तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी


छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में 6 अगस्त 2026 को जारी करीब 122 पृष्ठों की स्थानांतरण सूची अब खुद विभागीय पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रही है। अवर सचिव आर.पी. वर्मा के हस्ताक्षर से जारी इस आदेश में लगभग 500 शिक्षक एवं व्याख्याताओं के स्थानांतरण किए गए हैं। आदेश को प्रशासनिक आधार पर जारी बताया गया है और इसके लिए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के अनुमोदन का हवाला दिया जा रहा है। लेकिन इसी आदेश की प्रक्रिया और सूची में शामिल नामों को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं।सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि यह वास्तव में प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर किया गया स्थानांतरण है, तो करीब 70 प्रतिशत शिक्षक-व्याख्याताओं को जिला शिक्षा अधिकारी के विकल्प पर स्थानांतरित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? जब किसी पद पर रिक्ति अथवा वास्तविक प्रशासनिक आवश्यकता का स्पष्ट आधार नहीं था, तब इतनी बड़ी संख्या में कर्मचारियों को DEO के विकल्प पर स्थानांतरित करने का औचित्य क्या है?
मुख्यमंत्री सचिवालय की अनुशंसाएं भी सूची से बाहर?मामले को और गंभीर बनाने वाली बात यह सामने आ रही है कि मुख्यमंत्री सचिवालय के सचिवों द्वारा अनुशंसित कुछ शिक्षक एवं व्याख्याताओं के नाम भी 6 अगस्त की 122 पृष्ठों वाली स्थानांतरण सूची में शामिल नहीं किए गए। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि मुख्यमंत्री सचिवालय से भेजी गई अनुशंसाओं का स्कूल शिक्षा विभाग में आखिर क्या हुआ?
यदि मुख्यमंत्री सचिवालय से किसी शिक्षक या व्याख्याता के संबंध में अनुशंसा भेजी गई थी और वह नाम अंतिम स्थानांतरण सूची में शामिल नहीं हुआ, तो क्या उस अनुशंसा पर विचार किया गया? यदि नहीं किया गया, तो उसका कारण क्या था? और यदि विचार किया गया तो उसे अस्वीकार करने का आधार क्या रहा?मुख्यमंत्री के अनुमोदन पर भी उठ रहे सवाल स्थानांतरण आदेश को मुख्यमंत्री के अनुमोदन से जारी होना बताया जा रहा है। ऐसे में पूरी प्रक्रिया की जवाबदेही सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय और स्कूल शिक्षा विभाग दोनों से जुड़ जाती है।
क्योंकि यदि मुख्यमंत्री स्तर पर अनुमोदन हुआ है तो क्या अनुमोदन के समय पूरी सूची, स्थानांतरण के आधार, पदों की वास्तविक स्थिति और DEO के विकल्प पर किए जा रहे स्थानांतरण का पूरा विवरण प्रस्तुत किया गया था?और यदि मुख्यमंत्री सचिवालय के स्तर से अनुशंसित नामों को अंतिम सूची में स्थान नहीं मिला, तो क्या मुख्यमंत्री सचिवालय को इसकी जानकारी थी?
प्रशासनिक स्थानांतरण या विकल्प आधारित व्यवस्था?स्थानांतरण को प्रशासनिक आधार बताकर जारी करना अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं है। लेकिन जब बड़ी संख्या में कर्मचारियों को उनके मूल विकल्प के बजाय जिला शिक्षा अधिकारी के विकल्प पर स्थानांतरित किया जाता है और दूसरी ओर कथित रूप से अनुशंसित नाम सूची से बाहर रह जाते हैं, तब पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है।यही वजह है कि अब इस स्थानांतरण प्रक्रिया को लेकर लेन-देन की आशंका तक जताई जा रही है। हालांकि इस संबंध में किसी भी प्रकार के आर्थिक लेन-देन की पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं हुई है, इसलिए इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री तक पहुंची शिकायत मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी शिकायत मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह तक पहुंचाई गई है। अब निगाह इस बात पर है कि मुख्यमंत्री सचिवालय इस पूरे मामले की जांच के लिए क्या कदम उठाता है।
यदि स्थानांतरण वास्तव में पूरी तरह प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर किए गए हैं तो विभाग को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि—किस जिले में कितने पद रिक्त थे?
कितने पदों पर प्रशासनिक आवश्यकता के कारण स्थानांतरण किया गया?कितने कर्मचारियों को DEO के विकल्प पर भेजा गया?DEO के विकल्प निर्धारित करने का मापदंड क्या था?मुख्यमंत्री सचिवालय से प्राप्त अनुशंसाओं पर क्या निर्णय लिया गया?और पूरी सूची तैयार करने में कौन-कौन से अधिकारी शामिल रहे?इन सवालों के जवाब सामने आने से ही स्थानांतरण प्रक्रिया की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
122 पन्नों की सूची ने बढ़ाई पारदर्शिता की परीक्षाकरीब 500 शिक्षक-व्याख्याताओं से जुड़ा 122 पृष्ठों का स्थानांतरण आदेश कोई सामान्य प्रशासनिक आदेश नहीं है। इतनी बड़ी संख्या में स्थानांतरण होने पर विभाग से अपेक्षा रहती है कि हर नाम के पीछे स्पष्ट प्रशासनिक कारण और पारदर्शी मापदंड दिखाई दे।लेकिन यदि एक ओर मुख्यमंत्री सचिवालय की अनुशंसाएं कथित तौर पर सूची में जगह नहीं बना पातीं और दूसरी ओर बड़ी संख्या में स्थानांतरण DEO के विकल्प पर किए जाते हैं, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इस तबादला नीति की वास्तविक कसौटी क्या रही?
अब गेंद मुख्यमंत्री सचिवालय और स्कूल शिक्षा विभाग के पाले में है। यदि प्रक्रिया पारदर्शी है तो दस्तावेजों और पदों की स्थिति के साथ पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक करने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। और यदि कहीं नियमों से हटकर निर्णय हुआ है तो जिम्मेदारी तय होना भी जरूरी है।क्योंकि सवाल सिर्फ 500 शिक्षक-व्याख्याताओं के तबादले का नहीं है—सवाल यह है कि मुख्यमंत्री के अनुमोदन के नाम पर हुई इस पूरी प्रक्रिया में प्रशासनिक जरूरत भारी पड़ी या किसी और व्यवस्था ने?




