
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं। पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद सत्ता बदलती है, मंत्री बदलते हैं, नीतियों की प्राथमिकताएं बदलती हैं और राजनीतिक समीकरण भी बदल जाते हैं। लेकिन शासन की असली निरंतरता जिन हाथों में रहती है, वे हाथ अफसरशाही के होते हैं। एक सरकार पांच साल की होती है, लेकिन एक अफसर अपने लंबे प्रशासनिक अनुभव के आधार पर कई सरकारों को देखता और कई पीढ़ियों तक शासन व्यवस्था को प्रभावित करता है। यही कारण है कि किसी भी राज्य के विकास की असली क्षमता केवल राजनीतिक नेतृत्व से नहीं, बल्कि उसकी प्रशासनिक मशीनरी की कार्यशैली, दृष्टि और ईमानदार इच्छाशक्ति से भी तय होती है।छत्तीसगढ़ आज प्राकृतिक संसाधनों, वन संपदा, खनिज संपदा, आदिवासी संस्कृति, लोककला, कृषि, ऊर्जा और युवा प्रतिभाओं से समृद्ध राज्य है। यहां विकास की अपार संभावनाएं हैं। सवाल यह है कि क्या हमारी प्रशासनिक व्यवस्था इन संभावनाओं को विश्वस्तरीय पहचान में बदलने के लिए तैयार है?सच्चाई यह है कि एक दूरदर्शी और संवेदनशील अफसर चाहे तो जिले की तस्वीर बदल सकता है। वह चाहे तो भ्रष्टाचार पर लगाम लगा सकता है, स्कूलों को बेहतर बना सकता है, अस्पतालों की व्यवस्था सुधार सकता है, पर्यटन स्थलों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला सकता है, उद्योगों को बढ़ावा दे सकता है और आम आदमी तक शासन की योजनाओं का वास्तविक लाभ पहुंचा सकता है। पद की कुर्सी केवल अधिकार नहीं होती, वह जिम्मेदारी और इतिहास बनाने का अवसर भी होती है।आज जरूरत फाइलों में उलझे प्रशासन की नहीं, बल्कि परिणाम देने वाले प्रशासन की है। छत्तीसगढ़ में ऐसे अनेक अधिकारी रहे हैं जिन्होंने अपने काम से साबित किया है कि सीमित संसाधनों में भी असाधारण परिवर्तन संभव है। आवश्यकता है कि हर अधिकारी अपने पदस्थापन को केवल नौकरी और सेवा अवधि के रूप में न देखे, बल्कि उस क्षेत्र में एक ऐसी पहचान छोड़कर जाए, जिसे आने वाली पीढ़ियां याद रखें।सिर्फ तबादले की प्रतीक्षा नहीं, बदलाव की पहल जरूरीविडंबना यह है कि कई अधिकारी अपना अधिकांश समय केवल पदस्थापना बचाने, स्थानांतरण रुकवाने, वरिष्ठों को संतुष्ट करने और फाइलों की औपचारिकता पूरी करने में लगा देते हैं। जबकि सरकारें पांच साल में बदल जाती हैं, मंत्री बदल जाते हैं, राजनीतिक परिस्थितियां बदल जाती हैं, लेकिन एक अफसर के काम की पहचान लंबे समय तक जीवित रहती है।इसलिए अफसरों को यह समझना होगा कि कुर्सी स्थायी नहीं है, लेकिन काम की पहचान स्थायी हो सकती है।किसी अधिकारी ने अगर अपने कार्यकाल में एक भ्रष्ट व्यवस्था को सुधारा, एक सरकारी स्कूल को मॉडल स्कूल बनाया, किसी पिछड़े गांव को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा, किसी पर्यटन स्थल को राष्ट्रीय पहचान दिलाई या किसी गरीब परिवार तक वास्तविक न्याय पहुंचाया—तो उसका कार्यकाल केवल सेवा रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं रहेगा, बल्कि वह प्रशासनिक इतिहास बन जाएगा।