
नूर मोहम्मद, जिला ब्यूरो चीफ (सर्वव्यापी)

गौरेला के मिशन स्कूल को लेकर ऐसा विवाद सामने आया है, जिसने शिक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और विद्यार्थियों के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।छत्तीसगढ़ डायोसिस बोर्ड ऑफ एजुकेशन (CDBE) ने मुख्यमंत्री को विस्तृत शिकायत भेजकर आरोप लगाया है कि विद्यालय में फर्जी लेटरहेड, फर्जी हस्ताक्षर, फर्जी नियुक्ति पत्रों का इस्तेमाल कर न केवल शासन-प्रशासन को गुमराह किया गया, बल्कि 10वीं और 12वीं के विद्यार्थियों के शैक्षणिक भविष्य को भी खतरे में डाल दिया गया है।
सबसे गंभीर आरोप-विद्यार्थियों के शैक्षणिक रिकॉर्ड पर संकट
शिकायत में कहा गया है कि निलंबित प्राचार्य भावना आर्य द्वारा कथित रूप से विद्यार्थियों की अंकसूची और अन्य शैक्षणिक अभिलेखों पर हस्ताक्षर किए गए, जबकि उनके विरुद्ध निलंबन आदेश प्रभावी था। यदि जांच में यह सही पाया जाता है, तो हजारों विद्यार्थियों के प्रमाण-पत्रों और उच्च शिक्षा में प्रवेश पर गंभीर असर पड़ सकता है।
फर्जी लेटरहेड और हस्ताक्षर की फोरेंसिक जांच की मांग
CDBE ने शिकायत में मांग की है कि कथित फर्जी लेटरहेड, फर्जी हस्ताक्षर, फर्जी नियुक्ति पत्र और अन्य दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच कराई जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किन लोगों ने दस्तावेज तैयार किए और क्या इनके माध्यम से शासन-प्रशासन एवं पुलिस को भ्रमित किया गया।
जिला शिक्षा अधिकारी की भूमिका भी घेरे में
सबसे बड़ा सवाल जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय की भूमिका पर उठाया गया है। शिकायत में कहा गया है कि इस पूरे मामले की कई लिखित शिकायतें पहले भी दी गईं, लेकिन न निष्पक्ष जांच हुई और न ही प्रभावी कार्रवाई की गई। इसी आधार पर मुख्यमंत्री से DEO की विभागीय जांच कराने की मांग की गई है।
कानूनी प्रबंधन समिति को दरकिनार करने का आरोप
अपने पत्र में यह दावा किया गया है कि संबंधित संस्था संविधान के अनुच्छेद 30 के अंतर्गत संरक्षित अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान है, जहां संचालन का अधिकार केवल वैधानिक प्रबंधन समिति को है। इसके बावजूद कथित रूप से अवैध तरीके से विद्यालय संचालन और नियुक्तियां की गईं तथा वैधानिक समिति के अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास किया गया।
मुख्यमंत्री से सात बड़ी मांगें
CDBE ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि:—पूरे मामले की स्वतंत्र एवं उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।जिला शिक्षा अधिकारी की भूमिका की विभागीय जांच हो।फर्जी दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच कराई जाए।विद्यार्थियों के शैक्षणिक अभिलेखों का सत्यापन कराया जाए।शासन को कथित रूप से गुमराह करने वालों पर कठोर कार्रवाई हो।यदि किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके विरुद्ध विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई की जाए।जांच पूरी होने तक विद्यालय का संचालन केवल वैधानिक प्रबंधन समिति के माध्यम से कराया जाए।
अब सबसे बड़े सवाल
क्या वास्तव में फर्जी लेटरहेड और हस्ताक्षरों का इस्तेमाल हुआ?
क्या विद्यार्थियों के शैक्षणिक रिकॉर्ड प्रभावित हुए?
क्या जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने शिकायतों को नजरअंदाज किया?
यदि शिकायतें पहले से थीं तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?क्या शासन पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराएगा?
अब निगाहें राज्य सरकार और शिक्षा विभाग पर हैं। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही साबित होते हैं, तो यह मामला केवल एक विद्यालय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल बन सकता है। वहीं, जांच पूरी होने तक इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।



