
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे तीन वर्षीय मॉडर्न ऑफिस मैनेजमेंट (MOM) डिप्लोमाधारियों के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया है, जो शासन की भर्ती व्यवस्था, तकनीकी शिक्षा की मान्यता और युवाओं के रोजगार के अधिकार से जुड़ा है। जब शासन स्वयं मान्यता प्राप्त पॉलीटेक्निक संस्थानों से तीन वर्षीय MOM डिप्लोमा को तृतीय श्रेणी के विभिन्न पदों की शैक्षणिक योग्यता में शामिल कर रहा है, तो फिर उसी पाठ्यक्रम में पढ़ाए और परीक्षाओं के माध्यम से प्रमाणित टाइपिंग, स्टेनोग्राफी तथा कम्प्यूटर कौशल के लिए अलग प्रमाण-पत्र की अनिवार्यता क्यों?MOM के अध्ययनरत एवं उत्तीर्ण विद्यार्थियों ने इस मुद्दे को लेकर प्रदेश के मुख्य सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग और तकनीकी शिक्षा विभाग से हस्तक्षेप की मांग की है। विद्यार्थियों का कहना है कि यदि किसी मान्यता प्राप्त तकनीकी संस्थान में तीन वर्षों के अध्ययन, प्रशिक्षण और व्यावहारिक परीक्षाओं के बाद अर्जित कौशल को सरकारी भर्ती में पर्याप्त नहीं माना जाता, तो फिर उस पाठ्यक्रम की रोजगार संबंधी उपयोगिता और निर्धारित शैक्षणिक योग्यता की व्यावहारिक स्वीकार्यता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।हालांकि, इस मामले में शासन की ओर से संबंधित नियमों की आधिकारिक व्याख्या सामने आना आवश्यक है। फिलहाल विद्यार्थियों की मांग है कि भर्ती नियमों में ऐसी स्पष्टता लाई जाए, जिससे एक ही कौशल के लिए दोबारा प्रमाण-पत्र हासिल करने की बाध्यता समाप्त हो सके।एक ही कौशल, दो प्रमाण-पत्र! आखिर नियमों का यह पेच क्यों?विद्यार्थियों के अनुसार, सामान्य प्रशासन विभाग की अधिसूचना क्रमांक RULE/297/2025-GAD-3 में शीघ्रलेखक, डाटा एंट्री ऑपरेटर, कम्प्यूटर ऑपरेटर, स्टेनो टाइपिस्ट और सहायक ग्रेड-3 सहित विभिन्न पदों की न्यूनतम शैक्षणिक अर्हताओं में 12वीं उत्तीर्ण के साथ तीन वर्षीय MOM डिप्लोमा को विकल्प के रूप में शामिल किया गया है।लेकिन संबंधित पदों के लिए निर्धारित शीघ्रलेखन, मुद्रलेखन और कम्प्यूटर कौशल के प्रमाण-पत्र संबंधी शर्तें भी लागू हैं।यहीं से विवाद की शुरुआत होती है। MOM विद्यार्थियों का तर्क है कि उनके पाठ्यक्रम में कार्यालयीन कार्यप्रणाली, कम्प्यूटर एप्लीकेशन, डाटा एंट्री, टाइपिंग और स्टेनोग्राफी जैसे विषयों का प्रशिक्षण दिया जाता है। इन विषयों में निर्धारित परीक्षाएं उत्तीर्ण करने के बाद अंकसूची और डिप्लोमा जारी किए जाते हैं।ऐसे में सवाल उठता है कि क्या संबंधित पद के लिए निर्धारित कौशल मानक MOM की अधिकृत अंकसूची से प्रमाणित होने पर उसे स्वीकार किया जा सकता है? यदि नहीं, तो उसके पीछे लागू नियमों और तकनीकी कारणों को स्पष्ट क्यों नहीं किया जाता?यही वह बिंदु है, जिस पर सामान्य प्रशासन विभाग और तकनीकी शिक्षा विभाग की स्पष्ट व्याख्या हजारों विद्यार्थियों की शंकाओं का समाधान कर सकती है।