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राजनीतिक संरक्षण और पैसों के दम पर चल रहा लकड़ी तस्करी का सिंडिकेट? सरायपाली में वन विभाग की भूमिका पर उठे सवाल..सही जांच हुई तो कई चेहरे होंगे बेनकाब।

विकास नंद/ सर्वव्यापी

रायगढ़ पुलिस और वन विभाग द्वारा खैर एवं तेंदू जैसी बेशकीमती लकड़ियों की अवैध कटाई और अंतर्राज्यीय तस्करी से जुड़े बड़े सिंडिकेट का खुलासा किए जाने के बाद अब सरायपाली क्षेत्र में भी वन विभाग की भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं। मामले में राजनीतिक रसूख और पैसों के प्रभाव के सहारे लंबे समय से पूरे नेटवर्क के संचालित होने की चर्चाएं तेज हैं।

मामले में तीन मुख्य आरोपियों रोहित मित्तल, मनीष अग्रवाल और सलाउद्दीन खान को गिरफ्तार किया गया है, जबकि एक अन्य सरायपाली निवासी आरोपी फरार बताया जा रहा है। पुलिस और वन विभाग की कार्रवाई में अवैध रूप से की गई लकड़ी कटाई, भंडारण और दूसरे राज्यों में भेजने से जुड़े एक बड़े नेटवर्क का खुलासा होने की बात सामने आई है।जानकारी के अनुसार, पकड़े गए आरोपियों के नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। आरोप है कि अवैध रूप से कटवाई गई बेशकीमती लकड़ियों का भंडारण करने के बाद उनकी छिलाई एवं अन्य प्रक्रिया कर उन्हें विभिन्न राज्यों में भेजा जाता था।

सरायपाली में भी जांच की उठी मांग

अंतर्राज्यीय लकड़ी तस्करी के इस मामले के सामने आने के बाद सरायपाली क्षेत्र में वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। क्षेत्र में लंबे समय से अवैध लकड़ी कटाई और परिवहन की शिकायतों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होने को लेकर लोगों में चर्चा है।स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि राजनीतिक रसूख और आर्थिक प्रभाव के कारण तस्करी से जुड़े लोगों का नेटवर्क बेखौफ होकर सक्रिय रहा। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित विभाग की ओर से विस्तृत जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

अब मांग उठ रही है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच करते हुए सरायपाली क्षेत्र से जुड़े संदिग्ध मामलों और वन विभाग की भूमिका की भी जांच की जाए। यदि किसी अधिकारी-कर्मचारी अथवा प्रभावशाली व्यक्ति की संलिप्तता सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।

लकड़ी तस्करी सिंडिकेट के खुलासे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इतने बड़े स्तर पर अवैध कटाई और अंतर्राज्यीय परिवहन का कारोबार संबंधित विभागों की नजर से कैसे बचता रहा।

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