
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के इतिहास में नान (नागरिक आपूर्ति निगम) घोटाला केवल भ्रष्टाचार का एक मामला नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था, राजनीतिक इच्छाशक्ति, जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और न्यायिक जवाबदेही की सबसे बड़ी कसौटियों में से एक है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से गरीबों तक पहुंचने वाले चावल और खाद्यान्न की व्यवस्था में कथित भ्रष्टाचार के आरोपों ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। सवाल यह था कि जिस व्यवस्था का उद्देश्य गरीबों की भूख मिटाना था, उसी व्यवस्था में यदि भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो जाएं तो फिर गरीबों के अधिकारों की रक्षा कौन करेगा? लेकिन आज भी जनता का सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस बहुचर्चित घोटाले का अंतिम और निर्णायक हिसाब आखिर कब सामने आएगा?नान घोटाले ने एक समय छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल ला दिया था। तत्कालीन रमन सिंह सरकार के कार्यकाल में सामने आए इस मामले में नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारियों और अन्य लोगों पर भ्रष्टाचार, अवैध लेन-देन तथा खाद्यान्न खरीदी और वितरण व्यवस्था में अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगे। जांच के दौरान दस्तावेजों और कथित डायरी के अंशों को लेकर भी राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ। मामला केवल आर्थिक अनियमितता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें कथित संरक्षण, प्रभावशाली लोगों की भूमिका और जांच की निष्पक्षता को लेकर भी सवाल उठे। यही कारण है कि नान घोटाला आज भी छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक ऐसा अध्याय बना हुआ है, जिसे आसानी से भुलाया नहीं जा सकता।




