
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ भाजपा में हुए ताजा संगठनात्मक फेरबदल के बाद प्रदेश की राजनीति में एक पुराना और बेहद चर्चित ‘1500 करोड़’ का मामला एक बार फिर सोशल मीडिया की बहस के केंद्र में आ गया है। भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री रहे पवन साय को झारखंड भेजे जाने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की प्रतिक्रिया को लेकर सोशल मीडिया पर एक वीडियो और पोस्ट तेजी से वायरल हो रहे हैं। वायरल पोस्ट में भूपेश बघेल के हवाले से सवाल उछाला गया है—“अब 1500 करोड़ का क्या होगा?” 24 सितंबर 2026 को भाजपा ने संगठनात्मक फेरबदल करते हुए पवन साय को छत्तीसगढ़ से झारखंड का प्रदेश महामंत्री (संगठन) नियुक्त किया, जबकि झारखंड में यह जिम्मेदारी संभाल रहे कर्मवीर सिंह को छत्तीसगढ़ भेजा गया। यह बदलाव भाजपा के केंद्रीय संगठन स्तर पर किया गया है। उपलब्ध रिपोर्टों में पवन साय को हटाए जाने के आधिकारिक कारण के रूप में 1500 करोड़ के मामले का उल्लेख नहीं है। लेकिन सवाल 1500 करोड़ का ही क्यों?दरअसल, दिसंबर 2025 में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें छत्तीसगढ़ भाजपा के शीर्ष नेताओं से जुड़े 1500 करोड़ रुपये के कथित कलेक्शन/वसूली का दावा किया गया था। इस वीडियो को लेकर भाजपा विधायक पुरंदर मिश्रा ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, नितिन नबीन, अरुण साव, विजय शर्मा, ओपी चौधरी, अजय जामवाल, किरणदेव और पवन साय समेत कई नेताओं की छवि खराब करने का आरोप लगाया गया था। भाजपा ने वीडियो को फर्जी बताया था। मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। मार्च 2026 में पुलिस जांच को लेकर प्रकाशित रिपोर्टों में दावा किया गया कि वायरल वीडियो AI/डीपफेक तकनीक से तैयार किया गया था और इस मामले में गिरफ्तारियां भी हुईं। जांच से संबंधित रिपोर्टों में पुलिस की ओर से NSUI के एक पदाधिकारी को कथित मास्टरमाइंड बताए जाने का उल्लेख है। फिर उठ रहा है सबसे बड़ा सवाल—1500 करोड़ आखिर था कहां?यही वह बिंदु है, जिसने अब इस पूरे प्रकरण को फिर राजनीतिक चर्चा में ला दिया है।यदि वायरल वीडियो में लगाया गया 1500 करोड़ रुपये का दावा पूरी तरह फर्जी था, तो जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि इस रकम का उल्लेख करने वाला कथित फर्जी कंटेंट किस आधार पर तैयार किया गया, उसमें इतने बड़े आर्थिक आंकड़े का इस्तेमाल क्यों किया गया और इसके पीछे वास्तविक उद्देश्य क्या था?दूसरी तरफ, यदि किसी स्तर पर 1500 करोड़ रुपये के वास्तविक आर्थिक लेन-देन या कथित कलेक्शन से संबंधित कोई तथ्य है, तो उसका स्रोत, प्राप्तकर्ता, लेन-देन का माध्यम और उपयोग भी जांच का विषय होना चाहिए।पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मार्च 2026 में भी पुलिस की जांच पर सवाल उठाते हुए पूछा था कि 1500 करोड़ रुपये की कथित वसूली किसके कहने पर हो रही थी, कौन कर रहा था और पैसा कहां गया। यानी आज की बहस केवल यह नहीं है कि वीडियो असली था या AI से बनाया गया था। असली सवाल यह भी है कि 1500 करोड़ का आंकड़ा आया कहां से?पवन साय का तबादला और 1500 करोड़ की चर्चा—क्या संबंध है?यहां सबसे जरूरी सावधानी यह है कि पवन साय को झारखंड भेजे जाने और 1500 करोड़ के पुराने मामले के बीच कोई आधिकारिक संबंध सामने नहीं आया है। उपलब्ध रिपोर्टों में भाजपा के संगठनात्मक फेरबदल की जानकारी तो स्पष्ट है, लेकिन यह नहीं बताया गया कि पवन साय को छत्तीसगढ़ से हटाने का कारण 1500 करोड़ वाला विवाद था। इसलिए सोशल मीडिया पर चल रहे दावे को फिलहाल राजनीतिक सवाल और आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए, स्थापित तथ्य के रूप में नहीं।सोशल मीडिया ने फिर पूछ दिया वही सवालअब कांग्रेस की ओर से भी इस मामले की स्वतंत्र जांच की मांग उठ रही है। 25 सितंबर 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि यदि वायरल वीडियो फर्जी है तो उसकी सच्चाई जांच से सामने आनी चाहिए और कथित 1500 करोड़ के मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। ऐसे में तस्वीर का एक दिलचस्प पहलू यह है कि एक तरफ पुलिस जांच में वायरल वीडियो को डीपफेक बताया गया है, दूसरी तरफ राजनीतिक सवाल अभी भी यह पूछ रहा है कि 1500 करोड़ की कहानी का आधार क्या था।और यही सवाल अब सोशल मीडिया से निकलकर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है—1500 करोड़ का दावा अगर फर्जी था, तो इसकी पूरी कहानी और रकम का आंकड़ा आया कहां से?और यदि दावा निराधार था, तो इसकी सच्चाई सामने लाने वाली जांच की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं होती?फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों से इतना स्पष्ट है कि पवन साय को झारखंड भेजने का निर्णय 24 सितंबर 2026 को भाजपा के संगठनात्मक फेरबदल के तहत हुआ है, जबकि 1500 करोड़ वाला विवाद दिसंबर 2025 से चला आ रहा है। दोनों घटनाओं को जोड़ने वाला कोई आधिकारिक दस्तावेज या बयान सामने नहीं आया है। यही वजह है कि मामला अब केवल ‘पवन साय को कहां भेजा गया’ का नहीं रह गया है—बल्कि सवाल यह बन गया है कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में बार-बार सामने आए उस चर्चित ‘1500 करोड़’ के दावे की अंतिम और प्रमाणित सच्चाई आखिर क्या है?




