
विकास नंद/सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति में हरेली तिहार का विशेष स्थान है। सावन माह की अमावस्या, जिसे हरियाली अमावस्या भी कहा जाता है, के अवसर पर मनाया जाने वाला यह पर्व छत्तीसगढ़ के कृषि जीवन, प्रकृति प्रेम, पशुधन के प्रति कृतज्ञता और समृद्ध लोक परंपराओं का प्रतीक है। हरेली को छत्तीसगढ़ का पहला और प्रमुख लोक-पर्व माना जाता है, जिससे राज्य के पारंपरिक तिहारों की श्रृंखला प्रारंभ होती है।
छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में पर्व-त्योहार केवल उल्लास और मनोरंजन के अवसर नहीं हैं, बल्कि वे प्रकृति, कृषि और सामाजिक जीवन के साथ गहरे संबंध को भी अभिव्यक्त करते हैं। हरेली में चारों ओर दिखाई देने वाली हरियाली के साथ छत्तीसगढ़ की माटी की खुशबू, ग्रामीण जीवन की सहजता और लोक परंपराओं की जीवंतता देखने को मिलती है। हरेली, भोजली, जँवारा और बसंत पंचमी जैसे पर्वों में प्रकृति के सौंदर्य और मानव जीवन के बीच गहरे रिश्ते की झलक मिलती है।हरियाली और कृषि समृद्धि का उत्सव‘हरेली’ शब्द ‘हरियाली’ से बना है। सावन में जब खेत-खलिहान हरी फसलों से लहलहाने लगते हैं और चारों ओर हरियाली छा जाती है, तब किसान प्रकृति और कृषि के प्रति आभार व्यक्त करते हुए हरेली तिहार मनाते हैं।
यह पर्व किसानों के लिए नई ऊर्जा, उमंग और कृषि कार्यों की सफलता का प्रतीक है।
हरेली के अवसर पर किसान अपने कृषि उपकरणों की साफ-सफाई कर उनकी विधिवत पूजा करते हैं। हल, फावड़ा, कुदाल, कुदाली, बसुला, हथौड़ी, आरी, खुर्पी सहित खेती-किसानी और दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले विभिन्न औजारों को धोकर स्वच्छ किया जाता है। उन्हें चावल के आटे से हाथा लगाकर चंदन, फूल, धूप-दीप, पारंपरिक पकवान और श्रीफल अर्पित किए जाते हैं। इसके पीछे भाव यह है कि कृषि कार्य में सहयोग देने वाले औजारों के प्रति भी सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त की जाए।
पशुधन के प्रति कृतज्ञता का संदेश
हरेली तिहार में गाय और बैलों की विशेष सेवा और पूजा की जाती है। छत्तीसगढ़ की कृषि व्यवस्था में बैल लंबे समय से किसानों के सच्चे साथी रहे हैं। जुताई, ढुलाई और कृषि कार्यों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसलिए हरेली पर उन्हें नहलाकर, सजाकर और आरती उतारकर पारंपरिक रूप से ‘गहूंता’ खिलाया जाता है।ग्रामीण अंचलों में औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार पारंपरिक मिश्रण भी पशुओं को खिलाने की परंपरा रही है। नीम, अरण्ड और खम्हार जैसे वनस्पतियों के औषधीय उपयोग की लोक-मान्यता भी इस परंपरा से जुड़ी हुई है। इस प्रकार हरेली पशुधन के स्वास्थ्य और संरक्षण के प्रति ग्रामीण समाज की जागरूकता को भी दर्शाती है।
गेड़ी और पारंपरिक खेलों का उत्साह
हरेली तिहार की सबसे आकर्षक परंपराओं में गेड़ी चढ़ना प्रमुख है। बांस से तैयार गेड़ी पर बच्चे, युवा और ग्रामीणजन उत्साहपूर्वक चलते और दौड़ते हैं। वर्षा ऋतु में कीचड़ और पानी से भरे रास्तों पर चलने की आवश्यकता से जुड़ी यह परंपरा कालांतर में मनोरंजक लोक-खेल का रूप ले चुकी है।हरेली के अवसर पर गेड़ी दौड़, नारियल फेंक, खो-खो, फुगड़ी, बिल्लस, अत्ती-पत्ती, डंडा-पचरंगा जैसे पारंपरिक खेलों का आयोजन भी ग्रामीण अंचलों में किया जाता रहा है। गांव के चौक-चौराहे, गौठान और स्कूल मैदान इन खेलों और सामूहिक उत्सव के केंद्र बन जाते हैं। रंग-बिरंगे परिधानों में सजे ग्रामीणों की भागीदारी हरेली के उत्साह को और बढ़ा देती है।
नीम की पत्तियों से जुड़ी लोक-मान्यताएं
हरेली से अनेक पारंपरिक मान्यताएं भी जुड़ी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में घरों के मुख्य द्वार पर नीम की पत्तियां और शाखाएं लगाने की परंपरा रही है। कहीं-कहीं लोहार द्वारा चौखट पर लोहे की कीलें लगाने की भी लोक-मान्यता है। इसे घर को रोगों और नकारात्मक शक्तियों से बचाने से जोड़ा जाता है। नीम के औषधीय गुणों के कारण भी ग्रामीण जीवन में इसका विशेष महत्व रहा है।
पारंपरिक व्यंजनों की मिठास
हरेली तिहार पर छत्तीसगढ़ी पारंपरिक व्यंजनों की भी विशेष धूम रहती है। गुड़हा चीला, अईरसा, चौसेला, बोबरा, गुलगुला भजिया, सोहारी, बड़ा, ठेठरी और खुरमी जैसे पकवान बनाए जाते हैं। इन व्यंजनों का भोग कृषि उपकरणों और पशुधन को लगाने के साथ परिवार और पड़ोसियों के बीच बांटकर पर्व की खुशियां साझा की जाती हैं।
प्रकृति और लोक जीवन के अटूट रिश्ते का पर्व
हरेली तिहार का महत्व केवल एक लोक-अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह पर्व मनुष्य, प्रकृति, कृषि और पशुधन के बीच अटूट संबंध का संदेश देता है। किसान जिस मिट्टी से अन्न पैदा करता है, जिस प्रकृति से वर्षा और हरियाली प्राप्त होती है और जिन पशुओं के सहयोग से कृषि कार्य आगे बढ़ता है, हरेली उन सभी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है।आज जब आधुनिकता और भौतिक जीवनशैली के कारण पारंपरिक खेल और लोक परंपराएं धीरे-धीरे पीछे छूट रही हैं, ऐसे समय में हरेली जैसे पर्व इन परंपराओं को नई पीढ़ी से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनते हैं। सार्वजनिक अवकाश और पारंपरिक खेलों को प्रोत्साहन मिलने से इस लोक-सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और आगे बढ़ाने के प्रयासों को भी बल मिला है।
हरेली का हरापन केवल खेतों और जंगलों तक सीमित न रहे, बल्कि छत्तीसगढ़ के लोक जीवन, संस्कारों और नई पीढ़ी के जीवन में भी निरंतर बना रहे—यही इस पर्व की सबसे सुंदर कामना है। माटी की सोंधी खुशबू, लोकगीतों की मिठास और पारंपरिक खेलों की उमंग के साथ हरेली तिहार छत्तीसगढ़ की उस जीवंत संस्कृति का प्रतीक है, जिसमें प्रकृति के प्रति सम्मान, श्रम के प्रति गौरव और लोक परंपराओं के प्रति गहरा जुड़ाव समाहित है।




