तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की न्यायधानी और महत्वपूर्ण संभागीय मुख्यालय बिलासपुर में प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर एक गंभीर सवाल सामने आया है। संभागायुक्त कार्यालय में अतिरिक्त संभाग आयुक्त का पद करीब दो वर्षों से रिक्त पड़ा है, जबकि दूसरी ओर कार्यालय में स्वीकृत पदों की तुलना में एक अतिरिक्त उप आयुक्त की पदस्थापना किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।जानकारी के अनुसार संभागायुक्त कार्यालय बिलासपुर में उप आयुक्त विकास और उप आयुक्त राजस्व के दो पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में यहां तीन उप आयुक्त कार्यरत बताए जा रहे हैं। यानी स्वीकृत दो पदों के मुकाबले एक उप आयुक्त को अतिरिक्त रूप से पदस्थ किए जाने की स्थिति है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब अतिरिक्त संभाग आयुक्त जैसे महत्वपूर्ण पद पर लंबे समय से नियुक्ति नहीं हुई, तो स्वीकृत पदों से अधिक एक उप आयुक्त की पदस्थापना की प्रशासनिक जरूरत क्या है?रिक्त पद और अतिशेष पदस्थापना का विरोधाभाससंभागीय स्तर पर अतिरिक्त संभाग आयुक्त का पद महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्वों से जुड़ा होता है। इसके बावजूद करीब दो वर्षों से यह पद रिक्त रहना शासन की पदस्थापना नीति और प्रशासनिक आवश्यकता के आकलन पर सवाल खड़ा करता है। वहीं, जिन पदों की संख्या शासन स्तर पर निर्धारित है, उससे अधिक अधिकारी की पदस्थापना होने से सरकारी तंत्र में पदों के युक्तियुक्तकरण और मानव संसाधन प्रबंधन पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।सरकार से स्पष्टता की मांगअब सवाल यह है कि दो साल से अतिरिक्त संभाग आयुक्त का पद क्यों रिक्त रखा गया है? क्या शासन को इस पद पर अधिकारी की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है? यदि आवश्यकता है तो नियुक्ति में इतनी देरी क्यों? और दूसरी ओर, जब उप आयुक्त विकास तथा उप आयुक्त राजस्व के केवल दो पद स्वीकृत हैं, तो तीसरे उप आयुक्त की पदस्थापना किस प्रशासनिक आवश्यकता अथवा आदेश के तहत की गई है?बिलासपुर संभाग जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक क्षेत्र में स्वीकृत पद, वास्तविक पदस्थापना और रिक्त पदों के बीच यह विरोधाभास सरकार के प्रशासनिक प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जरूरत इस बात की है कि शासन पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट करे और बताए कि रिक्त पदों को भरने के बजाय स्वीकृत पदों से अधिक अधिकारियों की पदस्थापना का औचित्य क्या है।