सरकारी भर्ती में टाइपिंग से लेकर स्टेनोग्राफी तक अलग-अलग मानकविद्यार्थियों ने जिन पदों के संदर्भ में अपनी मांग रखी है, उनमें कौशल की आवश्यकताएं अलग-अलग निर्धारित हैं।शीघ्रलेखक अथवा स्टेनोग्राफर ग्रेड-3 के लिए हिन्दी या अंग्रेजी शीघ्रलेखन की गति 100 शब्द प्रति मिनट तथा मुद्रलेखन की दक्षता 10,000 की-डिप्रेशन प्रति घंटा बताई गई है।डाटा एंट्री ऑपरेटर और कम्प्यूटर ऑपरेटर के संबंधित पदों के लिए हिन्दी एवं अंग्रेजी मुद्रलेखन की दक्षता 8,000 की-डिप्रेशन प्रति घंटा निर्धारित होने का उल्लेख किया गया है।स्टेनो टाइपिस्ट के लिए हिन्दी शीघ्रलेखन 60 शब्द प्रति मिनट और मुद्रलेखन 5,000 की-डिप्रेशन प्रति घंटा, जबकि सहायक ग्रेड-3 तथा संबंधित लिपिकीय पदों के लिए हिन्दी अथवा अंग्रेजी मुद्रलेखन की दक्षता 5,000 की-डिप्रेशन प्रति घंटा बताई गई है।विद्यार्थियों की मांग है कि जिन अभ्यर्थियों की अधिकृत अंकसूची में संबंधित पद के लिए आवश्यक दक्षता निर्धारित मानकों के अनुरूप प्रमाणित हो, उनकी योग्यता का परीक्षण उसी आधार पर किया जाए।हालांकि, केवल पाठ्यक्रम में किसी विषय का शामिल होना और भर्ती नियमों के अनुरूप निर्धारित गति या दक्षता का प्रमाणित होना अलग-अलग बातें हैं। इसलिए इस विवाद का समाधान MOM के वास्तविक पाठ्यक्रम, अंकसूची में दर्ज दक्षताओं और संबंधित भर्ती नियमों के तुलनात्मक परीक्षण से ही निकाला जा सकता है।1993 के शासनादेश का हवाला, क्या MOM विद्यार्थियों को मिल सकता है लाभ?इस मामले में विद्यार्थियों ने अविभाजित मध्यप्रदेश शासन के पूर्ववर्ती आदेशों का भी हवाला दिया है। उनका कहना है कि शासकीय पॉलीटेक्निक संस्थानों से प्राप्त कमर्शियल प्रैक्टिस, सेक्रेटेरियल प्रैक्टिस और स्टेनोग्राफी डिप्लोमा में अर्जित मुद्रलेखन एवं शीघ्रलेखन दक्षताओं को शासकीय नियुक्तियों में मान्यता देने की व्यवस्था रही है।विद्यार्थियों के अनुसार, 20 अप्रैल 1993 के शासनादेश में पॉलीटेक्निक संस्थानों से प्राप्त निर्धारित गति के मुद्रलेखन एवं शीघ्रलेखन प्रमाण-पत्रों को तत्कालीन मध्यप्रदेश शीघ्रलेखन एवं मुद्रलेखन परीक्षा परिषद के प्रमाण-पत्रों के समकक्ष मान्यता प्रदान की गई थी।वहीं, 10 दिसंबर 1993 के आदेश में संबंधित प्रमाण-पत्रों के दायरे को कमर्शियल प्रैक्टिस, सचिवालयीन प्रैक्टिस एवं स्टेनोग्राफी डिप्लोमा पाठ्यक्रम सफलतापूर्वक पूर्ण करने पर प्राप्त प्रमाण-पत्रों से जोड़ने का उल्लेख किया गया है।इन आदेशों का हवाला देते हुए विद्यार्थी चाहते हैं कि शासन यह स्पष्ट करे कि क्या इन प्रावधानों का लाभ वर्तमान MOM डिप्लोमाधारियों को दिया जा सकता है।लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी है: क्या इन पुराने आदेशों का दायरा वर्तमान तीन वर्षीय MOM पाठ्यक्रम पर स्वतः लागू होता है, अथवा इसके लिए अलग से समकक्षता आदेश जारी करना आवश्यक होगा? इसका उत्तर संबंधित शासनादेशों के मूल पाठ, वर्तमान नियमों और पाठ्यक्रम की आधिकारिक मान्यता की जांच के बाद ही दिया जा सकता है।तीन साल की तकनीकी पढ़ाई के बाद भी अतिरिक्त प्रमाण-पत्र का खर्च क्यों?MOM विद्यार्थियों का कहना है कि तीन वर्षीय डिप्लोमा पूरा करने में परिवारों को फीस, पुस्तकों, आवागमन, आवास और अन्य शैक्षणिक खर्चों पर पैसा लगाना पड़ता है। इनमें बड़ी संख्या ग्रामीण, गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के युवाओं की है, जो डिप्लोमा को रोजगार हासिल करने का माध्यम मानकर पढ़ाई करते हैं।ऐसे में यदि किसी भर्ती में पात्रता के लिए उसी कौशल का अलग प्रमाण-पत्र जरूरी हो, जिसे विद्यार्थी अपने डिप्लोमा के दौरान सीख चुके हैं, तो उन्हें अतिरिक्त परीक्षा शुल्क, तैयारी और समय का खर्च उठाना पड़ सकता है।विद्यार्थियों का तर्क है कि यदि निर्धारित कौशल पहले ही अधिकृत अंकसूची में प्रमाणित है, तो उसकी समकक्षता की जांच कर अनावश्यक दोहराव से बचने का रास्ता निकाला जाना चाहिए।हालांकि, भर्ती प्रक्रिया में अलग कौशल प्रमाण-पत्र की शर्त तभी समाप्त हो सकती है, जब संबंधित नियम इसकी अनुमति दें या सक्षम प्राधिकारी नियमानुसार आवश्यक संशोधन अथवा समकक्षता संबंधी आदेश जारी करे।कम्प्यूटर योग्यता पर भी स्पष्टता की मांगMOM विद्यार्थियों ने केवल टाइपिंग और स्टेनोग्राफी तक ही अपनी मांग सीमित नहीं रखी है। वे चाहते हैं कि डिप्लोमा के दौरान अर्जित कम्प्यूटर संबंधी योग्यता को भी संबंधित पदों के लिए निर्धारित कम्प्यूटर प्रमाण-पत्र की शर्तों के संदर्भ में परखा जाए।उनका कहना है कि आधुनिक कार्यालयों में कम्प्यूटर एप्लीकेशन, डाटा एंट्री, ऑफिस ऑटोमेशन और डिजिटल कार्यालय प्रबंधन की भूमिका लगातार बढ़ रही है। MOM पाठ्यक्रम में इन विषयों का प्रशिक्षण दिए जाने के कारण इसकी रोजगार संबंधी उपयोगिता का मूल्यांकन भी पाठ्यक्रम और निर्धारित मानकों के आधार पर किया जाना चाहिए।विद्यार्थियों ने आग्रह किया है कि यदि उनके पाठ्यक्रम में निर्धारित एक वर्षीय कम्प्यूटर डिप्लोमा के समकक्ष विषयवस्तु, प्रशिक्षण अवधि और दक्षताएं प्रमाणित हों, तो संबंधित नियमों के तहत समकक्षता पर स्पष्ट निर्णय लिया जाए।लेकिन यह समकक्षता स्वतः प्राप्त अधिकार नहीं मानी जा सकती। इसके लिए पाठ्यक्रम की विषयवस्तु, अवधि, परीक्षा प्रणाली और लागू भर्ती नियमों का आधिकारिक परीक्षण जरूरी होगा।मुख्य सचिव के सामने तीन बड़े सवालMOM विद्यार्थियों ने प्रदेश के मुख्य सचिव से हस्तक्षेप की मांग करते हुए तीन प्रमुख बिंदुओं पर निर्णय लेने का आग्रह किया है।पहला, क्या मान्यता प्राप्त पॉलीटेक्निक संस्थान से प्राप्त तीन वर्षीय MOM डिप्लोमा की अधिकृत अंकसूची में निर्धारित कौशल प्रमाणित होने पर संबंधित भर्ती में उसे स्वीकार किया जा सकता है?