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संपादक की कलम से….भाजपा सत्ता की जवाबदेही का असली इम्तिहान,विपक्ष के भ्रष्टाचार पर कार्रवाई, अपने दामन पर खामोशी क्यों?

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

लोकतंत्र में सत्ता केवल शासन करने का अधिकार नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही निभाने का दायित्व भी है। जब भारतीय जनता पार्टी की सरकारें विपक्षी दलों के शासनकाल में हुए कथित भ्रष्टाचार की जांच कराती हैं, कार्रवाई करती हैं और दोषियों को कानून के दायरे में लाने की बात करती हैं, तब जनता को यह उम्मीद भी रहती है कि यही कसौटी सत्ता में बैठे अपने लोगों पर भी लागू होगी। आखिर भ्रष्टाचार की कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं होती, न ही रिश्वतखोरी का कोई दलगत धर्म होता है। भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार है—चाहे उसका आरोप विपक्ष के किसी नेता पर लगे या सत्तारूढ़ दल के किसी प्रभावशाली व्यक्ति पर।सवाल विपक्ष पर कार्रवाई करने का नहीं, बल्कि अपने और पराए के लिए अलग-अलग मापदंड अपनाने की आशंका का है। यदि विपक्षी सरकारों के कार्यकाल में हुए कथित घोटालों की जांच आवश्यक है, तो वर्तमान सरकारों के कार्यकाल में उठने वाली भ्रष्टाचार की शिकायतों की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? यदि विपक्ष के किसी नेता से जवाब मांगा जा सकता है, तो सत्ता के गलियारों में बैठे किसी अधिकारी, जनप्रतिनिधि या प्रभावशाली व्यक्ति से जवाब मांगने में संकोच क्यों होना चाहिए? कानून का उद्देश्य राजनीतिक विरोधियों को कटघरे में खड़ा करना भर नहीं, बल्कि अपराध सिद्ध होने पर दोषियों को दंडित करना और निर्दोषों को न्याय दिलाना है।विपक्ष के लिए सख्ती, अपनों के लिए नरमी—यह दोहरा मापदंड नहीं चल सकतादेश की राजनीति में भ्रष्टाचार के आरोप कोई नई बात नहीं हैं। अलग-अलग दलों की सरकारों के कार्यकाल में नेताओं, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों पर तरह-तरह के आरोप लगते रहे हैं। कई मामलों में जांच हुई, मुकदमे चले और दोषसिद्धि भी हुई, जबकि अनेक मामलों में आरोप प्रमाणित नहीं हो सके। इसलिए किसी भी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी घोषित करना उचित नहीं है। लेकिन आरोप सामने आने के बाद निष्पक्ष जांच से बचना भी जवाबदेह शासन की भावना के अनुरूप नहीं है।समस्या तब पैदा होती है, जब किसी विपक्षी नेता पर आरोप लगने के बाद सरकारी तंत्र सक्रिय दिखाई देता है, लेकिन सत्तारूढ़ व्यवस्था से जुड़े किसी व्यक्ति के विरुद्ध शिकायत सामने आने पर कार्रवाई की गति, पारदर्शिता और परिणाम को लेकर सवाल उठने लगते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार को केवल अपने इरादों का दावा करने के बजाय अपने आचरण से भरोसा कायम करना चाहिए।भाजपा की केंद्र और विभिन्न राज्यों की सरकारें यदि भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कार्रवाई को अपनी प्राथमिकता बताती हैं, तो उस प्राथमिकता का प्रमाण सभी मामलों में समान कानूनी प्रक्रिया, निष्पक्ष जांच और समयबद्ध कार्रवाई के रूप में दिखाई देना चाहिए। भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान की विश्वसनीयता इस बात से तय नहीं होगी कि विपक्ष के कितने नेताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई, बल्कि इस बात से भी तय होगी कि सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों पर लगे गंभीर आरोपों की जांच कितनी निष्पक्षता से हुई।छत्तीसगढ़ में भी जवाबदेही के सवालों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकताछत्तीसगढ़ की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था भी इस कसौटी से अलग नहीं है। राज्य में सुशासन, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण की अपेक्षा जनता को अपनी सरकार से है। सरकारी नियुक्तियों, पदस्थापनाओं, स्थानांतरणों, विभागीय निर्णयों और सार्वजनिक धन के उपयोग से संबंधित किसी भी गंभीर शिकायत पर उचित प्रक्रिया के तहत जांच होना आवश्यक है।