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अफसर तो बहुत आए-गए, लेकिन सोनमणि बोरा को आज भी क्यों याद करते हैं बिलासपुर-जांजगीर के लोग…?,कक्ष में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की बड़ी तस्वीर, कार्यशैली में मानवीय संवेदना और जनसेवा का भाव—आखिर क्या है सोनमणि बोरा की अलग पहचान का राज?

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सोनमणि बोरा वर्तमान में नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के प्रमुख सचिव के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। प्रशासनिक गलियारों में अधिकारियों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन कुछ अधिकारी ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान केवल उनके पद और अधिकारों तक सीमित नहीं रहती। उनके कार्यों, व्यवहार और मानवीय संवेदनाओं की छाप लोगों के दिलों में लंबे समय तक बनी रहती है। सोनमणि बोरा का नाम भी ऐसे ही अधिकारियों में लिया जाता है, जिन्हें बिलासपुर और जांजगीर-चांपा क्षेत्र के लोग आज भी याद करते हैं।कक्ष में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की बड़ी तस्वीर, जो खींचती है ध्यानसोनमणि बोरा के व्यक्तित्व और कार्यशैली की चर्चा के बीच उनके कक्ष की एक खास बात भी ध्यान आकर्षित करती है। बताया जाता है कि उनके कक्ष में अन्य अधिकारियों के कक्षों से अलग राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की एक बड़ी तस्वीर लगी हुई है। गांधीजी की तस्वीर केवल दीवार की शोभा बढ़ाने वाली वस्तु नहीं, बल्कि सत्य, सादगी, सेवा और मानवीय मूल्यों की याद दिलाने वाला प्रतीक भी है। ऐसे में उनके कक्ष की यह विशेषता प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ नैतिक मूल्यों और जनसेवा के महत्व पर भी ध्यान खींचती है।बिलासपुर में निभाईं कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियांबिलासपुर को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले सोनमणि बोरा नगर निगम आयुक्त, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, कलेक्टर और संभाग आयुक्त जैसे महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दे चुके हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई। इन विभिन्न पदों पर काम करते हुए उनका प्रशासनिक अनुभव व्यापक रहा। हालांकि, किसी अधिकारी की वास्तविक पहचान केवल उसके द्वारा संभाले गए पदों से नहीं, बल्कि उन पदों पर रहते हुए आम लोगों के लिए किए गए कार्यों से भी बनती है।एक संवेदनशील पहल, जिसने परिवार को दिया सहाराबिलासपुर कलेक्टर के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान एक संविदा कर्मचारी के निधन के बाद उसके परिवार की स्थिति को देखते हुए उसकी पत्नी को संविदा नियुक्ति दिए जाने की पहल का उल्लेख किया जाता है। संकट की घड़ी में परिवार को सहारा देने वाली इस पहल को प्रशासनिक संवेदनशीलता के उदाहरण के रूप में देखा जाता है।यह प्रसंग इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि प्रशासनिक व्यवस्था में नियमों और प्रक्रियाओं का पालन जितना जरूरी है, उतना ही महत्वपूर्ण जरूरतमंद परिवारों की परिस्थितियों को समझना भी है। हालांकि, इस नियुक्ति से संबंधित विस्तृत आधिकारिक जानकारी उपलब्ध होने पर इस पहल के संदर्भ को और स्पष्टता से सामने रखा जा सकता है।पद से आगे बढ़कर जनविश्वास बनाने की चुनौतीप्रशासनिक सेवा में किसी अधिकारी के पास अधिकार होते हैं, निर्णय लेने की जिम्मेदारी होती है और शासन की योजनाओं को जमीन पर उतारने की अपेक्षा भी रहती है। लेकिन आम नागरिकों के लिए अधिकारी का व्यवहार, उनकी बात सुनने का तरीका और जरूरत के समय मिलने वाला सहयोग भी उतना ही मायने रखता है।सोनमणि बोरा के बिलासपुर और जांजगीर-चांपा से जुड़े कार्यकाल को याद किए जाने के पीछे भी उनकी प्रशासनिक भूमिका के साथ मानवीय संवेदनाओं की चर्चा सामने आती है। जनसेवा की यही अवधारणा प्रशासन को आम नागरिकों के और करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।गांधीजी के आदर्श और लोकसेवा का संदेशराष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सत्य, सादगी और समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण को विशेष महत्व दिया था। उनके विचारों का वास्तविक अर्थ तभी सामने आता है, जब सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी निभाने वाले लोग अपने निर्णयों और व्यवहार में मानवीय मूल्यों को स्थान दें।सोनमणि बोरा के कक्ष में गांधीजी की बड़ी तस्वीर का होना इसी संदर्भ में एक दिलचस्प पहलू है। तस्वीर अपने आप में किसी अधिकारी की कार्यशैली का प्रमाण नहीं होती, लेकिन वह उन मूल्यों की याद जरूर दिलाती है, जिनकी अपेक्षा लोकसेवा से की जाती है।अफसर आते-जाते रहते हैं, लेकिन लोगों की यादों में वही रहते हैं, जिनके काम आए होंप्रशासनिक पद अस्थायी होते हैं। आज कोई अधिकारी किसी जिले में पदस्थ होता है, तो कल उसकी जिम्मेदारी किसी दूसरे स्थान पर हो सकती है। लेकिन किसी जरूरतमंद परिवार को मिला सहारा, किसी नागरिक की समस्या के समाधान के लिए किया गया प्रयास और आम लोगों के प्रति संवेदनशील व्यवहार लंबे समय तक याद रखा जाता है।यही वजह है कि सोनमणि बोरा के पुराने कार्यकाल का उल्लेख आज भी बिलासपुर और जांजगीर-चांपा के संदर्भ में किया जाता है। उनकी प्रशासनिक यात्रा और मानवीय पहल से जुड़े प्रसंग यह सवाल भी उठाते हैं कि क्या लोकसेवा की असली सफलता केवल बड़े पद हासिल करने में है, या उन पदों पर रहते हुए लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में?किसी भी लोकसेवक के लिए जनता का विश्वास और सम्मान उसकी सबसे बड़ी पूंजी होता है। पद से पहचान मिल सकती है, लेकिन लंबे समय तक याद वही रखे जाते हैं, जिनके कार्यों में संवेदना, जिम्मेदारी और जनहित की झलक दिखाई देती है।

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