
विकास नंद/ सर्वव्यापी
सरायपाली नगर के गौरव पथ को रोशन करने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये की लागत से लगाई गई स्ट्रीट लाइट व्यवस्था इन दिनों खुद अंधेरे में नजर आ रही है। लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद कई स्थानों पर स्ट्रीट लाइटें बंद पड़ी हैं। ऐसे में अब नागरिकों के बीच निर्माण की गुणवत्ता, रखरखाव और जिम्मेदारी तय करने को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
बताया जा रहा है कि गौरव पथ में स्ट्रीट लाइट लगाने का ठेका करोड़ों रुपये की लागत से किया गया था। इसके बावजूद कुछ ही समय में लाइटों के बंद होने और नियमित रखरखाव के अभाव ने पूरी व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। खास बात यह है कि जहां एक ओर अंडर वायरिंग जैसी व्यवस्था किए जाने की बात सामने आती है, वहीं दूसरी ओर कई जगह लाइटें रोशनी देने के बजाय बंद पड़ी दिखाई देती हैं।
करोड़ों की व्यवस्था, 60 रुपये के बल्ब की गारंटी?
नगरवासियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि स्ट्रीट लाइट व्यवस्था पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं तो इतनी बड़ी संख्या में लाइटें बंद क्यों हैं? नागरिकों का कहना है कि सामान्य बल्ब की कीमत महज कुछ दर्जन रुपये हो सकती है, लेकिन करोड़ों की लागत वाली पूरी स्ट्रीट लाइट व्यवस्था के बावजूद यदि रोशनी नहीं मिल रही है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
यदि ठेका शर्तों में निर्धारित अवधि तक मेंटेनेंस और खराब लाइटों को बदलने की जिम्मेदारी कार्य एजेंसी की है, तो फिर बंद पड़ी लाइटों की मरम्मत तत्काल क्यों नहीं कराई जा रही है? क्या संबंधित एजेंसी से जवाब-तलब किया गया है और क्या भुगतान की शर्तों के अनुसार रखरखाव सुनिश्चित किया जा रहा है? ये सवाल अब आम नागरिक पूछ रहे हैं।
अंडर वायरिंग के बावजूद अंधेरा, आखिर खामी कहां?
गौरव पथ में अंडर वायरिंग सहित आधुनिक स्ट्रीट लाइट व्यवस्था तैयार किए जाने के बावजूद लाइटों का बंद रहना तकनीकी गुणवत्ता और निर्माण कार्य की निगरानी पर भी सवाल खड़ा करता है। यदि बिजली की वायरिंग, पोल, फिटिंग और लाइटें निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप हैं, तो बार-बार लाइटों के बंद होने की वजह क्या है?
नगरवासियों का कहना है कि केवल उद्घाटन और निर्माण के समय व्यवस्था को लेकर दावे करने से काम पूरा नहीं होता। करोड़ों रुपये की सार्वजनिक राशि से तैयार संपत्ति का निर्धारित अवधि तक रखरखाव और उसकी जवाबदेही भी सुनिश्चित होनी चाहिए।
ठेकेदार की मनमानी पर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी क्यों?
सबसे गंभीर सवाल स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर उठ रहे हैं। जब नगर की प्रमुख सड़क और गौरव पथ जैसी सार्वजनिक सुविधा से जुड़ी करोड़ों रुपये की लाइट व्यवस्था खराब हो रही है, तब जनप्रतिनिधियों की ओर से जिम्मेदार विभाग और कार्य एजेंसी पर कार्रवाई की मांग क्यों नहीं उठाई जा रही?
जनता के बीच यह चर्चा भी है कि यदि किसी निजी व्यक्ति के घर की छोटी सी विद्युत समस्या लंबे समय तक बनी रहे तो तत्काल ध्यान दिया जाता है, लेकिन करोड़ों रुपये की सार्वजनिक राशि से बनी व्यवस्था खराब होने के बावजूद जिम्मेदारों की चुप्पी क्यों बनी हुई है?
डबल इंजन सरकार के सुशासन की कसौटी पर व्यवस्था
सरकार लगातार पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन की बात करती है। ऐसे में सरायपाली के गौरव पथ में करोड़ों रुपये की लागत से तैयार स्ट्रीट लाइट व्यवस्था का बंद पड़ा रहना स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के लिए भी गंभीर विषय होना चाहिए।
जनता का सवाल सीधा है
—करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी यदि गौरव पथ अंधेरे में है, तो इसके लिए जिम्मेदारी किसकी है?नागरिकों ने मांग की है कि गौरव पथ की पूरी स्ट्रीट लाइट व्यवस्था की तकनीकी जांच कराई जाए, ठेका शर्तों और मेंटेनेंस प्रावधानों को सार्वजनिक किया जाए तथा जहां भी लापरवाही या गुणवत्ता में कमी पाई जाए, वहां संबंधित कार्य एजेंसी के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।सार्वजनिक धन से बनी व्यवस्था जनता की सुविधा के लिए है। ऐसे में करोड़ों की लाइटें बंद रहना महज तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि जवाबदेही की परीक्षा भी है।




