
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

नगरीय निकायों में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति, पुत्र, पुत्री, भाई, बहन अथवा अन्य निकट संबंधियों के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से कामकाज संचालित किए जाने की व्यवस्था पर राज्य शासन ने रोक लगाने का बड़ा फैसला किया है। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने छत्तीसगढ़ नगरपालिक (लोकसभा सदस्य या राज्य विधानसभा के सदस्य या राज्य सभा के सदस्य द्वारा प्रतिनिधि के रूप में नाम निर्देशन हेतु अर्हताएँ) नियम, 2022 में संशोधन करते हुए स्पष्ट प्रावधान किया है कि किसी भी नगरीय निकाय में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि के किसी पारिवारिक सदस्य या नातेदार को उनके परोक्ष प्रतिनिधि अथवा समन्वयक व्यक्ति के रूप में नाम-निर्दिष्ट या नियुक्त नहीं किया जाएगा। राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित होने के साथ ही यह व्यवस्था प्रदेश के सभी नगरीय निकायों में प्रभावी हो गई है।सरकार का यह निर्णय पहली नजर में महिला जनप्रतिनिधियों को वास्तविक रूप से अधिकार संपन्न बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम दिखाई देता है, लेकिन असली सवाल अब आदेश जारी होने का नहीं बल्कि उसके धरातल पर पालन का है। प्रदेश के नगरीय निकायों में लंबे समय से यह शिकायत सामने आती रही है कि कई निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति या परिवार के अन्य सदस्य बैठकों, अधिकारियों से मुलाकात, विकास कार्यों की निगरानी और प्रशासनिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। कई मामलों में निर्वाचित प्रतिनिधि का नाम और पद भले महिला के नाम पर हो, लेकिन व्यवहारिक रूप से निर्णय लेने और अधिकारियों से समन्वय की भूमिका परिवार के पुरुष सदस्य निभाते हैं। ऐसे में अब नियम बदलने के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या केवल राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित कर देने से यह व्यवस्था वास्तव में समाप्त हो जाएगी?आदेश के पालन की निगरानी कौन करेगा और किस स्तर पर करेगा, यह सवाल भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी महिला पार्षद, अध्यक्ष या अन्य निर्वाचित प्रतिनिधि की जगह उसका पति अथवा कोई निकट रिश्तेदार अधिकारियों के साथ लगातार बैठक करता है, निर्देश देता है या विकास कार्यों में हस्तक्षेप करता है तो उसकी पहचान और कार्रवाई की प्रक्रिया क्या होगी? क्या नगरीय प्रशासन विभाग नियमित रूप से इसकी निगरानी करेगा? क्या संबंधित मुख्य नगर पालिका अधिकारी अथवा आयुक्त इसकी रिपोर्ट करेंगे? और यदि अधिकारी ही ऐसे पारिवारिक सदस्यों को महत्व देते रहे तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी होगी?सबसे बड़ी चुनौती उन मामलों में सामने आएगी जहां प्रतिनिधि के रूप में किसी रिश्तेदार का औपचारिक नाम-निर्देशन नहीं होगा, लेकिन व्यवहार में वही व्यक्ति निर्वाचित महिला की जगह पूरी व्यवस्था संचालित करेगा। क्योंकि नया प्रावधान मुख्य रूप से नाम-निर्देशन अथवा नियुक्ति पर रोक लगाता है। ऐसे में किसी महिला प्रतिनिधि के पति या परिवार के सदस्य का अनौपचारिक रूप से कार्यालयों में जाना, अधिकारियों से चर्चा करना, फाइलों और विकास कार्यों की जानकारी लेना या राजनीतिक प्रभाव के जरिए निर्णयों को प्रभावित करना किस श्रेणी में आएगा, इस पर भी स्पष्ट प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत होगी।यही वजह है कि अब सरकार के सामने केवल नियम बनाने की नहीं बल्कि नियम को लागू कराने की चुनौती है। यदि निगरानी की ठोस व्यवस्था नहीं बनाई गई तो कागज पर महिला जनप्रतिनिधि और जमीन पर उनके पारिवारिक प्रतिनिधि की पुरानी व्यवस्था नए तरीके से जारी रह सकती है। नाम-निर्देशन पर रोक लगने के बाद यह भी देखना होगा कि कहीं अब अनौपचारिक ‘प्रतिनिधि व्यवस्था’ तो विकसित नहीं हो जाती।यह फैसला उन महिला जनप्रतिनिधियों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो स्वयं अपने पद की जिम्मेदारी निभाना चाहती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाताओं ने जिस व्यक्ति को चुनकर भेजा है, जनता के प्रति जवाबदेही भी उसी निर्वाचित प्रतिनिधि की होनी चाहिए। यदि चुनी गई महिला के स्थान पर कोई दूसरा व्यक्ति निर्णय लेता है या अधिकारियों के समक्ष खुद को उसका प्रतिनिधि बताकर काम करता है तो इससे न केवल महिला सशक्तिकरण की भावना कमजोर होती है बल्कि स्थानीय स्वशासन की मूल भावना पर भी सवाल खड़े होते हैं।अब निगाहें नगरीय प्रशासन विभाग और जिला प्रशासन पर होंगी कि इस अधिसूचना के बाद कितने नगरीय निकायों में वास्तविक स्थिति की जांच होती है और कितने मामलों में कार्रवाई की जाती है। यदि सरकार इस आदेश को लेकर गंभीर है तो केवल नाम-निर्देशन पर रोक पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि निकाय स्तर पर स्पष्ट दिशा-निर्देश, शिकायत तंत्र, निगरानी व्यवस्था और उल्लंघन पर जवाबदेही भी तय करनी होगी।क्योंकि सवाल अब यह नहीं है कि ‘आदेश जारी हुआ या नहीं?’ सवाल यह है कि क्या आदेश के बाद भी नगर निकायों में महिला प्रतिनिधि के नाम पर ‘परिवार का राज’ चलता रहेगा? यदि पुराने तौर-तरीकों पर प्रभावी अंकुश नहीं लगा तो यह अधिसूचना भी उन अनेक सरकारी आदेशों की कतार में खड़ी दिखाई दे सकती है, जो राजपत्र में तो प्रभावी होते हैं, लेकिन जमीन पर उनकी प्रभावशीलता सवालों के घेरे में रहती है।




