
तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

अंबिकापुर में बदहाल सड़कों को लेकर हुए प्रदर्शन के बाद कैबिनेट मंत्री एवं स्थानीय विधायक राजेश अग्रवाल का बयान अब राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। प्रदर्शनकारियों से बातचीत के दौरान मंत्री ने कहा कि “शहर की सड़कों की स्थिति को लेकर मैं खुद शर्मिंदा हूं, लेकिन अब सड़कों की दशा और दिशा बदलने वाली है।” मंत्री का यह बयान जहां जनता के दर्द को स्वीकार करने वाला माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रहा है।सवाल यह उठ रहा है कि जब सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री को अपने ही विधानसभा क्षेत्र की सड़कों की हालत पर शर्मिंदगी महसूस करनी पड़ रही है, तो फिर प्रदेश में सड़क निर्माण और मरम्मत की जिम्मेदारी संभाल रहे लोक निर्माण विभाग को इसकी जानकारी क्यों नहीं? आखिर वह कौन सी वजह है कि बारिश से पहले सड़कों की स्थिति सुधारने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए?प्रदेश में लोक निर्माण विभाग की कमान संभाल रहे मंत्री अरुण साव के सामने अब यह चुनौती है कि वह केवल घोषणाओं तक सीमित रहने वाली सड़क व्यवस्था को धरातल पर कैसे सुधारते हैं। अंबिकापुर ही नहीं, प्रदेश के कई हिस्सों से लगातार खराब सड़कों और अधूरे निर्माण कार्यों की शिकायतें सामने आती रही हैं।गौर करने वाली बात यह भी है कि इससे पहले वरिष्ठ मंत्री रामविचार नेताम भी सड़कों की बदहाली को लेकर लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों पर नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। जब सत्ता पक्ष के ही मंत्री और विधायक सड़क व्यवस्था को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि विभागीय स्तर पर निगरानी और जवाबदेही तय करने में कमी कहां रह गई।मंत्री राजेश अग्रवाल ने जनता के बीच पहुंचकर भरोसा दिलाया कि बारिश के बाद सड़क निर्माण और मरम्मत कार्यों में तेजी लाई जाएगी। लेकिन अब जनता की नजर इस बात पर है कि मंत्री के आश्वासन के बाद सड़कें वास्तव में कब तक सुधरती हैं।क्योंकि सड़कें किसी भी सरकार के विकास कार्यों का सबसे बड़ा आईना होती हैं। अंबिकापुर की सड़कों को लेकर उठी आवाज अब केवल स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि प्रदेश में लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली और जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।




