
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के साथ जनता को उम्मीद थी कि भ्रष्टाचार, घोटालों, अनियमितताओं और कथित फर्जीवाड़े पर प्रभावी अंकुश लगेगा। भाजपा की विष्णु देव साय सरकार से लोगों को अपेक्षा थी कि वह पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में उठे विवादों से सबक लेकर पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन की नई मिसाल पेश करेगी। लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में सरकार के कामकाज, विभिन्न विभागों की कार्यप्रणाली और कुछ मंत्रियों, उनके रिश्तेदारों तथा विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारियों (ओएसडी) को लेकर सामने आने वाले आरोपों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। दूसरी ओर, इन मुद्दों को लेकर कांग्रेस जिस आक्रामकता और निरंतरता के साथ सरकार को घेर सकती थी, वैसा प्रभावी विपक्षी तेवर जमीन पर दिखाई नहीं देने की चर्चा भी राजनीतिक हलकों में हो रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सत्ता बदलने के बाद भी व्यवस्था की कार्यशैली में अपेक्षित बदलाव नहीं आया, या फिर सरकार और विपक्ष दोनों ही जनता की उम्मीदों पर खरे उतरने में पीछे रह रहे हैं?छत्तीसगढ़ में भाजपा की सत्ता वापसी केवल सरकार बदलने की घटना नहीं थी, बल्कि यह जनता की उन अपेक्षाओं का परिणाम भी थी, जिनमें बेहतर प्रशासन, भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई और सरकारी तंत्र में पारदर्शिता की मांग प्रमुख थी। चुनाव के दौरान राजनीतिक दल एक-दूसरे के शासनकाल को लेकर गंभीर सवाल उठाते हैं और जनता के सामने बेहतर व्यवस्था का भरोसा रखते हैं। ऐसे में सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वह अपने वादों को प्रशासनिक निर्णयों और ठोस कार्रवाई के माध्यम से साबित करे। यदि किसी विभाग में अनियमितता की शिकायत सामने आती है, किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि पर आरोप लगता है अथवा किसी सरकारी निर्णय को लेकर संदेह पैदा होता है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करना सरकार की जिम्मेदारी है। केवल आरोपों को राजनीतिक विरोध बताकर खारिज कर देना या जांच की प्रक्रिया को लंबित छोड़ देना सुशासन की कसौटी पर पर्याप्त नहीं माना जा सकता।सवाल यह है कि क्या भाजपा सरकार भी उसी राजनीतिक कार्यशैली की ओर बढ़ रही है, जिसकी आलोचना करते हुए उसने सत्ता हासिल की थी? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार की विश्वसनीयता उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसके फैसलों, प्रशासनिक अनुशासन और कार्रवाई के परिणामों से तय होती है। कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार और कथित घोटालों को लेकर भाजपा ने लगातार सवाल उठाए थे। भाजपा का आरोप रहा कि तत्कालीन सरकार में व्यवस्था की पारदर्शिता प्रभावित हुई और कई मामलों में जवाबदेही का अभाव रहा। अब जब सत्ता की बागडोर भाजपा के हाथों में है, तो जनता स्वाभाविक रूप से यह जानना चाहती है कि उन आरोपों से सबक लेकर शासन व्यवस्था में कितना सुधार हुआ है। यदि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में भी भ्रष्टाचार, कथित फर्जीवाड़े, अनियमितताओं और प्रभावशाली लोगों के हस्तक्षेप से संबंधित शिकायतें सामने आती हैं, तो उनका निष्पक्ष परीक्षण होना चाहिए। हालांकि, आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति या सरकार को दोषी ठहराना उचित नहीं है; अंतिम निष्कर्ष जांच, दस्तावेजों और स्थापित तथ्यों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है, जब आरोप सत्ता के आसपास सक्रिय लोगों या प्रभावशाली पदों पर बैठे व्यक्तियों से संबंधित हों। राजनीतिक गलियारों में कुछ मंत्रियों, उनके रिश्तेदारों और ओएसडी को लेकर आरोपों तथा चर्चाओं का जिक्र किया जाता रहा है। ऐसे मामलों में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि कौन-सा आरोप किस व्यक्ति पर लगा है, उसका आधार क्या है, संबंधित पक्ष का क्या जवाब है और जांच की स्थिति क्या है। बिना पुष्ट तथ्यों के किसी को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा, लेकिन आरोपों को केवल इसलिए नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता कि उनका संबंध सत्तापक्ष के किसी प्रभावशाली व्यक्ति से है। यदि किसी शिकायत में प्रथम दृष्टया तथ्य दिखाई देते हैं, तो निष्पक्ष जांच और नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि आरोप निराधार साबित होते हैं, तो संबंधित व्यक्ति को भी स्पष्ट रूप से दोषमुक्त होने का अवसर मिलना चाहिए। यही लोकतांत्रिक शासन और कानून के राज की वास्तविक कसौटी है।यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है कि क्या सरकार के भीतर जवाबदेही की व्यवस्था उतनी ही मजबूत है, जितनी मजबूत होने का दावा सार्वजनिक मंचों से किया जाता है? किसी भी राज्य में मंत्रियों की राजनीतिक जिम्मेदारी, अधिकारियों की प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी शासन व्यवस्था के बुनियादी अंग हैं। यदि किसी विभाग में लगातार शिकायतें सामने आती हैं, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर प्रश्न उठते हैं या नियुक्तियों, तबादलों, खरीदी और ठेकों को लेकर अनियमितताओं की आशंका जताई जाती है, तो सरकार को तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। जनता को यह भरोसा मिलना चाहिए कि नियम सभी के लिए समान हैं और किसी व्यक्ति का राजनीतिक रसूख उसे जवाबदेही से बचाने का माध्यम नहीं बन सकता। सुशासन का अर्थ केवल योजनाओं की घोषणा करना नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन में ईमानदारी और पारदर्शिता सुनिश्चित करना भी है।भ्रष्टाचार के आरोपों पर सरकार की चुप्पी और कार्रवाई के बीच का अंतर भी राजनीतिक संदेश देता है। यदि किसी मामले में जांच की घोषणा होती है, लेकिन लंबे समय तक परिणाम सामने नहीं आते, तो जनता के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। इसी तरह, यदि किसी शिकायत पर तत्काल कार्रवाई की जाती है, जबकि दूसरी समान प्रकृति की शिकायत लंबित रहती है, तो निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ सकते हैं। इसलिए सरकार को आरोपों की गंभीरता के अनुरूप समयबद्ध जांच, कार्रवाई की स्थिति की सार्वजनिक जानकारी और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कदम उठाने की व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए। इससे न केवल जनता का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों का मनोबल भी मजबूत होगा।दूसरी तरफ, कांग्रेस की भूमिका भी कम सवालों के घेरे में नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष केवल चुनाव लड़ने और सत्ता पक्ष की आलोचना करने वाली संस्था नहीं होता, बल्कि वह सरकार की नीतियों, फैसलों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली की निगरानी करने वाला महत्वपूर्ण स्तंभ है। जनता विपक्ष से अपेक्षा करती है कि वह सरकारी कामकाज पर नजर रखे, गड़बड़ियों की पड़ताल करे, दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर सवाल उठाए तथा जरूरत पड़ने पर विधानसभा से लेकर जनमंच तक मुद्दों को मजबूती से उठाए। लेकिन यदि विपक्ष केवल बयानबाजी, आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं तक सीमित रह जाता है, तो उसका प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के सामने भी यही चुनौती है कि वह अपनी राजनीतिक उपस्थिति को प्रभावी जनहित की राजनीति में बदले।कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार को घेरने के लिए प्रशासनिक निर्णयों, विभागीय शिकायतों, सरकारी खर्च, योजनाओं के क्रियान्वयन और कथित अनियमितताओं जैसे अनेक संभावित मुद्दे मौजूद हों, तब विपक्ष जनता के बीच अपनी प्रभावी भूमिका कैसे स्थापित करे? क्या कांग्रेस के पास सरकार से जवाब मांगने के लिए ठोस दस्तावेजों पर आधारित रणनीति है? क्या पार्टी के नेता अलग-अलग मुद्दों पर समन्वित ढंग से काम कर रहे हैं? क्या विधानसभा में उठाए गए सवालों को जनता तक पहुंचाया जा रहा है? और क्या कथित भ्रष्टाचार या अनियमितता के मामलों में पार्टी केवल राजनीतिक आरोप लगा रही है, अथवा संबंधित तथ्यों की स्वतंत्र पड़ताल कर सरकार से जवाबदेही भी सुनिश्चित कर रही है? इन सवालों के जवाब कांग्रेस के राजनीतिक भविष्य और विपक्ष के रूप में उसकी विश्वसनीयता, दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।विपक्ष की कमजोरी का सीधा लाभ सत्तापक्ष को मिल सकता है। जब सरकार के सामने मजबूत और तथ्यपरक सवाल उठाने वाला विपक्ष नहीं होता, तब प्रशासनिक जवाबदेही पर दबाव कम होने की आशंका रहती है। हालांकि, किसी भी सरकार की जवाबदेही केवल विपक्ष की सक्रियता पर निर्भर नहीं करती। संवैधानिक संस्थाएं, जांच एजेंसियां, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फिर भी, एक सक्रिय विपक्ष सरकार को समय-समय पर उसके वादों और फैसलों की याद दिलाता है। वह उन मुद्दों को सामने लाता है, जिन्हें प्रशासनिक तंत्र या राजनीतिक नेतृत्व प्राथमिकता नहीं देना चाहता। इस दृष्टि से कांग्रेस की निष्क्रियता या बिखरी हुई रणनीति केवल पार्टी की समस्या नहीं, बल्कि राज्य की लोकतांत्रिक राजनीति के लिए भी चिंता का विषय बन सकती है।