
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार में मंत्रालयीन कामकाज की कार्यप्रणाली अब गंभीर सवालों के घेरे में है। स्थिति यह है कि मंत्रियों की स्पष्ट अनुशंसा के बावजूद मंत्रालय में पदस्थ सचिव स्तर के आईएएस अधिकारियों के कार्यालयों से पत्रों को सामान्य मार्किंग कर संबंधित सेक्शन में भेज दिया जाता है। इसके बाद संबंधित शाखाओं के जिम्मेदार अधिकारी और बाबू उन पत्रों को फाइलों के ढेर में दबाकर बैठ जाते हैं। नतीजा यह कि जनहित और प्रशासनिक हित से जुड़े मामलों में भी समय पर निर्णय नहीं हो पा रहा है।सवाल यह है कि जब प्रदेश के मंत्री किसी विषय पर अनुशंसा करते हैं, तो उनकी अनुशंसा पर कार्रवाई की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या मंत्रालय में बैठे अधिकारी और कर्मचारी मंत्रियों की अनुशंसा को महज औपचारिक पत्र समझ रहे हैं? यदि ऐसा नहीं है, तो फिर महीनों तक फाइलें आगे क्यों नहीं बढ़तीं? शासन की मंशा और मंत्रालय की कार्यप्रणाली के बीच यह दूरी आखिर किसकी जवाबदेही तय करेगी?सबसे अधिक सवाल सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे हैं। प्रदेश के महत्वपूर्ण विभागों में शामिल इस विभाग में प्रमुख सचिव स्तर के वरिष्ठ अधिकारी की पदस्थापना की मांग उठ रही है। लेकिन चर्चा है कि इस पदस्थापना के रास्ते में कर्मचारी संगठनों की आपत्तियां भी आड़े आ रही हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारु बनाने के लिए वरिष्ठ अधिकारी की आवश्यकता महत्वपूर्ण है या किसी संगठन की आपत्ति?विडंबना देखिए कि जिस सामान्य प्रशासन विभाग पर प्रदेश के शासकीय अधिकारियों और कर्मचारियों की सेवा संबंधी व्यवस्थाओं को सुचारु रखने की जिम्मेदारी है, उसी विभाग में समय-सीमा के भीतर काम नहीं होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। कर्मचारियों की आपसी सहमति से होने वाले पारस्परिक तबादलों तक के लिए उन्हें मंत्रालय के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। आवेदन, अनुशंसा और आवश्यक दस्तावेज जमा करने के बाद भी निर्णय के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।यह स्थिति केवल कर्मचारियों की परेशानी नहीं, बल्कि प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यक्षमता पर भी सवाल खड़े करती है। जब एक कर्मचारी का सामान्य प्रशासनिक काम समय पर नहीं हो पा रहा है, तो आम जनता से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों की फाइलों का क्या हाल होता होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।सबसे बड़ा सवाल मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से है कि क्या मंत्रालय की कार्यप्रणाली की नियमित समीक्षा हो रही है? मंत्रियों की अनुशंसा पर कार्रवाई की जवाबदेही किसकी है? सचिवों के कार्यालय से लेकर सेक्शन स्तर तक फाइलें लंबित रखने वालों पर कार्रवाई कब होगी?सरकार सुशासन और प्रशासनिक पारदर्शिता की बात करती है, लेकिन सुशासन केवल घोषणाओं और बैठकों से नहीं आता। सुशासन तब दिखाई देता है, जब किसी मंत्री की अनुशंसा हो या किसी कर्मचारी का आवेदन, प्रत्येक प्रकरण का नियमानुसार समय-सीमा में निराकरण हो।अब जरूरत है मंत्रालय की फाइलों की समीक्षा, लंबित प्रकरणों की जवाबदेही तय करने और सामान्य प्रशासन विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार करने की। वरना सवाल यही उठता रहेगा कि छत्तीसगढ़ में सरकार मंत्रियों की चल रही है, अधिकारियों की या फिर उन सेक्शन के बाबुओं की, जिनकी मेज पर पहुंचने के बाद फाइलों की रफ्तार ही थम जाती है?



