तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में सरकारी आयोजनों और वीआईपी प्रोटोकॉल की व्यवस्था को लेकर बार-बार सामने आ रही अव्यवस्थाओं ने अब प्रशासनिक जवाबदेही पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह नहीं है कि किसी कार्यक्रम में व्यवस्था बिगड़ गई तो किस अधिकारी को मौके पर फटकार लगी, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि फटकार के बाद क्या कार्रवाई हुई? क्या जिम्मेदारी तय हुई? क्या संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया? और यदि गंभीर लापरवाही सामने आई तो क्या मुख्यमंत्री सचिवालय ने उस पर कोई ठोस प्रशासनिक निर्णय लिया?कुछ महीने पहले बेमेतरा जिले में आयोजित सरकारी विवाह समारोह में अव्यवस्थाओं को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने सार्वजनिक रूप से जिले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को नाराजगी जताते हुए फटकार लगाई थी। उस समय लगा था कि वीआईपी कार्यक्रमों की व्यवस्था में हुई चूक को सरकार गंभीरता से लेगी और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी। लेकिन समय बीतने के बाद भी यदि वही अधिकारी अपनी कुर्सियों पर बने हुए हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर उस फटकार का प्रशासनिक परिणाम क्या निकला?अब हाल में हनुमान अंश के दर्शन के लिए राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष सहित मंत्रिमंडल के सदस्यों के पहुंचने के दौरान भी प्रोटोकॉल और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अव्यवस्था सामने आने की चर्चा है। बताया जाता है कि व्यवस्था से नाराज सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों को फटकार लगाई। यानी एक बार फिर वही तस्वीर—बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की मौजूदगी, सरकारी मशीनरी की भारी तैयारी और उसके बावजूद मौके पर अव्यवस्था।यहीं से सवाल और गंभीर हो जाता है।क्या सरकारी आयोजनों में फटकार ही अंतिम कार्रवाई रह गई है?यदि किसी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री, राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष अथवा मंत्रिमंडल की मौजूदगी के दौरान प्रोटोकॉल व्यवस्था में चूक होती है, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या केवल मौके पर अधिकारी को डांट देना ही पर्याप्त है? क्या बाद में शासन स्तर पर रिपोर्ट तलब नहीं की जानी चाहिए? क्या जिम्मेदारी तय कर भविष्य के लिए जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होनी चाहिए?सबसे बड़ा सवाल मुख्यमंत्री सचिवालय की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहा है। मुख्यमंत्री स्वयं राज्य के प्रशासनिक मुखिया हैं और मुख्यमंत्री सचिवालय शासन की महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं की निगरानी का केंद्र है। ऐसे में यदि लगातार दो अलग-अलग मौकों पर वीआईपी प्रोटोकॉल और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर सार्वजनिक रूप से नाराजगी सामने आती है, तो स्वाभाविक रूप से अपेक्षा होती है कि सचिवालय पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए जिम्मेदार अधिकारियों से रिपोर्ट मांगता और आवश्यक कार्रवाई करता।लेकिन यदि फटकार के बाद भी व्यवस्था जस की तस दिखाई देती है और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं होती, तो फिर यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रशासन में जवाबदेही केवल भाषणों और मौके की नाराजगी तक सीमित रह गई है?सरकार यदि किसी अधिकारी को महत्वपूर्ण जिले की जिम्मेदारी देती है तो उससे केवल प्रशासन चलाने की अपेक्षा नहीं होती, बल्कि मुख्यमंत्री, राज्यपाल और अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों के कार्यक्रमों में प्रोटोकॉल से लेकर सुरक्षा और समन्वय तक हर स्तर पर बेहतर व्यवस्था की उम्मीद की जाती है। ऐसी व्यवस्था में चूक सामान्य घटना नहीं मानी जा सकती, क्योंकि यह सीधे शासन की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक समन्वय की तस्वीर प्रस्तुत करती है।यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है—क्या फटकार लगाने वाले जनप्रतिनिधियों की नाराजगी को शासन गंभीर प्रशासनिक संकेत मानता है या फिर उसे मौके की घटना समझकर भूल जाता है?बेमेतरा की घटना के बाद यदि कोई प्रभावी समीक्षा हुई थी तो उसका परिणाम क्या रहा? संबंधित अधिकारियों से क्या स्पष्टीकरण लिया गया? हालिया घटना के बाद क्या पुलिस और प्रशासन से रिपोर्ट मांगी गई? क्या प्रोटोकॉल व्यवस्था की समीक्षा हुई? क्या भविष्य में ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए कोई स्थायी व्यवस्था तैयार की गई?इन सवालों के जवाब जनता को मिलना चाहिए।क्योंकि सवाल किसी एक अधिकारी की कुर्सी बचाने या हटाने का नहीं है। सवाल है प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही का। यदि गलती हुई है तो जांच हो, गलती नहीं हुई है तो सरकार स्पष्ट करे कि फिर फटकार किस बात पर लगी और अव्यवस्था किसकी जिम्मेदारी थी।लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारी भी कानून और नियमों के अनुसार काम करते हैं, लेकिन पद जितना बड़ा होता है, जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होती है। इसलिए सरकार से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह किसी भी अधिकारी के विरुद्ध केवल राजनीतिक दबाव में नहीं, बल्कि तथ्यों और जांच के आधार पर निर्णय ले। लेकिन इसके उलट यदि सार्वजनिक रूप से गंभीर नाराजगी व्यक्त होने के बाद भी कोई प्रशासनिक समीक्षा दिखाई नहीं देती, तो शासन की जवाबदेही पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।फटकार के बाद खामोशी आखिर क्यों?क्या मुख्यमंत्री सचिवालय संबंधित घटनाओं की रिपोर्ट तलब करेगा? क्या प्रोटोकॉल व्यवस्था में हुई चूकों की जिम्मेदारी तय होगी? क्या अधिकारियों से जवाब मांगा जाएगा? या फिर कुछ दिनों की चर्चा के बाद मामला भी दूसरी फाइलों की तरह सरकारी अलमारियों में दब जाएगा?छत्तीसगढ़ की जनता अब केवल यह नहीं देखना चाहती कि मंच पर कौन किस अधिकारी को फटकार लगा रहा है। जनता यह भी देखना चाहती है कि फटकार के बाद शासन की कलम चलती है या नहीं।क्योंकि अगर सार्वजनिक नाराजगी के बाद भी कोई जवाबदेही तय नहीं होती, तो फिर सवाल केवल अव्यवस्था का नहीं रहता—सवाल यह बन जाता है कि आखिर किसकी कृपा से व्यवस्था में चूक करने वालों की कुर्सियां इतनी मजबूत हैं कि फटकार भी उन्हें हिला नहीं पा रही?



