
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
देश की आजादी की 80वीं वर्षगांठ के अवसर पर 15 अगस्त से पहले देशभर में तिरंगा यात्राओं के जरिए राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रीय गौरव का संदेश दिया जा रहा है। कोरबा जिले में भी विभिन्न स्थानों पर तिरंगा यात्राएं आयोजित की जा रही हैं। इसी क्रम में बालको क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं की अगुवाई में निकाली गई तिरंगा यात्रा अब एक अलग ही वजह से चर्चा में है। आरोप है कि यात्रा के दौरान कई लोगों के हाथों में तिरंगा ध्वज उल्टा नजर आया और पूरी यात्रा उसी स्थिति में आगे बढ़ती रही।बालको क्षेत्र के पार्षद एवं पूर्व नेता प्रतिपक्ष हितानंद अग्रवाल की अगुवाई में बालको मंडल अध्यक्ष डिलेंद्र यादव, वरिष्ठ नेत्री मंजू सिंह सहित भाजपा के अन्य पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता तिरंगा यात्रा में शामिल हुए। भारत माता के जयकारों और देशभक्ति के नारों के बीच यात्रा बालको की गलियों और मोहल्लों से होकर गुजरी। लेकिन इसी दौरान यात्रा के सबसे आगे चल रहे पूर्व नेता प्रतिपक्ष हितानंद अग्रवाल के हाथ में मौजूद राष्ट्रीय ध्वज को लेकर सवाल खड़े हो गए। तस्वीरों और वीडियो में ध्वज की दिशा उल्टी दिखाई देने की बात सामने आई। इतना ही नहीं, यात्रा में शामिल कुछ अन्य लोगों के हाथों में भी तिरंगे उल्टी स्थिति में नजर आने की चर्चा है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस यात्रा का उद्देश्य राष्ट्रध्वज के सम्मान, राष्ट्रभक्ति और देश के प्रति गौरव का संदेश देना था, उसी यात्रा में राष्ट्रीय ध्वज की मूल मर्यादा का ध्यान क्यों नहीं रखा गया? यात्रा शुरू होने से पहले क्या किसी जिम्मेदार पदाधिकारी ने यह सुनिश्चित नहीं किया कि सभी ध्वज सही तरीके से लगाए और थामे गए हैं? और जब सबसे आगे चल रहे प्रमुख नेता के हाथ में ही ध्वज था, तब किसी की नजर उस पर क्यों नहीं गई?मामला तब और चर्चा में आया जब यात्रा के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रचारित किए गए। बाद में जब कथित तौर पर ध्वज की स्थिति पर ध्यान गया तो सोशल मीडिया से संबंधित तस्वीरें और वीडियो हटाए जाने की बात सामने आई। यही कदम अब पूरे मामले को लेकर नए सवाल खड़े कर रहा है। यदि यह महज मानवीय भूल थी तो उसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने के बजाय सोशल मीडिया सामग्री हटाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या गलती सामने आने के बाद उसे सुधारने और लोगों को सही संदेश देने के बजाय उसे छिपाने का प्रयास किया गया?तिरंगा केवल एक कपड़ा या आयोजन का प्रतीक नहीं है। यह देश की संप्रभुता, एकता, स्वतंत्रता और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। ऐसे में तिरंगा यात्रा निकालने वाले आयोजकों और जिम्मेदार पदाधिकारियों की पहली जिम्मेदारी ही यह बनती है कि राष्ट्रीय ध्वज की मर्यादा और निर्धारित नियमों का पूरा पालन सुनिश्चित करें। खासकर तब, जब यात्रा का नेतृत्व वरिष्ठ राजनीतिक पदाधिकारी कर रहे हों और उसका प्रचार बड़े स्तर पर सोशल मीडिया के माध्यम से किया जा रहा हो।अब चर्चा का विषय यह भी है कि इस मामले में जिला भाजपा संगठन, तिरंगा यात्रा प्रभारी अथवा संबंधित जिम्मेदार पदाधिकारी क्या कोई जवाबदेही तय करेंगे? क्या इसे केवल मानवीय त्रुटि मानकर मामला समाप्त कर दिया जाएगा या आयोजकों को राष्ट्रीय ध्वज की मर्यादा के प्रति अधिक गंभीर रहने की नसीहत दी जाएगी?देशभक्ति का प्रदर्शन केवल नारों, यात्राओं और सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं, बल्कि राष्ट्रध्वज के सम्मान और उसकी मर्यादा के अक्षरशः पालन से भी साबित होता है। बालको की इस तिरंगा यात्रा ने इसी बुनियादी सवाल को सामने ला दिया है—तिरंगा यात्रा तो निकल गई, लेकिन क्या तिरंगे का सम्मान भी उतनी ही सजगता से निभाया गया?फिलहाल बालको क्षेत्र में यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग सवाल कर रहे हैं कि आखिर इतनी बड़ी तिरंगा यात्रा में उल्टे ध्वज पर किसी की नजर क्यों नहीं पड़ी और गलती सामने आने के बाद सोशल मीडिया से तस्वीरें हटाने की नौबत क्यों आई? अब देखना यह होगा कि संगठन इसे सामान्य भूल मानकर आगे बढ़ जाता है या राष्ट्रध्वज की गरिमा से जुड़े इस मामले में कोई जवाबदेही तय करता है।



