
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के वन विभाग में भ्रष्टाचार के आरोपों और विभागीय कार्रवाई को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिस अधिकारी के विरुद्ध करोड़ों रुपये के कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर शिकायतें तथा आरोप सामने आए, उसके खिलाफ ठोस कार्रवाई होने के बजाय मामला नस्तीबद्ध किए जाने और अब उसी अधिकारी को उप वन मंडलाधिकारी की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपे जाने की चर्चा ने विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध गंभीर वित्तीय अनियमितताओं और करोड़ों रुपये के कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की शिकायत सामने आती है तो उसकी निष्पक्ष जांच कराकर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के बजाय मामला आखिर किस आधार पर नस्तीबद्ध कर दिया गया? और यदि आरोप निराधार पाए गए हैं तो क्या विभाग ने इसकी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की है? वहीं यदि जांच पूरी तरह से निष्पक्ष और आरोपों से अधिकारी को क्लीनचिट मिली है, तो उस जांच की प्रक्रिया और निष्कर्षों को सामने लाने में विभाग को आखिर आपत्ति क्या है?मामले का दूसरा पहलू इससे भी ज्यादा गंभीर है। जिस अधिकारी पर गंभीर आरोप लगे हों, उसके विरुद्ध कार्रवाई की अपेक्षा के बीच उसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी मिलना स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन गया है। विभागीय गलियारों में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या आरोपों का सामना कर रहे अधिकारी के लिए विभागीय जिम्मेदारी कोई बाधा नहीं है?सरकार लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति की बात करती रही है। ऐसे में वन विभाग से जुड़े इस प्रकरण में पारदर्शिता और जवाबदेही और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी भी अधिकारी को केवल आरोप लगने के आधार पर दोषी नहीं माना जा सकता, लेकिन उसी तरह गंभीर आरोपों को केवल फाइल बंद कर नस्तीबद्ध कर देना भी जनविश्वास के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। जरूरत इस बात की है कि आरोपों की जांच किस स्तर पर हुई, किन बिंदुओं पर हुई, जांच में क्या तथ्य सामने आए और मामला नस्तीबद्ध करने का आधार क्या था—इन सभी सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आए।अब सवाल कार्रवाई का ही नहीं, प्रक्रिया की पारदर्शिता का भी है। अगर अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोप गलत थे तो विभाग को सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए कि जांच में आरोप क्यों खारिज हुए। और यदि आरोपों की जांच अधूरी रही है, तो फिर मामले को नस्तीबद्ध करने की जल्दबाजी क्यों की गई?वहीं उप वन मंडलाधिकारी जैसी जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा की आवश्यकता और बढ़ गई है। क्योंकि प्रशासनिक व्यवस्था में पद और जिम्मेदारी केवल अधिकार नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही भी होती है।अब निगाहें वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और शासन पर हैं कि वे इस मामले में नस्तीबद्ध प्रकरण की फाइल दोबारा खुलवाकर स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराएंगे या फिर करोड़ों के आरोपों के बीच अधिकारी को मिली नई जिम्मेदारी ही अंतिम जवाब मानी जाएगी।सवाल सीधा है—आरोप गंभीर थे तो जांच का परिणाम क्या था, और आरोप गलत थे तो उसका प्रमाण कहां है?