छत्तीसगढ़ को चाहिए वैश्विक सोच वाला प्रशासनआज दुनिया बदल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल गवर्नेंस, ग्रीन एनर्जी, स्मार्ट कृषि, इको-टूरिज्म और स्थानीय उत्पादों के वैश्विक बाजार का दौर है। छत्तीसगढ़ के पास अवसरों की कमी नहीं है। कमी है तो उन्हें एक बड़े विजन के साथ जोड़ने की।छत्तीसगढ़ की बस्तर संस्कृति, जंगल, जलप्रपात, आदिवासी कला, हस्तशिल्प, जैविक कृषि और खनिज संसाधन विश्व के सामने एक अलग पहचान बना सकते हैं। लेकिन इसके लिए केवल योजनाएं और घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। जमीन पर परिणाम देने वाली प्रशासनिक इच्छाशक्ति चाहिए।अगर जिले का कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, वन अधिकारी, नगर निगम आयुक्त, जिला पंचायत सीईओ और विभागीय अधिकारी एक साझा लक्ष्य के साथ काम करें, तो कोई कारण नहीं कि छत्तीसगढ़ के जिले देश और दुनिया के लिए विकास के मॉडल न बनें।सरकार नीति बनाती है, अफसर उसे जमीन पर उतारता हैराजनीतिक नेतृत्व का काम दिशा तय करना है, लेकिन उस दिशा को धरातल पर परिणाम में बदलने का दायित्व प्रशासन का है। यही कारण है कि एक ही सरकार के कार्यकाल में कुछ जिले उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं और कुछ जिले पिछड़े रह जाते हैं। फर्क केवल संसाधनों का नहीं होता, बल्कि प्रशासनिक नेतृत्व की क्षमता और इच्छाशक्ति का भी होता है।छत्तीसगढ़ को ऐसे अफसरों की जरूरत है जो केवल आदेश का इंतजार न करें, बल्कि समस्या को पहचानकर समाधान खोजें। जो शिकायतों को बोझ नहीं, जनता के दर्द का दस्तावेज समझें। जो कार्यालय को केवल कुर्सी और फाइलों तक सीमित न रखें, बल्कि गांव, स्कूल, अस्पताल, सड़क और आम नागरिक के बीच जाकर शासन की वास्तविक स्थिति देखें।अधिकारी चाहें तो बदल सकती है छत्तीसगढ़ की पहचानछत्तीसगढ़ की पहचान केवल खनिज, कोयला और जंगल तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसे उत्कृष्ट शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था, स्वच्छ शहरों, ईमानदार प्रशासन, आदिवासी विकास, महिला सशक्तिकरण, कृषि नवाचार, पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी जाना जाना चाहिए।यह बदलाव किसी एक मुख्यमंत्री, मंत्री या एक विभाग के भरोसे संभव नहीं है। इसके लिए पूरे प्रशासनिक तंत्र को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।सरकार पांच साल में बदल सकती है, लेकिन एक ईमानदार और दूरदर्शी अफसर अपने काम से दशकों तक याद रखा जा सकता है।आज छत्तीसगढ़ के अफसरों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या वे केवल नौकरी पूरी करना चाहते हैं या अपने कार्यकाल से एक नया इतिहास बनाना चाहते हैं?क्योंकि अगर छत्तीसगढ़ का प्रशासन ठान ले, तो यह राज्य केवल देश में नहीं, बल्कि विश्व पटल पर अपनी एक अलग और सम्मानजनक पहचान बना सकता है। प्राकृतिक संपदा हमें ईश्वर ने दी है, लेकिन उस संपदा को विकास, सम्मान और वैश्विक पहचान में बदलने की जिम्मेदारी इंसानों के हाथ में है—और उन हाथों में सबसे महत्वपूर्ण हाथ हैं, छत्तीसगढ़ के अफसरों के। अब समय केवल सरकार के पांच साल गिनने का नहीं, बल्कि अफसरों के काम को इतिहास के तराजू पर तौलने का है।



