोषणा केवल सार्वजनिक आश्वासन तक सीमित रह गई? क्या जमीन के स्वामित्व, दस्तावेजों या अन्य कानूनी औपचारिकताओं के कारण रजिस्ट्री नहीं हो सकी? क्या समाज के पदाधिकारियों ने इस मामले में लिखित समझौता, दानपत्र या अन्य आवश्यक दस्तावेज तैयार कराए थे? और यदि जमीन वास्तव में समाज को दान करने का निर्णय लिया गया था, तो अब तक उसके हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं हुई?इन सवालों का जवाब समाज के सदस्यों को मिलना चाहिए। क्योंकि सामाजिक संस्थाओं में विश्वास केवल भाषणों और घोषणाओं से नहीं, बल्कि पारदर्शी कार्यप्रणाली और समयबद्ध निर्णयों से कायम होता है।—–//—-*पदाधिकारी की जिम्मेदारी पर भी उठ रहे सवाल*आरोपों के मुताबिक, जमीन दान की घोषणा करने वाले शिक्षक समाज के पदाधिकारी भी रहे हैं। ऐसे में उनकी भूमिका को लेकर भी चर्चा स्वाभाविक है। यदि कोई पदाधिकारी समाज के लिए भूमि दान करने की घोषणा करता है, तो क्या उस घोषणा को औपचारिक रूप देने की जिम्मेदारी केवल उनकी थी, या समाज की कार्यकारिणी को भी आगे बढ़कर प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए थी? क्या समाज की बैठक में इस संबंध में प्रस्ताव पारित किया गया? क्या भूमि के दस्तावेजों का सत्यापन हुआ? क्या रजिस्ट्री की समयसीमा तय की गई?इन प्रश्नों पर समाज के वर्तमान और पूर्व पदाधिकारियों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। किसी व्यक्ति के सामाजिक पद या पारिवारिक प्रतिष्ठा के आधार पर सवालों को दबाना न तो समाजहित में है और न ही संगठनात्मक पारदर्शिता के अनुरूप।——//—-*‘सर्वश्रेष्ठ’ होने का दावा और जमीनी हकीकत*छत्तीसगढ़ में स्वजातीय संगठनों के बीच अपनी पहचान, संख्या, सामाजिक प्रभाव और संगठनात्मक क्षमता को लेकर प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है। कुर्मी समाज भी इससे अलग नहीं है। लेकिन किसी समाज की वास्तविक मजबूती उसके श्रेष्ठ होने के दावों से नहीं, बल्कि उसके सदस्यों के बीच एकता, पारदर्शिता, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सहयोग और संस्थागत विकास से तय होती है।यदि समाज के लिए भवन निर्माण जैसी बुनियादी आवश्यकता पर वर्षों तक केवल घोषणा होती रहे और जमीन का हस्तांतरण नहीं हो, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि संगठन की प्राथमिकताएं क्या हैं? समाज में गुटबाजी और आपसी मतभेदों के बीच क्या सामूहिक हित पीछे छूट रहा है? क्या पद और प्रतिष्ठा की राजनीति सामाजिक विकास पर भारी पड़ रही है?—–//—-*समाज के सामने अब स्पष्ट जवाबदेही की जरूरत*सामाजिक भवन के लिए जमीन दान की घोषणा से जुड़े इस मामले में संबंधित व्यक्ति और समाज की कार्यकारिणी को सार्वजनिक रूप से तथ्य सामने रखने चाहिए। जमीन का खसरा नंबर, स्वामित्व की स्थिति, दान की घोषणा की तारीख, समाज की बैठक का प्रस्ताव, रजिस्ट्री की वर्तमान स्थिति और अब तक उठाए गए कदमों की जानकारी समाज के सदस्यों को दी जानी चाहिए। यदि किसी कानूनी या पारिवारिक कारण से भूमि का हस्तांतरण संभव नहीं है, तो उसकी स्पष्ट जानकारी भी सामने आनी चाहिए।सवाल किसी व्यक्ति की जातिगत पहचान, पारिवारिक प्रतिष्ठा या व्यक्तिगत सम्मान का नहीं, बल्कि समाज के नाम पर किए गए वादे और उसकी वास्तविक स्थिति का है। यदि घोषणा हुई थी, तो उसकी पुष्टि होनी चाहिए। यदि जमीन दान का निर्णय लिया गया था, तो उसके विधिक दस्तावेज सामने आने चाहिए। और यदि किसी कारण से प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी, तो समाज को वास्तविक कारण बताया जाना चाहिए।कुर्मी समाज को तय करना होगा कि वह घोषणाओं का समाज बनेगा या काम का। सामाजिक भवन की जमीन का मामला अब केवल एक भूमि हस्तांतरण का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक नेतृत्व की विश्वसनीयता, संगठनात्मक पारदर्शिता और समाजहित के प्रति जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है।प्रकाशन से पहले आवश्यक तथ्य: इस समाचार में किसी व्यक्ति पर आरोप को प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।