यदि किसी विभाग में पदस्थापना या स्थानांतरण के नाम पर अवैध धन की मांग किए जाने की शिकायत सामने आती है, तो उसका समाधान राजनीतिक बयानबाजी या आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच से होना चाहिए। शिकायत की सत्यता की पुष्टि किए बिना किसी अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन शिकायत को केवल इसलिए नजरअंदाज कर देना भी उचित नहीं कि उससे सरकार की छवि प्रभावित हो सकती है।सरकार की जिम्मेदारी है कि वह शिकायतकर्ता को सुने, उपलब्ध साक्ष्यों की जांच कराए और यदि आरोप प्रमाणित हों तो नियमानुसार कार्रवाई करे। यदि आरोप निराधार हों, तो जांच के निष्कर्षों से स्थिति स्पष्ट की जाए। यही वह रास्ता है जिससे प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता आती है और जनता का विश्वास मजबूत होता है।छत्तीसगढ़ में सत्ता और प्रशासन के बीच जवाबदेही का रिश्ता जितना मजबूत होगा, भ्रष्टाचार की शिकायतों पर उतना ही प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा। किसी अधिकारी की पदस्थापना, किसी जनप्रतिनिधि की सिफारिश या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की निकटता कानून से ऊपर नहीं होनी चाहिए। सरकारी व्यवस्था में पद और प्रभाव का इस्तेमाल यदि निजी लाभ के लिए किया जाता है, तो उसकी जांच का रास्ता खुला रहना चाहिए।कार्रवाई का पैमाना राजनीतिक पहचान नहीं, उपलब्ध साक्ष्य होने चाहिएलोकतंत्र में जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता का महत्व इसलिए है, क्योंकि जनता को उनसे राजनीतिक पक्षधरता नहीं, बल्कि कानून के अनुसार काम करने की अपेक्षा रहती है। भ्रष्टाचार के मामलों में जांच की शुरुआत शिकायत, दस्तावेजों, वित्तीय लेन-देन और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए। जांच का परिणाम भी साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार तय होना चाहिए।यदि विपक्षी दलों के नेताओं पर लगे आरोपों की जांच होती है, तो उसका विरोध केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि संबंधित व्यक्ति विपक्ष से जुड़ा है। उसी तरह सत्तारूढ़ दल के किसी नेता या सरकार से जुड़े अधिकारी के खिलाफ शिकायत होने पर जांच का विरोध केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि इससे सरकार की छवि प्रभावित हो सकती है।दोनों स्थितियों में एक ही सिद्धांत लागू होना चाहिए—न किसी को राजनीतिक विरोध के कारण निशाना बनाया जाए और न किसी को राजनीतिक निकटता के कारण संरक्षण मिले।यही निष्पक्ष शासन का मूल आधार है। यदि सरकारें इस सिद्धांत का पालन करती हैं, तो भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध बताने की गुंजाइश कम होगी और जांच एजेंसियों के प्रति जनता का विश्वास बढ़ेगा।क्या सत्ता में आने के बाद भ्रष्टाचार की परिभाषा बदल जाती है?यह सवाल हर उस राजनीतिक दल से पूछा जाना चाहिए, जो विपक्ष में रहते हुए भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाता है और सत्ता में आने के बाद शासन की जिम्मेदारी संभालता है। विपक्ष में रहते हुए जिस अनियमितता को गंभीर मुद्दा बताया जाता है, सत्ता में आने के बाद वैसी ही शिकायत पर चुप्पी क्यों दिखाई देनी चाहिए?क्या भ्रष्टाचार केवल तब गंभीर अपराध है, जब आरोप राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी पर लगे? क्या प्रशासनिक अनियमितता की जांच तभी जरूरी है, जब उससे विपक्षी दल असहज हो? और क्या सत्ता के करीब होने से किसी व्यक्ति को जवाबदेही से छूट मिल जाती है?इन प्रश्नों का उत्तर राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि सरकारी कार्रवाई से दिया जाना चाहिए। यदि किसी शिकायत में दम है, तो उसकी जांच हो। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो कानून के अनुसार दंड मिले। यदि आरोप गलत साबित होते हैं, तो संबंधित व्यक्ति को अनावश्यक बदनामी से बचाया जाए। यही न्यायपूर्ण व्यवस्था की पहचान है।