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वरिष्ठों के आदेश पर कनिष्ठों की बेरुखी, छत्तीसगढ़ की अफसरशाही में अनुशासन का सवाल…आदेश ऊपर से, अमल नीचे से—फिर भी कुछ अफसर क्यों नहीं मानते शासन की बात?

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

प्रशासनिक व्यवस्था में पद केवल अधिकार का प्रतीक नहीं होता, बल्कि उसके साथ जवाबदेही और अनुशासन की जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। खासकर भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे शासन के निर्णयों, विभागीय निर्देशों और अपने वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों का समयबद्ध और गंभीरता से पालन करेंगे। लेकिन छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक अलग तरह की चर्चा सुनाई दे रही है—कुछ आईएएस और आईपीएस अधिकारियों द्वारा अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों को अपेक्षित गंभीरता से नहीं लेने की शिकायतें आखिर क्यों सामने आ रही हैं?प्रदेश में हाल के महीनों में प्रशासनिक स्तर पर लगातार बड़े फेरबदल हुए हैं। मई में 42 आईएएस और एक आईएफएस अधिकारी के प्रभार बदले गए, जबकि जुलाई में भी आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की बड़ी संख्या में नई पदस्थापनाएं की गईं। जुलाई में 24 आईपीएस अधिकारियों के तबादले के साथ कई जिलों के एसपी और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारियां बदली गईं। ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि जब सरकार प्रशासनिक ढांचे को लगातार पुनर्गठित कर रही है और अधिकारियों को नई जिम्मेदारियां सौंप रही है, तब क्या विभागीय कमान और वरिष्ठ-कनिष्ठ अनुशासन भी उसी मजबूती से जमीन पर दिखाई दे रहा है?सरकार में वरिष्ठ अधिकारी किसी आदेश को केवल व्यक्तिगत इच्छा के आधार पर जारी नहीं करते। शासन की नीति, नियम, अधिनियम और प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर निर्णय लिए जाते हैं। वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थ अधिकारियों को दिशा-निर्देश देते हैं और उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे निर्धारित समय में उसका पालन सुनिश्चित करें। यदि किसी अधिकारी को आदेश में नियमविरुद्धता दिखाई देती है तो उसके पास आपत्ति दर्ज कराने, लिखित स्पष्टीकरण मांगने अथवा निर्धारित प्रशासनिक माध्यम से अपनी बात रखने का रास्ता मौजूद है। लेकिन आदेश को मौन रूप से टाल देना, फाइल को लंबित रखना, बैठक में अनुपस्थित रहना अथवा निर्देशों को अपने स्तर पर अलग तरीके से लागू करना प्रशासनिक अनुशासन के लिए गंभीर प्रश्न खड़े करता है।मुद्दा किसी एक अधिकारी का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की कार्यक्षमता का है। यदि वरिष्ठ अधिकारी निर्देश जारी करें और कनिष्ठ अधिकारी उसकी अनदेखी करें, तो इसका असर सीधे शासन की कार्यप्रणाली पर पड़ता है। एक आदेश की अवहेलना केवल एक फाइल को प्रभावित नहीं करती, बल्कि उसके साथ जुड़े विभाग, जिला प्रशासन, पुलिस व्यवस्था और अंततः आम नागरिक तक उसका प्रभाव पहुंच सकता है। प्रशासन की सबसे बड़ी ताकत उसकी कमान की स्पष्टता और निर्णयों के क्रियान्वयन में होती है।यह भी समझना होगा कि आईएएस और आईपीएस अधिकारी संवैधानिक एवं वैधानिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। उनसे अंधानुकरण नहीं, बल्कि नियमसम्मत कार्यवाही की अपेक्षा की जाती है। यदि कोई निर्देश कानून या नियमों के विपरीत है तो अधिकारी का कर्तव्य है कि वह उचित माध्यम से अपनी आपत्ति दर्ज करे। लेकिन यदि निर्देश विधिसम्मत है और फिर भी उसका पालन जानबूझकर नहीं होता, तो सवाल केवल कार्यशैली का नहीं बल्कि जवाबदेही का बन जाता है।