
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

बिलासपुर संभाग अंर्तगत गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले के मरवाही वन मंडल में हरियाली, पौधरोपण और वन विकास योजनाओं में कथित अनियमितताओं के आरोपों ने अब राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। करोड़ों रुपये की योजनाओं पर उठ रहे गंभीर प्रश्नों और लंबे समय से सामने आ रही शिकायतों के बावजूद वन मंत्री केदार कश्यप और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) अरुण कुमार पाण्डेय की ओर से अब तक कोई स्पष्ट सार्वजनिक जवाब या निर्णायक कार्रवाई सामने नहीं आने से विपक्ष, सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों के बीच अनेक सवाल उठ रहे हैं। यदि शिकायतें निराधार हैं तो उन्हें सार्वजनिक रूप से खारिज किया जाना चाहिए, और यदि उनमें तथ्य हैं तो दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसे में अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच की प्रक्रिया क्या सच्चाई उजागर करती है और जिम्मेदारी आखिर किस स्तर तक तय होती है।
मरवाही वन मंडल में वर्ष 2024-25 एवं 2025-26 के दौरान संचालित ग्रीन क्रेडिट योजना अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, छत्तीसगढ़ शासन ने प्राप्त शिकायत को गंभीरता से लेते हुए प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख को पूरे मामले की बिंदुवार जांच कर 30 दिनों के भीतर अभिमत सहित विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। शासन के इस आदेश के बाद वन विभाग के प्रशासनिक और मैदानी अमले में हलचल तेज हो गई है।
वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अवर सचिव डी.आर. चन्द्रवंशी द्वारा 3 अगस्त 2026 को जारी पत्र के अनुसार, गुलाब कमरो, पूर्व विधायक भरतपुर–सोनहत द्वारा 20 जुलाई 2026 को भेजी गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि मरवाही वन मंडल में ग्रीन क्रेडिट योजना के तहत वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितताएं हुई हैं। शिकायत के आधार पर शासन ने संबंधित बिंदुओं की जांच कराने का निर्णय लिया है।
शासन ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि शिकायत में वर्णित प्रत्येक बिंदु की निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा तथ्यों, दस्तावेजों और अभिमत सहित विस्तृत जांच प्रतिवेदन निर्धारित समय-सीमा में उपलब्ध कराया जाए। इससे यह संकेत मिलता है कि राज्य सरकार इस मामले को औपचारिक शिकायत मानकर गंभीर प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत देख रही है।
ग्रीन क्रेडिट योजना का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण और हरित क्षेत्र का विस्तार है। यदि इस योजना के क्रियान्वयन में कहीं भी वित्तीय या प्रशासनिक अनियमितता हुई है, तो उसका प्रभाव केवल सरकारी धन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण उद्देश्य पर भी प्रश्नचिह्न लगेगा। इसलिए इस जांच को वन विभाग के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा माना जा रहा है।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच दल किन तथ्यों तक पहुंचता है, शिकायत में लगाए गए आरोप कितने प्रमाणित होते हैं और यदि किसी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है तो जिम्मेदार अधिकारियों या कर्मचारियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की जाती है।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि वर्तमान में शासन ने केवल शिकायत के आधार पर जांच के निर्देश जारी किए हैं। किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी अथवा दोष अभी जांच पूरी होने तक सिद्ध नहीं माना जा सकता। जांच प्रतिवेदन आने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।



