
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

बिलासपुर जिले के सकरी तहसील में कथित अवैध प्लाटिंग से जुड़े राजस्व प्रकरणों को लेकर गंभीर आरोप सामने आने के बाद तहसील की ऑनलाइन व्यवस्था, प्रकरण दर्ज करने की प्रक्रिया और रजिस्ट्री से लेकर नामांतरण तक की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। आरोप है कि अलग-अलग खसरों और अलग-अलग भू-स्वामियों की जमीनों को एक ही प्रकरण क्रमांक के तहत दर्ज कर रिकॉर्ड में उन्हें ‘प्रकरणाधीन’ दिखाया जाता रहा। इससे संबंधित खसरे ऑनलाइन व्यवस्था में लॉक दिखाई देने लगे और उनकी रजिस्ट्री प्रभावित होने की स्थिति बनी।मामला यहीं तक सीमित नहीं बताया जा रहा। आरोप है कि बी-121 के तहत दर्ज किए गए कुछ प्रकरणों में आवश्यक दस्तावेजों के स्थान पर सादा कागज यानी ब्लैंक पेपर अपलोड किया गया। सवाल यह है कि यदि किसी जमीन पर वास्तव में राजस्व प्रकरण दर्ज किया गया था, तो उसके आधार, कार्रवाई और आदेश से संबंधित दस्तावेज रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से क्यों नहीं दिखाई देते?सबसे गंभीर आरोप कथित तौर पर इस व्यवस्था के दुरुपयोग से जुड़ा है। चर्चा है कि कुछ खसरों की रजिस्ट्री करवाने के इच्छुक ब्रोकरों अथवा भू-कारोबारियों को संबंधित लोगों से संपर्क करने के लिए कहा जाता था और जमीन को कितने टुकड़ों में बेचना है, उसके आधार पर कथित रूप से रकम तय होने की बात सामने आ रही है। आरोप यह भी है कि कथित लेन-देन के बाद प्रकरण को अंतिम आदेश के जरिए नस्तीबद्ध किया जाता और वहां भी सादा कागज अपलोड कर दिया जाता।यदि ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह केवल किसी एक कर्मचारी या अधिकारी की कार्यप्रणाली का सवाल नहीं रहेगा, बल्कि ऑनलाइन राजस्व व्यवस्था की पारदर्शिता और उसकी निगरानी पर भी बड़ा प्रश्न खड़ा होगा।सरकार ने राजस्व रिकॉर्ड को डिजिटल इसलिए किया है ताकि जमीन से जुड़े मामलों में पारदर्शिता बढ़े, रिकॉर्ड सुरक्षित रहें और आम नागरिक को अनावश्यक कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। लेकिन यदि डिजिटल रिकॉर्ड में ही ऐसे दस्तावेज अपलोड किए जाएं जिनसे वास्तविक कार्रवाई स्पष्ट न हो, तो पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।स्थगन के बावजूद नामांतरण हुआ तो किसके आदेश पर?मामले का एक और संवेदनशील पहलू उन खसरों से जुड़ा बताया जा रहा है, जिन पर उच्चाधिकारियों द्वारा स्थगन लगाए जाने के बावजूद नामांतरण की कार्रवाई होने के आरोप हैं। यदि संबंधित रिकॉर्ड की जांच में यह तथ्य सही पाया जाता है तो सवाल उठेगा कि स्थगन आदेश के बावजूद नामांतरण किस आधार पर किया गया और संबंधित आदेश का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी?अब जांच का दायरा केवल कथित अवैध प्लाटिंग तक सीमित रखने के बजाय प्रकरण दर्ज होने से लेकर अंतिम आदेश, रजिस्ट्री और नामांतरण तक पूरी प्रक्रिया तक बढ़ाने की आवश्यकता दिखाई देती है।रिकॉर्ड की जांच हुई तो खुल सकता है पूरा सचइस मामले में निष्पक्ष जांच के लिए प्रत्येक संबंधित खसरे की केस हिस्ट्री, प्रकरण क्रमांक, अपलोड किए गए दस्तावेज, आदेश की तारीख, अंतिम आदेश, रजिस्ट्री की स्थिति, नामांतरण की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों के डिजिटल लॉग की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है।साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि—किस खसरे पर कौन-सा प्रकरण दर्ज हुआ?किस आधार पर दर्ज हुआ?दस्तावेज के स्थान पर ब्लैंक पेपर क्यों अपलोड किया गया?अंतिम आदेश में भी सादा कागज क्यों लगाया गया?स्थगन के बावजूद नामांतरण हुआ तो किस आधार पर?और क्या किसी व्यक्ति से इस प्रक्रिया के लिए आर्थिक लेन-देन किया गया?इन सवालों का जवाब केवल विभागीय फाइलों और डिजिटल रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।फिलहाल सकरी तहसील में उठ रहे आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष भी सामने आना बाकी है। इसलिए इन आरोपों को जांच के निष्कर्ष से पहले सत्य मानना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि रिकॉर्ड में एक ही तरह की प्रक्रिया बार-बार सामने आती है, तो इसकी स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता।आखिर जिस ‘सादे कागज’ पर कुछ लिखा दिखाई नहीं देता, कहीं वही राजस्व रिकॉर्ड की पूरी कहानी छिपाए तो नहीं बैठा है?




