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जिन पर होना था एफआईआर, उन्हें मिल गई बहाली! आखिर किसका ‘हरित’ संरक्षण?…फर्जी हस्ताक्षर, गबन और कूटरचना के आरोपों से घिरे बाबू की बहाली से उठे सवाल, सीसीएफ बिलासपुर के आदेश पर विभाग में चर्चाओं का दौर।

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, नूर मोहम्मद, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी

वन विभाग के मरवाही वनमंडल में पदस्थ रहे सहायक ग्रेड-2 एवं तत्कालीन कैम्पा प्रभारी भूपेंद्र साहू की बहाली को लेकर विभाग में नई बहस छिड़ गई है। कूटरचना, फर्जी हस्ताक्षर और शासकीय राशि के कथित गबन जैसे गंभीर आरोपों के चलते निलंबित किए गए कर्मचारी को कुछ ही समय बाद मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ), बिलासपुर द्वारा पुनः बहाल कर उसी कैम्पा शाखा में पदस्थ किए जाने से विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

जानकारी के अनुसार, भूपेंद्र साहू पर आरोप है कि उन्होंने तत्कालीन परिक्षेत्र अधिकारी (रेंजर) दरोगा सिंह मरावी तथा तत्कालीन एसडीओ (पेंड्रा) निराला के कथित फर्जी हस्ताक्षर कर वित्तीय अनियमितताएं कीं। इन्हीं आरोपों के आधार पर उन्हें निलंबित किया गया था। अब उसी कर्मचारी को बहाल कर पुनः कैम्पा शाखा में दायित्व सौंपे जाने को लेकर विभाग के भीतर और बाहर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं।

सूत्रों के अनुसार, भूपेंद्र साहू पर लगभग 100 करोड़ रुपये के वाउचरों से संबंधित अभिलेख वनमंडल कार्यालय से गायब होने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना शेष है। इस बीच, मरवाही वनमंडलाधिकारी (डीएफओ) द्वारा भी भूपेंद्र साहू को पत्र जारी कर कैम्पा शाखा का संपूर्ण प्रभार वर्तमान प्रभारी को सौंपने के निर्देश दिए जाने की जानकारी सामने आई है।

इधर, विभागीय सूत्रों का कहना है कि जिस कर्मचारी के विरुद्ध विभागीय जांच लंबित हो और जिस पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप हों, उसे उसी शाखा में पुनः पदस्थ करना जांच की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। आशंका जताई जा रही है कि इससे विभागीय अभिलेखों और साक्ष्यों पर प्रभाव पड़ सकता है।

मामले का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि तत्कालीन रेंजर दरोगा सिंह मरावी तथा एसडीओ निराला द्वारा मुख्य वन संरक्षक, बिलासपुर को पत्र लिखकर भूपेंद्र साहू के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने की मांग किए जाने की भी चर्चा है। यदि ऐसा है, तो यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि एफआईआर की मांग लंबित रहने के बीच बहाली का निर्णय किन परिस्थितियों में लिया गया।

अब विभागीय गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है कि क्या गंभीर आरोपों से घिरे कर्मचारी को बहाल कर उसी शाखा में पदस्थ करना प्रशासनिक विवेक का निर्णय है या फिर इसके पीछे किसी प्रभावशाली संरक्षण की भूमिका है? इस पूरे घटनाक्रम ने वन विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

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