
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा महाराष्ट्र के प्रदर्शनकारी कला विभाग के वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर एवं प्रख्यात नाटककार, नाट्य निर्देशक, नाट्य समीक्षक तथा नाट्य प्रशिक्षक डॉ. सतीश पावड़े को साहित्य विद्या में उच्चतम शोध उपाधि डि.लिट. (विद्यावाचस्पति) प्रदान करने की घोषणा की गई है। राजकुमारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ (छत्तीसगढ़) के कला संकाय द्वारा यह घोषणा की गई है। डॉ. पावड़े विगत चार वर्षों से इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में “नाट्यशास्त्र का समाजशास्त्रीय अध्ययन एवं विश्लेषण” विषय पर शोधकार्य कर रहे थे। उनके शोध का केंद्र भारतीय नाट्यपरंपरा, नाट्यशास्त्र तथा उसके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों का अध्ययन एवं विश्लेषण रहा है।
डॉ. सतीश पावड़े देश के जाने-माने नाटककार, रंगकर्मी, नाट्यचिंतक एवं समीक्षक हैं। उन्हें भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की रवीन्द्रनाथ टैगोर रिसर्च फेलोशिप तथा संगीत नाटक अकादमी की शोध परियोजना स्कॉलरशिप प्राप्त हो चुकी है। उन्होंने देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं शैक्षणिक संस्थानों के अतिरिक्त कनाडा और श्रीलंका में भी नाट्यशास्त्र विषय पर व्याख्यान दिए हैं। नाट्यलेखन, नाट्य आलोचना, चरित्र-लेखन, संपादन, अनुवाद एवं रूपांतरण की उनकी 28 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे पूर्व में महाराष्ट्र राज्य के नाटक सेंसर बोर्ड के तीन बार सदस्य तथा राज्य शासन के ही मराठी विश्वकोश नाट्यज्ञानमंडल के दो बार सलाहकार एवं सदस्य भी रहे हैं। वर्तमान में डॉ. पावड़े श्रीलंका की प्लेटो अकादेमी ऑफ परफार्मिंग आर्ट्स तथा टाइम्स इंटरनेशनल अकादमी फॉर ग्रैजुएट स्टडीज के वरिष्ठ अकादमिक सलाहकार के रूप में कार्य कर रहे हैं। साथ ही वे संगीतसूर्य केशवराव भोसले सांस्कृतिक परिषद, भारत गणराज्य के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में भी दायित्व निभा रहे हैं। उन्हें राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। उनका “नाट्यशास्त्र: परंपरा, प्रयोग आणि विमर्श” यह समीक्षा ग्रंथ का प्रकाशन अगले माह में अनामिका प्रकाशन, प्रयागराज कर रहा है ।
विशेष उल्लेखनीय है कि डॉ. सतीश पावड़े ने इससे पूर्व नागपुर विश्वविद्यालय से नाट्यकला विषय में ललित कला संकाय में प्रदर्शनकारी कला (नाट्यकला) की महाराष्ट्र की पहली शोध उपाधि (1996) प्राप्त की थी। डि.लिट. की प्रस्तावित उपाधि उनके दीर्घकालीन नाट्य-अध्ययन, शोध, लेखन एवं अकादमिक योगदान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।