दूसरा, क्या पूर्ववर्ती मध्यप्रदेश शासन के 1993 के आदेशों और वर्तमान तकनीकी शिक्षा व्यवस्था के आधार पर MOM डिप्लोमा की शीघ्रलेखन एवं मुद्रलेखन दक्षताओं की समकक्षता निर्धारित की जा सकती है?तीसरा, क्या MOM में अर्जित कम्प्यूटर योग्यता को संबंधित पदों के लिए निर्धारित पृथक कम्प्यूटर प्रमाण-पत्र की अनिवार्यता के संदर्भ में परखकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं?विद्यार्थियों ने सामान्य प्रशासन विभाग और तकनीकी शिक्षा विभाग से पाठ्यक्रम, अंकसूचियों, व्यावहारिक परीक्षाओं तथा पूर्ववर्ती आदेशों का संयुक्त परीक्षण कराने की मांग की है। उनका आग्रह है कि पात्रता संबंधी नियमों में संशोधन अथवा स्पष्टीकरण जारी कर इस विषय में स्थिति स्पष्ट की जाए।विद्यार्थियों का सवाल—छूट नहीं, अर्जित योग्यता की मान्यता चाहिएMOM के अध्ययनरत एवं पूर्व विद्यार्थियों का कहना है कि वे सरकारी भर्ती में किसी प्रकार की विशेष रियायत, अतिरिक्त अंक या निर्धारित कौशल मानकों में छूट नहीं मांग रहे हैं।उनकी मांग है कि यदि किसी अभ्यर्थी ने मान्यता प्राप्त पॉलीटेक्निक संस्थान से तीन वर्षीय MOM डिप्लोमा प्राप्त किया है और उसकी अधिकृत अंकसूची में संबंधित पद के लिए आवश्यक कौशल निर्धारित मानकों के अनुरूप प्रमाणित है, तो लागू नियमों के तहत उस दक्षता को मान्यता देने पर विचार किया जाए।विद्यार्थियों के शब्दों में, तीन वर्षों तक पढ़ाई और अभ्यास करके अर्जित कौशल के लिए दोबारा प्रमाण-पत्र लेने की बाध्यता तभी उचित मानी जा सकती है, जब भर्ती नियमों में उसका स्पष्ट आधार हो और संबंधित दक्षताओं की समकक्षता स्वीकार्य न हो।अब शासन के फैसले पर टिकी नजरेंयह मामला केवल एक डिप्लोमा या प्रमाण-पत्र का नहीं, बल्कि तकनीकी शिक्षा और सरकारी भर्ती के बीच समन्वय का भी है। यदि पाठ्यक्रम में अर्जित दक्षताओं और भर्ती में निर्धारित कौशल मानकों के बीच स्पष्ट समकक्षता स्थापित की जा सकती है, तो इससे अभ्यर्थियों को अतिरिक्त आर्थिक और प्रक्रियागत बोझ से राहत मिल सकती है। दूसरी ओर, भर्ती की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह भी जरूरी है कि सभी अभ्यर्थियों की दक्षताओं का मूल्यांकन निर्धारित मानकों के अनुरूप हो।अब देखना यह है कि सामान्य प्रशासन विभाग और तकनीकी शिक्षा विभाग विद्यार्थियों की इस मांग पर क्या रुख अपनाते हैं। क्या MOM डिप्लोमा की वास्तविक विषयवस्तु और प्रमाणित दक्षताओं का परीक्षण कर नियमों में स्पष्टता लाई जाएगी, या विद्यार्थियों को उसी कौशल के लिए अलग प्रमाण-पत्र की शर्त का सामना करना पड़ता रहेगा?फिलहाल MOM डिप्लोमाधारियों की मांग स्पष्ट है—नियमों में पारदर्शिता हो, अर्जित कौशल की समकक्षता का निष्पक्ष परीक्षण हो और तीन वर्षों की तकनीकी शिक्षा की रोजगार संबंधी उपयोगिता पर शासन अपना स्पष्ट रुख सामने रखे।




