
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय सरकार सुशासन, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई के दावे लगातार करती रही है। मुख्यमंत्री मंचों से बार-बार प्रशासनिक व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की बात कहते हैं, लेकिन सरकार के भीतर मंत्रियों की कार्यप्रणाली, विशेषकर स्थानांतरण और प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर प्रशासनिक गलियारों में चल रही चर्चाओं ने एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चर्चा यह है कि कई विभागों में मनचाही पोस्टिंग, स्थानांतरण रुकवाने, स्थान बदलवाने और प्रतिनियुक्ति हासिल करने के लिए कथित रूप से लेन-देन की व्यवस्था काम कर रही है। हालांकि इन चर्चाओं और आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है, लेकिन सवाल यह है कि यदि प्रशासनिक गलियारों में इतनी लगातार चर्चा है तो सरकार इसकी निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराती?कहा जाता है कि बिना आग लगे धुआं नहीं उठता। यदि किसी एक-दो कर्मचारी या अधिकारी के बीच कभी-कभार कोई बात हो तो उसे अफवाह कहकर नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन जब अलग-अलग विभागों के कर्मचारी, अधिकारी और प्रशासनिक गलियारों से जुड़े लोग लगातार स्थानांतरण और प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाने लगें, तो सत्ता और सरकार दोनों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। चर्चा को दबाने से व्यवस्था पर उठे संदेह समाप्त नहीं होते, बल्कि और गहरे होते हैं।सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी है कि स्थानांतरण और प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया हर वर्ष विवादों के घेरे में आ जाती है। यदि सब कुछ नियमों और योग्यता के आधार पर हो रहा है, तो पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक और पारदर्शी क्यों नहीं बनाई जाती? किस अधिकारी या कर्मचारी ने आवेदन दिया, किसने अनुशंसा की, किस आधार पर उसे प्रतिनियुक्ति मिली और किस कारण किसी कर्मचारी का स्थानांतरण किया गया—इन सबका स्पष्ट रिकॉर्ड सार्वजनिक व्यवस्था में उपलब्ध होना चाहिए।प्रशासनिक सूत्रों के बीच यह भी चर्चा है कि कुछ विभागों में वर्षों से एक ही स्थान पर जमे लोगों की स्थिति और दूसरी ओर बार-बार स्थानांतरण का सामना करने वाले कर्मचारियों के मामले अलग-अलग मानकों की ओर इशारा करते हैं। यही असमानता संदेह पैदा करती है। किसी का स्थानांतरण नियमों के तहत तत्काल हो जाता है, किसी का आवेदन महीनों फाइलों में दबा रहता है और किसी को प्रतिनियुक्ति के लिए विशेष अवसर मिल जाते हैं। यदि यह सब केवल प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर हो रहा है तो फिर सरकार को इन निर्णयों के कारण सार्वजनिक करने में संकोच क्यों होना चाहिए?स्थानांतरण केवल कर्मचारी को एक स्थान से दूसरे स्थान भेजने की प्रक्रिया नहीं है। यह सीधे तौर पर उसके पारिवारिक जीवन, बच्चों की शिक्षा, आर्थिक स्थिति और मानसिक दबाव से जुड़ा विषय है। प्रतिनियुक्ति तो उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी विशेष विभाग, निगम, मंडल या संस्थान में पहुंचना कर्मचारी और अधिकारी के कैरियर तथा प्रभाव दोनों को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि इन प्रक्रियाओं में थोड़ी भी अपारदर्शिता या पक्षपात की आशंका पूरी सरकार की छवि पर सवाल खड़े करती है।विष्णु देव साय सरकार को इस मामले में केवल चर्चाओं को अफवाह बताकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए। यदि मंत्रियों या उनके कार्यालयों के नाम पर कथित दलाली, सिफारिश और लेन-देन की चर्चाएं हो रही हैं तो यह मंत्रियों के लिए भी गंभीर चुनौती है। उन्हें स्वयं सामने आकर स्पष्ट करना चाहिए कि उनके विभागों में स्थानांतरण और प्रतिनियुक्ति की क्या व्यवस्था है और किन मानकों के आधार पर निर्णय लिए जाते हैं। पारदर्शिता ही वह सबसे बड़ा हथियार है, जो किसी भी संदेह को समाप्त कर सकती है।यह भी जरूरी है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय इस विषय को गंभीरता से लें। सरकार की छवि केवल बड़े आयोजनों, घोषणाओं और भाषणों से नहीं बनती। जनता और कर्मचारियों का विश्वास तभी मजबूत होता है, जब व्यवस्था निष्पक्ष दिखाई भी दे और निष्पक्ष साबित भी हो। यदि लगातार शिकायतें और चर्चाएं सामने आ रही हैं तो एक स्वतंत्र जांच तंत्र के माध्यम से इसकी पड़ताल होनी चाहिए।स्थानांतरण और प्रतिनियुक्ति के मामलों में यदि किसी प्रकार का लेन-देन नहीं हुआ है, तो निष्पक्ष जांच से सरकार और मंत्रियों की छवि मजबूत होगी। और यदि कहीं कोई अनियमितता या भ्रष्टाचार हुआ है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुशासन के दावों को वास्तविक मजबूती देगी। लेकिन सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है, जब शिकायतें उठती रहें, चर्चाएं फैलती रहें और सरकार चुप्पी साधे रहे।छत्तीसगढ़ की राजनीति और प्रशासन में अब यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि मंत्रियों की कार्यप्रणाली में सुधार कब होगा? क्या स्थानांतरण और प्रतिनियुक्ति जैसी संवेदनशील प्रक्रियाओं को पूरी तरह ऑनलाइन और सार्वजनिक किया जाएगा? क्या हर निर्णय के पीछे प्रशासनिक कारण दर्ज किया जाएगा? क्या कथित दलालों और सिफारिशी नेटवर्क की पहचान होगी? क्या मंत्रियों के नाम पर होने वाले किसी भी संभावित लेन-देन की शिकायतों की निष्पक्ष जांच होगी?साय सरकार के सामने अब केवल व्यवस्था चलाने की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर जनता और कर्मचारियों का भरोसा कायम रखने की चुनौती है। यदि सुशासन का दावा करना है तो स्थानांतरण और प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया को संदेह और चर्चाओं से बाहर निकालना होगा। धुआं उठ रहा है तो सरकार को यह पता करना ही होगा कि आखिर आग कहां है—या फिर जांच कर यह साबित करना होगा कि धुआं केवल भ्रम है। दोनों ही स्थितियों में चुप्पी समाधान नहीं है।