भाजपा और कांग्रेस, दोनों के लिए आत्ममंथन का समय है। भाजपा सरकार को यह साबित करना होगा कि वह पूर्ववर्ती सरकार की आलोचना करने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वयं अधिक पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन देने की क्षमता भी रखती है। वहीं कांग्रेस को यह दिखाना होगा कि विपक्ष में रहने के बावजूद वह जनहित के मुद्दों पर गंभीर, संगठित और तथ्यपरक संघर्ष कर सकती है। यदि सरकार पर लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं होती और विपक्ष उन मामलों को मजबूती से नहीं उठाता, तो राजनीतिक लाभ भले ही किसी पक्ष को मिल जाए, नुकसान अंततः जनता का होगा। सरकारी योजनाओं के लिए खर्च होने वाला पैसा जनता का है, सरकारी पद जनता की सेवा के लिए हैं और सत्ता जनता के विश्वास से प्राप्त होती है। इसलिए इन सभी के संचालन में जवाबदेही सर्वोपरि होनी चाहिए।यह भी ध्यान देने योग्य है कि भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपों पर राजनीति करना आसान है, लेकिन उन्हें प्रमाणों के आधार पर स्थापित करना और व्यवस्था में सुधार लाना कठिन काम है। केवल आरोप लगाने से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होता और केवल कार्रवाई की घोषणा करने से सुशासन स्थापित नहीं हो जाता। इसके लिए पारदर्शी निविदा प्रक्रिया, सरकारी खरीद की निगरानी, नियुक्तियों और तबादलों में नियमों का पालन, शिकायतों का समयबद्ध निराकरण तथा जांच के परिणामों को सार्वजनिक करने जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना आवश्यक है। साथ ही, सरकारी कामकाज में डिजिटल निगरानी, स्वतंत्र ऑडिट और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी सुनिश्चित करनी होगी। यदि सरकार इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करती है, तो राजनीतिक आरोपों के बीच भी उसकी कार्यप्रणाली जनता के सामने विश्वसनीय उदाहरण प्रस्तुत कर सकती है।छत्तीसगढ़ की राजनीति में आज मूल सवाल केवल यह नहीं है कि भाजपा सरकार कांग्रेस की राह पर चल रही है या नहीं, बल्कि यह है कि सत्ता में आने के बाद भाजपा ने शासन की गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही के मामले में कितना बदलाव किया है। इसी तरह, सवाल यह भी है कि कांग्रेस सरकार की आलोचना करने के बजाय उसके कामकाज की ठोस समीक्षा करने, तथ्यों के आधार पर सवाल उठाने और जनता के हितों की रक्षा करने में कितनी प्रभावी साबित हो रही है। राजनीतिक दलों की असली परीक्षा सत्ता में रहते हुए लिए गए फैसलों और विपक्ष में रहते हुए निभाई गई जिम्मेदारियों से होती है।अंततः छत्तीसगढ़ की जनता को राजनीतिक आरोपों की लंबी सूची नहीं, बल्कि स्पष्ट जवाब और ठोस परिणाम चाहिए। सरकार बताए कि शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई, जांच कहां तक पहुंची और दोष सिद्ध होने पर क्या कदम उठाए गए। विपक्ष बताए कि उसने जनहित के मुद्दों पर क्या तथ्य जुटाए, विधानसभा और सार्वजनिक मंचों पर कौन-से सवाल उठाए तथा सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित कराने के लिए क्या प्रयास किए। यदि भाजपा सरकार वास्तव में सुशासन का दावा करती है, तो उसे आरोपों की निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई से अपनी विश्वसनीयता सिद्ध करनी होगी। वहीं कांग्रेस को भी अपनी विपक्षी भूमिका केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रखने के बजाय जनता के मुद्दों पर प्रभावी संघर्ष में बदलना होगा।क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता की ताकत से ज्यादा महत्वपूर्ण जवाबदेही होती है और विपक्ष का अस्तित्व केवल सरकार की आलोचना करने के लिए नहीं, बल्कि जनता की आवाज बनने के लिए होता है। यदि सत्ता पक्ष जवाबदेही से दूर होता है और विपक्ष अपनी जिम्मेदारी निभाने में कमजोर पड़ता है, तो लोकतंत्र में सवाल तो बहुत उठते हैं, लेकिन जवाब जनता को नहीं मिलते। छत्तीसगढ़ की जनता अब यही देखना चाहती है कि सरकार सुशासन के अपने दावों को धरातल पर कितना साबित करती है और कांग्रेस विपक्ष के रूप में अपनी खोई हुई धार कितनी वापस ला पाती है।