प्रशासनिक गलियारों में कभी-कभी यह धारणा भी बनती है कि कुछ अधिकारी अपने पद, प्रभाव या राजनीतिक-प्रशासनिक संपर्कों के कारण वरिष्ठों के निर्देशों को भी सहजता से नजरअंदाज कर सकते हैं। ऐसी धारणा किसी भी सरकार के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती। यदि यह धारणा गलत है तो सरकार और संबंधित विभागों को पारदर्शिता के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, और यदि कहीं वास्तविक समस्या है तो समय रहते उसे दूर करना चाहिए।पुलिस विभाग में इसका महत्व और बढ़ जाता है। पुलिस व्यवस्था में कमान की श्रृंखला स्पष्ट होती है। डीजीपी से लेकर आईजी, डीआईजी और एसपी स्तर तक जिम्मेदारियां निर्धारित होती हैं। यदि किसी स्तर पर निर्देशों की अनदेखी की संस्कृति विकसित होती है तो उसका असर कानून-व्यवस्था, अपराध नियंत्रण और जनता के विश्वास पर पड़ सकता है। जुलाई में प्रदेश में 24 आईपीएस अधिकारियों के तबादले और नई जिम्मेदारियां इसी बात का संकेत हैं कि सरकार पुलिस प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए लगातार बदलाव कर रही है। ऐसे में नई जिम्मेदारी के साथ नई जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।प्रशासन में असहमति कोई अपराध नहीं है। बल्कि स्वस्थ प्रशासन के लिए तथ्यात्मक असहमति जरूरी है। वरिष्ठ अधिकारी के आदेश से असहमति होने पर नियमों के तहत अपनी बात रखना एक बात है और आदेश को ही नजरअंदाज कर देना दूसरी बात। दोनों के बीच की यही महीन रेखा प्रशासनिक अनुशासन और मनमानी के बीच अंतर पैदा करती है।आज जरूरत इस बात की है कि सरकार केवल तबादले और पदस्थापनाओं तक सीमित न रहे, बल्कि आदेशों के क्रियान्वयन की भी समीक्षा करे। कौन-सा निर्देश कब जारी हुआ, उसका पालन कब हुआ, यदि नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ और जिम्मेदार अधिकारी ने क्या कार्रवाई की—इस पूरी प्रक्रिया को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। विभागीय बैठकों में उपस्थिति, लंबित फाइलों, शासन के निर्देशों के पालन और समयसीमा में किए गए कार्यों की नियमित समीक्षा हो तो अफसरशाही में जवाबदेही और अनुशासन दोनों मजबूत होंगे।छत्तीसगढ़ में सुशासन की बात तभी सार्थक होगी जब शासन का निर्णय अंतिम स्तर तक दिखाई दे। मंत्रालय में बैठकर जारी आदेश और मैदान में उसका पालन—इन दोनों के बीच जितना कम अंतर होगा, प्रशासन उतना ही प्रभावी माना जाएगा। अधिकारी चाहे कितना भी वरिष्ठ क्यों न हो, उसे नियमों और शासन व्यवस्था के प्रति जवाबदेह होना ही पड़ेगा; और कनिष्ठ अधिकारी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे भी प्रशासनिक कमान और वैधानिक व्यवस्था का सम्मान करना होगा।सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि वरिष्ठ अधिकारी का आदेश भी पालन के लिए पर्याप्त नहीं रहा, तो फिर प्रशासन में आदेश की अंतिम सत्ता किसकी है? सरकार को इस सवाल का जवाब केवल कागज पर नहीं, बल्कि कार्रवाई और परिणाम के माध्यम से देना होगा। क्योंकि अफसरशाही में अनुशासन कमजोर हुआ तो उसका खामियाजा किसी एक अधिकारी को नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था और अंततः आम जनता को भुगतना पड़ता है।हाल के प्रशासनिक फेरबदल यह बताते हैं कि सरकार के पास अधिकारियों की जिम्मेदारियां बदलने और नई कमान तय करने का अधिकार मौजूद है। अब जरूरत इस बात की है कि नई कमान के साथ नई जवाबदेही भी दिखाई दे—आदेश का सम्मान हो, असहमति नियमों के भीतर हो और शासन की बात अंतिम छोर तक उसी गंभीरता से पहुंचे, जिस गंभीरता से वह जारी की गई है।

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