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स्कूलों में ‘सेवा-संकल्प’ के नाम पर दीप जलाने से लेकर फोटो-वीडियो भेजने तक के निर्देश, शिक्षा विभाग की भूमिका पर सवाल।

तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई, शिक्षकों की शैक्षणिक जिम्मेदारियां और विद्यालयों की मूलभूत समस्याएं अपनी जगह खड़ी हैं, लेकिन विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी बिल्हा भूपेंद्र कौशिक के नाम से जारी ‘सेवा-संकल्प अभियान 2026’ की सूचना ने शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं को लेकर एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। 17 सितंबर से 7 अक्टूबर तक विद्यालयों में विभिन्न गतिविधियां आयोजित करने के निर्देश दिए गए हैं, जिनमें 17 सितंबर की शाम सात बजे प्रत्येक विद्यालय में 10-10 दीप प्रज्वलित कर ‘सेवा के लिए आशीर्वाद का दीया’ जलाने से लेकर फोटो और एक मिनट का वीडियो संबंधित व्हाट्सऐप समूहों में भेजना अनिवार्य बताया गया है।सवाल यह नहीं है कि स्वच्छता अभियान हो, चित्रकला प्रतियोगिता हो या विद्यार्थियों में राष्ट्र निर्माण की भावना विकसित की जाए। सवाल यह है कि क्या सरकारी विद्यालयों को किसी राजनीतिक व्यक्तित्व के सार्वजनिक जीवन के प्रति आभार व्यक्त करने वाले अभियान का मंच बनाया जाना चाहिए? जब शिक्षा विभाग स्वयं विद्यालयों को कार्यक्रम आयोजित करने, सोशल मीडिया डीपी और स्टेटस अपडेट करने तथा फोटो-वीडियो रिपोर्टिंग के निर्देश देता है, तब शिक्षा और प्रचार के बीच की सीमा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।प्रदेश में चलाए जा रहे ‘सेवा संकल्प अभियान’ को सार्वजनिक रिपोर्टों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों के प्रति आभार और ‘विकसित भारत-2047’ के संकल्प से जोड़ा गया है। छत्तीसगढ़ में 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक अभियान चलाए जाने तथा ‘आशीर्वाद के दीये’ जलाने की अपील की खबरें भी प्रकाशित हुई हैं।बिल्हा के शिक्षा विभाग के आदेश में तो अभियान को विद्यालय स्तर तक ले जाते हुए दीप प्रज्वलन, रंगोली, स्वच्छता अभियान, पालक-शिक्षक बैठक, भाषण एवं चित्रकला प्रतियोगिताओं से लेकर संकुल और विकासखण्ड स्तर की प्रतियोगिताओं तक का विस्तृत कार्यक्रम तय किया गया है। इसके साथ ही प्रत्येक गतिविधि की तस्वीर और वीडियो भेजने तथा अपने व्हाट्सऐप डीपी और स्टेटस पर अभियान से संबंधित गतिविधियां अपडेट करने के निर्देश भी दिए गए हैं।यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—क्या सरकारी शिक्षक और विद्यार्थी अब पढ़ाई के साथ-साथ सरकारी प्रचार अभियानों के डिजिटल प्रचारक भी बनेंगे?विद्यालयों में स्वच्छता, राष्ट्र निर्माण, महिला सशक्तिकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विकसित भारत और सामाजिक जागरूकता जैसे विषयों पर प्रतियोगिताएं आयोजित करना अपने आप में शैक्षणिक गतिविधि हो सकती है। लेकिन उसी कार्यक्रम को किसी विशेष राजनीतिक नेतृत्व के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन के प्रति ‘आभार’ से जोड़कर सरकारी स्कूलों में आयोजित कराया जाना शिक्षा की निष्पक्षता को लेकर बहस पैदा करता है।और यह सवाल केवल बिल्हा तक सीमित नहीं है। प्रदेश के विभिन्न जिलों में भी अभियान के तहत स्कूल शिक्षा विभाग से जुड़ी गतिविधियां प्रस्तावित किए जाने की सार्वजनिक रिपोर्टें सामने आई हैं। दुर्ग जिले की रिपोर्ट में भी 17 सितंबर से 7 अक्टूबर के बीच सरकारी और निजी विद्यालयों में ड्राइंग एवं भाषण प्रतियोगिताओं सहित अभियानगत गतिविधियों का उल्लेख है।सरकार से पूछा जाना चाहिए कि स्कूलों की वास्तविक प्राथमिकताएं क्या हैं?