
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
अगले महीने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं। उनके कार्यकाल के समापन की खबर ने न्यायिक और प्रशासनिक गलियारों में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं पैदा कर दी हैं। न्यायपालिका की कार्यशैली पर नजर रखने वाले अनेक लोगों का मानना है कि उनके कार्यकाल में जनहित से जुड़े मामलों पर न्यायालय की सक्रियता विशेष रूप से दिखाई दी। वहीं, यह भी कहा जा रहा है कि उनके सेवानिवृत्त होने के बाद ऐसी सक्रियता का स्वरूप कैसा रहेगा, इस पर लोगों की निगाहें रहेंगी।मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा के कार्यकाल के दौरान उच्च न्यायालय ने अनेक मामलों में जनहित याचिकाओं और कुछ मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर प्रशासनिक व्यवस्था से जवाब-तलब किया। सड़क सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, अवैध खनन, सरकारी व्यवस्थाओं, नागरिक सुविधाओं तथा प्रशासनिक जवाबदेही जैसे विषयों पर न्यायालय की टिप्पणियां और निर्देश लगातार चर्चा में रहे। कई अवसरों पर संबंधित अधिकारियों को न्यायालय के समक्ष जवाब देना पड़ा और न्यायालय ने प्रशासनिक लापरवाही पर कड़ी टिप्पणियां भी कीं।न्यायिक जानकारों का मानना है कि संविधान के दायरे में रहते हुए जनहित के मामलों में न्यायपालिका की सक्रियता लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार होती है। जब शासन-प्रशासन अपेक्षित गति से कार्य नहीं करता, तब न्यायालय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करता है। इसी कारण आम नागरिकों के एक वर्ग में यह भावना दिखाई देती है कि जनहित के मुद्दों पर न्यायालय की प्रभावी निगरानी आगे भी उसी गंभीरता से बनी रहनी चाहिए।दूसरी ओर, प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी सुनाई देती है कि कड़े न्यायिक परीक्षण और लगातार जवाबदेही की स्थिति अब बदल सकती है। हालांकि, इस प्रकार की धारणाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की जा सकती और इन्हें केवल चर्चाओं एवं प्रतिक्रियाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए। किसी भी प्रशासनिक अधिकारी या विभाग की सामूहिक भावना के बारे में निर्णायक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी मुख्य न्यायाधीश का कार्यकाल केवल व्यक्तिगत पहचान तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह न्यायिक संस्थाओं की कार्यसंस्कृति को भी प्रभावित करता है। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नए मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में उच्च न्यायालय जनहित से जुड़े मामलों में किस प्रकार की न्यायिक प्राथमिकताएं निर्धारित करता है और संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन की दिशा किस प्रकार आगे बढ़ती है।रमेश सिन्हा के कार्यकाल को लेकर यह धारणा भी बनी कि न्यायालय ने शासन और प्रशासन को यह संदेश देने का प्रयास किया कि संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही स्वीकार्य नहीं है। न्यायालय ने अनेक मामलों में समयबद्ध कार्रवाई, पारदर्शिता और जवाबदेही पर विशेष बल दिया। इससे यह संदेश गया कि कानून का शासन केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि व्यवहार में भी प्रभावी होना चाहिए।कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी लोकतंत्र में न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच संतुलन अत्यंत आवश्यक होता है। न्यायपालिका का दायित्व केवल विवादों का निपटारा करना नहीं, बल्कि संविधान और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना भी है। ऐसे में जनहित से जुड़े मामलों में न्यायिक सक्रियता को लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पक्ष माना जाता है।मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की सेवानिवृत्ति के साथ छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में एक महत्वपूर्ण न्यायिक अध्याय का समापन होगा। उनके उत्तराधिकारी के समक्ष भी यही अपेक्षा रहेगी कि न्यायालय संविधान की मूल भावना, निष्पक्षता, पारदर्शिता और जनहित के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को उसी दृढ़ता के साथ आगे बढ़ाए। आम जनता की सबसे बड़ी उम्मीद यही रहेगी कि न्यायालय अंतिम संवैधानिक संरक्षक के रूप में नागरिक अधिकारों की रक्षा, सुशासन की स्थापना और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने की अपनी भूमिका को निरंतर मजबूती से निभाता रहेगा।