सरकार की छवि बचाने के लिए शिकायतों को दबाने की प्रवृत्ति, यदि कहीं मौजूद हो, तो वह अंततः शासन के प्रति अविश्वास को बढ़ाती है। इसके विपरीत, निष्पक्ष जांच के माध्यम से अपनी ही व्यवस्था में सामने आई अनियमितताओं पर कार्रवाई करना सरकार की जवाबदेही को प्रदर्शित करता है।भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरीभ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई का दावा तभी प्रभावी होगा, जब उसके साथ पारदर्शिता भी दिखाई दे। जांच की समयसीमा, शिकायतों पर की गई कार्रवाई, दोषसिद्ध मामलों की स्थिति और प्रशासनिक सुधारों की जानकारी सार्वजनिक करना शासन की जवाबदेही को मजबूत कर सकता है।केंद्र हो या राज्य, किसी भी सरकार को यह समझना होगा कि जनता केवल कार्रवाई की घोषणा नहीं सुनना चाहती, बल्कि यह भी जानना चाहती है कि शिकायत पर क्या हुआ, जांच में क्या सामने आया और दोष सिद्ध होने पर क्या कदम उठाए गए।इसके लिए शिकायत निवारण व्यवस्था को प्रभावी बनाना, जांच एजेंसियों को अनावश्यक राजनीतिक दबाव से मुक्त रखना, सरकारी निर्णयों में पारदर्शिता बढ़ाना और दोषियों के विरुद्ध समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करना आवश्यक है। साथ ही, जांच के नाम पर किसी निर्दोष को प्रताड़ित न किया जाए और किसी आरोपी को बिना कानूनी प्रक्रिया के दोषी न माना जाए, इसका ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।सुशासन का अर्थ केवल भ्रष्टाचार के आरोपों पर कार्रवाई करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जिसमें भ्रष्टाचार की संभावना कम हो, शिकायतों की सुनवाई हो और सार्वजनिक पद का दुरुपयोग करने वालों को कानून के अनुसार जवाब देना पड़े।अंतिम सवाल: सत्ता किसके लिए और जवाबदेही किसकी?भारतीय लोकतंत्र में जनता किसी भी सरकार को स्थायी रूप से जवाबदेही से मुक्त नहीं करती। चुनाव में मिला जनादेश शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार संविधान, कानून और सार्वजनिक नैतिकता की सीमाओं के भीतर ही इस्तेमाल किया जा सकता है।भाजपा की सरकारें हों या किसी अन्य राजनीतिक दल की सरकारें, भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनकी प्रतिबद्धता का मूल्यांकन समान कसौटी पर होना चाहिए। विपक्षी शासनकाल के कथित भ्रष्टाचार की जांच करना सरकार का दायित्व हो सकता है, लेकिन अपने कार्यकाल में उठने वाली गंभीर शिकायतों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण दायित्व है।छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश में जनता यह देखना चाहती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई किसी दल विशेष तक सीमित न रहे। यदि किसी विपक्षी नेता के खिलाफ साक्ष्य हैं, तो जांच और कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। यदि सत्तारूढ़ दल से जुड़े किसी व्यक्ति या सरकारी अधिकारी के खिलाफ साक्ष्य हैं, तो वहां भी वही प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। कानून की निष्पक्षता का अर्थ ही यही है कि राजनीतिक पहचान न्याय का आधार न बने।क्योंकि भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई की असली परीक्षा विपक्ष पर कार्रवाई करने में नहीं, बल्कि अपने लोगों पर लगे आरोपों के सामने भी निष्पक्षता बनाए रखने में होती है।सत्ता में बैठे लोगों को यह याद रखना चाहिए कि जनता की नजर केवल इस पर नहीं होती कि सरकार विरोधियों के खिलाफ कितनी सख्ती दिखाती है, बल्कि इस पर भी होती है कि वह अपने शासन में पारदर्शिता, ईमानदारी और जवाबदेही के कितने मजबूत उदाहरण प्रस्तुत करती है।अंततः सवाल सीधा है—विपक्ष के कथित भ्रष्टाचार पर कार्रवाई का दावा करने वाली सरकारें अपने शासन में उठने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों पर भी उसी निष्पक्षता से कार्रवाई करेंगी, या जवाबदेही की कसौटी राजनीतिक पहचान देखकर बदल जाएगी?इस प्रश्न का उत्तर भाषणों में नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, पारदर्शी कार्रवाई और कानून के समान अनुपालन में छिपा है। यही लोकतंत्र की मांग है, यही सुशासन की कसौटी है और यही जनता के विश्वास को बनाए रखने का सबसे विश्वसनीय रास्ता है।

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