कई सरकारी विद्यालयों में आज भी भवन, शौचालय, पेयजल, प्रयोगशाला, खेल मैदान, शिक्षकों की उपलब्धता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसे सवाल मौजूद हैं। ऐसे में शिक्षा विभाग की प्रशासनिक ऊर्जा का एक हिस्सा दीप जलाने, फोटो खिंचवाने, वीडियो बनाने और व्हाट्सऐप समूहों में रिपोर्ट भेजने में लगाया जाना क्या उचित प्राथमिकता है—यह सवाल सरकार और शिक्षा विभाग को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए।विशेष रूप से तब, जब आदेश में ‘अनिवार्य रूप से’ फोटो एवं वीडियो भेजने तथा सोशल मीडिया डीपी/स्टेटस अपडेट करने जैसी बातें दर्ज हैं। यह निर्देश केवल कार्यक्रम की सूचना नहीं रह जाता, बल्कि संस्थाओं पर अनुपालन का प्रशासनिक दबाव पैदा करता दिखाई देता है।सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न विद्यार्थियों को लेकर है। बच्चे किसी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता नहीं हैं। शिक्षक भी किसी राजनीतिक संगठन के प्रचारक नहीं हैं। सरकारी विद्यालय संविधानसम्मत नागरिक शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, लोकतांत्रिक मूल्यों और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के केंद्र हैं। इसलिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था का उपयोग किसी राजनीतिक व्यक्तित्व के प्रति सार्वजनिक आभार व्यक्त करने के लिए किस सीमा तक किया जा सकता है।‘विकसित भारत-2047’ एक राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में चर्चा का विषय हो सकता है और विद्यार्थियों के बीच इस पर वाद-विवाद एवं चित्रकला जैसी शैक्षणिक गतिविधियां भी कराई जा सकती हैं। लेकिन जब उसी अभियान में किसी विशिष्ट राजनीतिक नेतृत्व के प्रति आभार, दीप प्रज्वलन और सोशल मीडिया प्रचार को सरकारी विद्यालयों की गतिविधियों से जोड़ दिया जाता है, तो शिक्षा विभाग की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।बिल्हा के आदेश ने अब सरकार के सामने तीन सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं—पहला, क्या सरकारी विद्यालयों में राजनीतिक व्यक्तित्व के प्रति आभार व्यक्त करने वाली गतिविधियां अनिवार्य कराई जा सकती हैं?दूसरा, क्या शिक्षकों और विद्यार्थियों को सरकारी आदेश के माध्यम से किसी अभियान की सोशल मीडिया गतिविधियों में शामिल करना शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी का हिस्सा है?तीसरा, यदि यह विशुद्ध रूप से जनसेवा और शैक्षणिक अभियान है, तो फिर इसकी गतिविधियों में प्रधानमंत्री के 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन के प्रति आभार और ‘आशीर्वाद का दीया’ जैसी अवधारणाओं को सरकारी स्कूलों के कार्यक्रम का हिस्सा बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?सरकार यदि इसे जनभागीदारी का अभियान मानती है तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जनभागीदारी और राजनीतिक प्रचार के बीच की रेखा धुंधली न हो। लोकतंत्र में सरकारों की योजनाओं का प्रचार अलग विषय है और सरकारी शिक्षा संस्थानों में राजनीतिक व्यक्तित्व के प्रति आभार व्यक्त कराना अलग सवाल।‘सेवा-संकल्प’ का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा जब सरकारी स्कूलों में बच्चों को बेहतर शिक्षा मिले, शिक्षक अपने मूल शैक्षणिक कार्य पर ध्यान दें और विद्यालयों की बुनियादी जरूरतें पूरी हों। दीया जलाने की तस्वीर से ज्यादा जरूरी वह रोशनी है जो बच्चे की किताब, स्कूल के कमरे और उसके भविष्य तक पहुंचे।अब देखना यह है कि सरकार इस आदेश को महज एक अभियान की सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया मानती है या सरकारी शिक्षा व्यवस्था की निष्पक्षता से जुड़े इन सवालों का स्पष्ट जवाब भी देती है।

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