
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़। प्रदेश में विकास को लेकर सरकार और जनप्रतिनिधियों की ओर से लगातार बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन इन दावों की वास्तविकता छत्तीसगढ़ के दूरस्थ आदिवासी अंचलों में पहुंचते ही कुछ और नजर आती है। बस्तर से लेकर सरगुजा-अंबिकापुर संभाग, दुर्ग और बिलासपुर संभाग के सुदूर वनांचलों में आज भी ऐसे अनेक गांव और बसाहटें हैं, जहां ग्रामीणों के लिए सड़क और नदी-नालों पर पुल जैसी बुनियादी सुविधाएं सपना बनी हुई हैं। बरसात के दिनों में इन क्षेत्रों की स्थिति और भी भयावह हो जाती है। नदी-नाले उफान पर आते ही कई गांवों का मुख्य मार्गों से संपर्क टूट जाता है और ग्रामीणों को अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी जान जोखिम में डालकर पानी पार करना पड़ता है। तस्वीर में दिखाई दे रहा दृश्य इसी जमीनी हकीकत की ओर इशारा करता है कि विकास की योजनाएं भले ही सरकारी फाइलों में तेजी से आगे बढ़ती दिखाई दें, लेकिन उनका असर अंतिम छोर तक पहुंचा है या नहीं, यह सवाल आज भी जस का तस खड़ा है।आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं है, बल्कि यही सड़क ग्रामीणों को अस्पताल, स्कूल, बाजार, रोजगार और सरकारी योजनाओं से जोड़ती है। जहां सड़क नहीं है, वहां बरसात के दिनों में एंबुलेंस तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और किसी गंभीर बीमारी या आपात स्थिति में मरीज को अस्पताल तक पहुंचाना परिवार के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। कई स्थानों पर नदी-नालों पर स्थायी पुल या मजबूत पुलिया नहीं होने के कारण बरसात में ग्रामीणों का संपर्क पूरी तरह बाधित हो जाता है। ऐसे हालात में सवाल सिर्फ विकास की गति का नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की प्राथमिकताओं का भी है।सबसे बड़ा सवाल स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर उठता है। चुनाव के समय दूरस्थ गांवों तक पहुंचकर ग्रामीणों से विकास के वादे करने वाले जनप्रतिनिधि क्या चुनाव के बाद इन क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति देखने के लिए कभी उसी रास्ते से गुजरते हैं? क्या उन्हें पता है कि जिस नदी या नाले को पार करने में कुछ मिनट लगते हैं, उसी को बरसात में पार करना ग्रामीणों के लिए जिंदगी और मौत के बीच का जोखिम बन जाता है? क्या कभी यह गंभीरता से समीक्षा की गई कि कितने गांव ऐसे हैं जिनका बारिश के दिनों में जिला मुख्यालय, तहसील, अस्पताल या बाजार से संपर्क टूट जाता है? यदि ऐसी समस्याएं वर्षों से मौजूद हैं तो फिर इनके स्थायी समाधान के लिए अब तक क्या ठोस प्रयास किए गए, यह सवाल भी जनता के सामने जवाब मांग रहा है।सरकार आदिवासी और वनांचल क्षेत्रों के विकास के लिए अनेक योजनाएं संचालित करती है। सड़क, पुल-पुलिया, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के नाम पर हर वर्ष बजट भी निर्धारित होता है, लेकिन असली सवाल यह है कि उस बजट का कितना हिस्सा उन गांवों तक पहुंच रहा है जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। विकास का मूल्यांकन केवल शहरों में बनी सड़कों, भवनों और बड़े प्रोजेक्टों से नहीं किया जा सकता। विकास की असली कसौटी तो वह अंतिम गांव है, जहां आज भी ग्रामीण सुरक्षित रास्ते के इंतजार में हैं और बरसात में एक नदी या नाला उनके पूरे जीवन को रोक देता है।यह तस्वीर केवल एक ग्रामीण परिवार की मजबूरी नहीं, बल्कि व्यवस्था के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल है। आखिर आजादी के दशकों बाद भी आदिवासी अंचलों के लोगों को सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए इतना लंबा इंतजार क्यों करना पड़ रहा है? क्या इन क्षेत्रों की समस्याएं इसलिए नजरअंदाज होती हैं क्योंकि ये गांव शहरों और सत्ता के गलियारों से दूर हैं? क्या स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों के सबसे पिछड़े गांवों की प्राथमिकता सूची तैयार कर शासन के सामने रखी है? यदि रखी है तो उन प्रस्तावों पर कितना काम हुआ और यदि काम नहीं हुआ तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?जरूरत अब केवल घोषणाओं और कागजी योजनाओं की नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले विकास की है। सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों का वास्तविक मैदानी सर्वे कर ऐसे सभी गांवों को चिन्हित करें, जहां सड़क, पुल या पुलिया के अभाव में ग्रामीणों का जीवन प्रभावित हो रहा है। बरसात में जिन रास्तों से आवागमन बंद हो जाता है, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर स्थायी समाधान से जोड़ना होगा। क्योंकि जब तक विकास की रोशनी प्रदेश के अंतिम गांव और अंतिम परिवार तक नहीं पहुंचती, तब तक विकास के बड़े-बड़े दावों की चमक अधूरी ही मानी जाएगी।तस्वीर आज भी सवाल पूछ रही है—आखिर विकास की यह सड़क आदिवासी अंचलों तक कब पहुंचेगी? और नदी-नालों पर पुल का इंतजार कर रहे ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालकर सफर करने से आखिर कब मुक्ति मिलेगी?



