
विकास नंद (सर्वव्यापी)

गांवों के विकास और ग्रामीणों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी संभालने वाली ग्राम पंचायतें इन दिनों आर्थिक संकट से जूझ रही हैं। शासन की ओर से मिलने वाली विभिन्न मदों की राशि और निर्माण कार्यों के भुगतान में देरी का मुद्दा अब प्रदेशभर में पंचायत प्रतिनिधियों की नाराजगी का कारण बनता जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि गांवों में विकास कार्यों को आगे बढ़ाना तो दूर, बिजली, पेयजल, साफ-सफाई और प्रकाश व्यवस्था जैसी आवश्यक सुविधाओं को सुचारु बनाए रखना भी पंचायतों के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
छत्तीसगढ़ सरपंच संघ के आह्वान पर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में पंचायत प्रतिनिधियों ने अपनी मांगों को लेकर आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी है। महासमुंद जिले में भी अलग-अलग ग्राम पंचायतों के वर्तमान सरपंच और पूर्व सरपंच लंबित भुगतान तथा मूलभूत सुविधाओं के लिए आवश्यक राशि जारी नहीं होने से नाराज हैं। पंचायत प्रतिनिधियों के बीच अब अनिश्चितकालीन धरना और अनशन जैसे आंदोलनात्मक कदम उठाने की चर्चा तेज हो गई है।
चार प्रमुख मांगों को लेकर सरकार से नाराजगी
पंचायत प्रतिनिधियों की नाराजगी के पीछे कई महत्वपूर्ण वित्तीय और प्रशासनिक मुद्दे हैं। इनमें प्रमुख रूप से ग्राम पंचायतों को मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं की राशि, 16वें वित्त आयोग का अनुदान, पूर्व में कराए गए निर्माण कार्यों की लंबित भुगतान राशि तथा पंचों और उपसरपंचों का मानदेय शामिल है।
सरपंचों का कहना है कि ग्राम पंचायतों के माध्यम से गांवों में अनेक विकास कार्य कराए जाते हैं। इनमें नाली निर्माण, पेयजल व्यवस्था, बिजली और स्ट्रीट लाइट, स्वच्छता, सार्वजनिक स्थलों का रखरखाव सहित कई आवश्यक कार्य शामिल हैं। लेकिन जब इन कार्यों के लिए निर्धारित राशि ही समय पर उपलब्ध नहीं होगी तो पंचायतें आखिर ग्रामीणों की अपेक्षाओं पर कैसे खरी उतरेंगी?
दीपावली और राज्योत्सव के बीच गांवों की बुनियादी सुविधाओं पर संकट
प्रदेश में एक ओर राज्योत्सव और दीपावली जैसे पर्वों की तैयारियां चल रही हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं को लेकर असंतोष सामने आ रहा है। पंचायतों में पर्याप्त राशि नहीं होने से बिजली व्यवस्था, स्ट्रीट लाइट, साफ-सफाई, पेयजल और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं पर असर पड़ने की आशंका है।त्योहारी सीजन में गांवों की गलियों और सार्वजनिक स्थलों पर रोशनी, स्वच्छता तथा पेयजल की बेहतर व्यवस्था ग्रामीणों की अपेक्षा होती है। लेकिन आर्थिक संसाधनों के अभाव में पंचायत प्रतिनिधियों के सामने इन व्यवस्थाओं को बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है।इसका सीधा असर सरपंचों की छवि पर भी पड़ रहा है। ग्रामीण अपनी समस्याओं और सुविधाओं की मांग लेकर पंचायत प्रतिनिधियों के पास पहुंचते हैं। उन्हें यह समझाना सरपंचों के लिए मुश्किल हो रहा है कि जब पंचायत के खाते में आवश्यक राशि ही उपलब्ध नहीं है तो वे विकास और मूलभूत सुविधाओं से जुड़े कार्य कैसे कराएं।
विकास कार्य कराए, लेकिन भुगतान के लिए भटक रहे पंचायत प्रतिनिधि
सबसे गंभीर स्थिति उन ग्राम पंचायतों की बताई जा रही है, जहां पूर्व में निर्माण कार्य पूरे कराए जा चुके हैं, लेकिन संबंधित भुगतान अब तक लंबित हैं। पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि निर्माण कार्य कराने के दौरान कई बार स्थानीय स्तर पर संसाधनों की व्यवस्था करनी पड़ती है। इसके बाद भुगतान में देरी होने से आर्थिक दबाव बढ़ता जाता है।वहीं पंचों और उपसरपंचों के मानदेय का भुगतान भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। पंचायतों में निर्वाचित जनप्रतिनिधि नियमित रूप से अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं, लेकिन मानदेय समय पर नहीं मिलने से उनमें भी नाराजगी बढ़ रही है।
महासमुंद में भी आंदोलन की तैयारी, अनिश्चितकालीन अनशन की नौबत
महासमुंद जिले के विभिन्न ग्राम पंचायतों के सरपंचों और पूर्व सरपंचों के बीच लंबित राशि को लेकर असंतोष लगातार बढ़ रहा है। पंचायत प्रतिनिधियों का मानना है कि जब तक मूलभूत सुविधाओं की राशि, 16वें वित्त आयोग का अनुदान और निर्माण कार्यों का बकाया भुगतान जारी नहीं किया जाएगा, तब तक गांवों में विकास कार्यों को अपेक्षित गति देना मुश्किल रहेगा।
इसी नाराजगी के चलते जिले में भी सरपंचों और पूर्व सरपंचों द्वारा अनिश्चितकालीन धरना एवं अनशन पर बैठने की स्थिति बनती दिखाई दे रही है। पंचायत प्रतिनिधियों की प्रमुख मांग है कि शासन लंबित राशि जारी करने के साथ भुगतान की प्रक्रिया को समयबद्ध करे, ताकि ग्राम पंचायतों का कामकाज प्रभावित न हो।
बड़ा सवाल : गांवों के विकास की जिम्मेदारी तो पंचायतों पर, लेकिन संसाधन कहां?
ग्राम पंचायतें ग्रामीण स्वशासन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई हैं। गांवों की छोटी-बड़ी समस्याओं का समाधान सबसे पहले पंचायत स्तर पर ही अपेक्षित होता है। ऐसे में यदि पंचायतों को मिलने वाली राशि समय पर उपलब्ध नहीं होगी तो इसका असर केवल सरपंचों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सीधे ग्रामीणों को मिलने वाली सुविधाओं पर पड़ेगा।
अब सवाल यह है कि जब गांवों में बिजली, पेयजल, साफ-सफाई और अन्य बुनियादी व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखने की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों की है, तो इसके लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन समय पर उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी है?
प्रदेश के पंचायत प्रतिनिधियों की नाराजगी और महासमुंद जिले में उभरते आंदोलन के संकेतों के बीच शासन को इस पूरे मामले पर गंभीरता से विचार करना होगा। अन्यथा विकास की सबसे निचली और महत्वपूर्ण इकाई ग्राम पंचायतें आर्थिक संकट से जूझती रहेंगी और ग्रामीणों की बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी अपेक्षाएं अधूरी रह जाएंगी।



